पहले अस्पतालों का इलाज तो कर लीजिए सरकार जी, मेडिकल कॉलेज के सपने बाद में दिखाइए!उत्तराखंड के अस्पताल खुद बीमार हैं, सरकार नए मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर बनाने के सपने दिखा रही है! रुद्रपुर में 100 एमबीबीएस सीटों की घोषणा स्वागतयोग्य, लेकिन सवाल यह है कि पढ़ाएगा कौन, इलाज करेगा कौन और मरीज जाएंगे कहां?संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर

पहले अस्पतालों का इलाज तो कर लीजिए सरकार जी, मेडिकल कॉलेज के सपने बाद में दिखाइए!
उत्तराखंड के अस्पताल खुद बीमार हैं, सरकार नए मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर बनाने के सपने दिखा रही है! रुद्रपुर में 100 एमबीबीएस सीटों की घोषणा स्वागतयोग्य, लेकिन सवाल यह है कि पढ़ाएगा कौन, इलाज करेगा कौन और मरीज जाएंगे कहां?
संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देखकर लगता है कि अब मरीजों के साथ-साथ अस्पतालों को भी इलाज की सख्त जरूरत है। प्रदेश की जनता वर्षों से डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की अनुपलब्धता, जांच सुविधाओं के अभाव और अस्पतालों में लंबी कतारों से जूझ रही है। सरकारी अस्पतालों में मरीज इलाज कराने पहुंचते हैं, लेकिन कई बार उन्हें पहले डॉक्टर ढूंढना पड़ता है, फिर जांच के लिए भटकना पड़ता है और अंत में निजी अस्पताल का रास्ता पकड़ना पड़ता है।
ऐसे में मन में एक व्यंग्यात्मक सवाल उठता है—जब अस्पताल ही बीमार हैं, तो मरीजों का इलाज आखिर कौन करेगा?
सरकार जी, सबसे पहले अस्पतालों का इलाज करवा दीजिए। अस्पताल स्वस्थ हो जाएंगे तो मरीजों को भी बेहतर इलाज मिलने लगेगा। डॉक्टर, नर्स, दवाइयां, जांच मशीनें और पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध करा दीजिए। जनता अपना इलाज तो किसी तरह करवा ही लेगी, लेकिन सरकारी अस्पतालों की बीमारी का इलाज जनता अपने पैसों से नहीं कर सकती। उसकी जिम्मेदारी तो सरकार की ही है!
100 एमबीबीएस सीटें अच्छी बात, लेकिन पढ़ाएगा कौन?
रुद्रपुर में मेडिकल कॉलेज के माध्यम से 100 एमबीबीएस सीटें मिलने की बात निश्चित रूप से उत्साह बढ़ाने वाली है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों वाले प्रदेश में मेडिकल शिक्षा का विस्तार होना चाहिए। इससे भविष्य में डॉक्टर तैयार होंगे और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिल सकती है।
लेकिन सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई शुरू कराने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी हैं या नहीं? क्या पर्याप्त प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और अन्य विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध हैं? क्या जरूरी विभागों के लिए फैकल्टी नियुक्त हो चुकी है? क्या प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, चिकित्सा उपकरण, छात्रावास, प्रशिक्षण सुविधाएं और मरीजों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है?
मेडिकल कॉलेज केवल एक इमारत का नाम नहीं है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जहां विद्यार्थियों को किताबों के साथ वास्तविक मरीजों के बीच प्रशिक्षण मिलता है। उन्हें विभिन्न बीमारियों की पहचान, जांच, उपचार और आपातकालीन चिकित्सा का व्यावहारिक अनुभव दिया जाता है।
यदि भवन अधूरा है, जरूरी उपकरण पूरे नहीं हैं, शिक्षकों की नियुक्तियां लंबित हैं और अस्पताल में मरीजों के उपचार की व्यवस्था ही कमजोर है, तो मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित होगी?
सीटों की घोषणा करना आसान है, लेकिन उन सीटों पर पढ़ने वाले विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित करना असली परीक्षा है।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि 100 सीटों के लिए संबंधित नियामक संस्थाओं की आवश्यक मंजूरी, निर्धारित मानकों के अनुरूप फैकल्टी, अस्पताल की सुविधाएं और शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं। जनता को केवल घोषणा नहीं, बल्कि इन सभी व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति जानने का अधिकार है।
जिला अस्पताल में डॉक्टर नहीं, मेडिकल कॉलेज में कहां से आएंगे?
रुद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों की जनता का एक सीधा सवाल है। जब जिला अस्पताल में ही डॉक्टरों और विशेषज्ञों की उपलब्धता को लेकर सवाल उठते हैं, तब मेडिकल कॉलेज के लिए पर्याप्त अनुभवी चिकित्सक कहां से आएंगे?
क्या सरकार ने डॉक्टरों की नई भर्ती की योजना तैयार की है? क्या विशेषज्ञ चिकित्सकों को उत्तराखंड में सेवा देने के लिए आकर्षक सुविधाएं दी जा रही हैं? क्या रिक्त पदों को भरने की समयसीमा तय की गई है? क्या नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मचारियों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की पर्याप्त व्यवस्था की गई है?
अगर इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं, तो केवल मेडिकल कॉलेज का नाम जोड़ देने से स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर नहीं बदल जाएगी।
यह भी ध्यान रखना होगा कि मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल की जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं। मेडिकल कॉलेज को शिक्षण और मरीजों के उपचार, दोनों की जिम्मेदारी निभानी होती है। इसके लिए अतिरिक्त संसाधन चाहिए। जिला अस्पताल की मौजूदा व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा या नहीं, मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी या नहीं और मेडिकल विद्यार्थियों को पर्याप्त क्लिनिकल प्रशिक्षण मिलेगा या नहीं—इन सभी विषयों पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अधूरी बिल्डिंग, अधूरे ख्वाब और पूरी होती चुनावी घोषणाएं!
लोकतंत्र में विकास की घोषणाओं का स्वागत होना चाहिए, लेकिन घोषणा और उपलब्धि के बीच जमीन-आसमान का अंतर नहीं होना चाहिए। जनता को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि भविष्य में सब कुछ ठीक हो जाएगा, बल्कि यह दिखाया जाना चाहिए कि आज क्या ठीक हुआ है।
यदि मेडिकल कॉलेज की इमारत का काम बाकी है, आवश्यक उपकरणों की खरीद पूरी नहीं हुई है, डॉक्टरों की नियुक्तियां नहीं हुई हैं और अस्पताल में बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं, तो इन कमियों को छिपाने के बजाय सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
किसी भी नई स्वास्थ्य परियोजना में कुछ कमियां होना असंभव नहीं है। निर्माण के दौरान बिजली, पानी, ऑक्सीजन आपूर्ति, अग्निशमन व्यवस्था, संक्रमण नियंत्रण, स्वच्छता, मरीजों के वार्ड, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू, आपातकालीन सेवाएं, ब्लड बैंक, जांच प्रयोगशालाएं और चिकित्सा उपकरणों जैसी जरूरतों की समीक्षा आवश्यक है। मेडिकल कॉलेज के साथ जुड़े अस्पताल में इन सभी सुविधाओं की वास्तविक उपलब्धता और संचालन की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
जनता को यह भी पता होना चाहिए कि परियोजना की कुल लागत क्या है, अब तक कितना काम पूरा हुआ है, कितना बजट खर्च हुआ है, कितने पद स्वीकृत हैं, कितने पदों पर नियुक्तियां हुई हैं और शेष काम पूरा करने की समयसीमा क्या है।
सरकार यदि इन सवालों के जवाब आंकड़ों और धरातल पर दिखाई देने वाले काम के साथ देती है, तो जनता का भरोसा मजबूत होगा। लेकिन यदि जवाब केवल नई घोषणाओं में मिलेंगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
दिसंबर की आचार संहिता और 2027 के चुनाव का सवाल
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अब हर बड़ी घोषणा को जनता चुनावी नजरिए से भी परखने लगी है। दिसंबर में आचार संहिता लागू होने की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चाएं हो सकती हैं, लेकिन इसकी वास्तविक तारीख निर्वाचन आयोग की आधिकारिक घोषणा से ही तय होगी।
सवाल किसी एक पार्टी या सरकार का नहीं, बल्कि शासन की कार्यशैली का है। चुनाव से पहले विकास की घोषणाएं करना गलत नहीं है। गलत तब होगा, जब जनता को योजनाओं का सपना दिखाया जाए, लेकिन उनके लाभ के लिए आवश्यक काम समय पर पूरे न हों।
आज जो सरकार सत्ता में है, उसके पास अपने कार्यकाल में किए गए कामों को जमीन पर उतारने का अवसर है। यदि मेडिकल कॉलेज को लेकर 100 एमबीबीएस सीटों की व्यवस्था की जा रही है, तो सरकार को यह साबित करना चाहिए कि यह केवल चुनावी भाषण का विषय नहीं, बल्कि पूरी तैयारी के साथ शुरू होने वाली शैक्षणिक और चिकित्सा व्यवस्था है।
क्योंकि चुनाव के बाद कौन सरकार बनाएगा, रुद्रपुर से कौन विधायक बनेगा और प्रदेश की सत्ता किसके हाथ में जाएगी, यह जनता के निर्णय पर निर्भर करेगा। लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की जिम्मेदारी आज की सरकार से कोई नहीं छीन सकता।
जनता को यह कहकर संतुष्ट नहीं किया जा सकता कि अगली सरकार बाकी काम पूरा करेगी। अधूरे अस्पताल, खाली पद और अधूरी सुविधाएं किसी भी सरकार की विरासत बन सकती हैं, लेकिन उनकी कीमत मरीजों को चुकानी पड़ती है।
सरकार जी, अस्पतालों को भी डॉक्टर की जरूरत है!
उत्तराखंड की जनता को ऐसे सरकारी अस्पताल चाहिए, जहां मरीज को समय पर डॉक्टर मिले, जरूरी दवाइयां उपलब्ध हों, जांच के लिए बाहर न जाना पड़े और गंभीर स्थिति में उसे दूसरे शहरों में रेफर होने की मजबूरी का सामना न करना पड़े।
पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां और भी गंभीर हैं। दूरस्थ गांवों से मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। ऐसे में डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से जुड़ा प्रश्न है।
रुद्रपुर का मेडिकल कॉलेज भविष्य की बड़ी संभावना हो सकता है, बशर्ते उसे पर्याप्त संसाधन, योग्य शिक्षक, विशेषज्ञ डॉक्टर और मजबूत अस्पताल व्यवस्था मिले। सरकार को चाहिए कि वह निर्माण कार्य, नियुक्तियों और चिकित्सा सुविधाओं की प्रगति पर नियमित सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। साथ ही जिला अस्पताल की कमियों को दूर करने के लिए भी ठोस समयबद्ध योजना सामने रखे।
जनता को घोषणा नहीं, परिणाम चाहिए
हम मेडिकल कॉलेज का विरोध नहीं कर रहे। हम तो चाहते हैं कि रुद्रपुर का मेडिकल कॉलेज उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मिसाल बने। 100 एमबीबीएस सीटें शुरू हों, विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, मरीजों को बेहतर उपचार मिले और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा हों।
लेकिन इन सबके लिए मजबूत तैयारी अनिवार्य है। यदि सरकार अपने कार्यकाल में ही निर्माण कार्य पूरा कर देती है, पर्याप्त फैकल्टी नियुक्त कर देती है, जरूरी उपकरण उपलब्ध करा देती है और अस्पताल की स्थिति सुधार देती है, तो जनता निश्चित रूप से उसके प्रयासों की सराहना करेगी।
हमारी कसौटी साफ है—घोषणा की तारीख नहीं, काम पूरा होने की तारीख बताइए। सीटों की संख्या नहीं, सुविधाओं की उपलब्धता दिखाइए। भवन का उद्घाटन नहीं, मरीजों को मिलने वाला इलाज गिनाइए।
सरकार जी, प्रदेश के अस्पतालों को खुद इलाज की जरूरत है। पहले उनकी बीमारी दूर कीजिए। फिर मेडिकल कॉलेज के सपनों को हकीकत में बदलिए।
क्योंकि जनता को चुनाव से पहले आश्वासन की खुराक नहीं, अस्पताल में इलाज की जरूरत है। और याद रखिए, चुनाव में जनता केवल यह नहीं पूछेगी कि आपने कितनी घोषणाएं कीं; वह यह भी पूछेगी कि उन घोषणाओं में से कितनी जमीन पर उतरीं।
2027 में किसकी सरकार बनेगी, यह भविष्य बताएगा। लेकिन आज अस्पतालों की हालत सुधारना वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी है।
अवतार सिंह बिष्ट संपादक | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर