अपने ऑफर में इजरायल ने कहा है कि अगर सऊदी अरब चाहे तो इजरायल हूतियों के खिलाफ जंग में उनकी मदद के लिए पूरी तरह से तैयार है. हालांकि सऊदी अरब ने इससे इनकार कर दिया है.
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
नेतन्याहू ने ट्रंप से भिजवाया मदद का पैगाम
बताते चलें कि पिछले एक महीने के अंदर हूती विद्रोहियों के हमले से सऊदी अरब दहल उठा है. सऊदी अरब के रिहायशी इलाकों, प्रमुख एयरपोर्ट, रेल रिफाइनरियों पर हूतियों की मिसाइलें कहर बनकर टूट रही हैं. पिछले हफ्ते सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग खालिद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हूतियों ने मिसाइल अटैक किया. उस हमले में 13 बेगुनाह लोगों की जान चली गई. जिसमें हैदराबाद के रहने वाले भारतीय नागरिक भी शामिल हैं. वहीं 308 से ज्यादा लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं.
इस हमले के बाद आधी दुनिया का हवाई संपर्क सऊदी से कट गया. भारत समेत 8 महाशक्तियों ने अपनी उड़ानें कैंसिल कर दी हैं. इसी तबाही के बीच हूतियों ने एक बार फिर धमकी दी कि मक्का और मदीना को छोड़कर पूरा सऊदी अरब अब उनके निशाने पर है. हूतियों के हमले से बचाने में सऊदी अरब की मदद अमेरिका कर रहा है, लेकिन आधुनिक तकनीक के हथियार और खुफिया इनपुट के बाद भी सऊदी अरब हूतियों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा है.
हूतियों से सऊदी को बचाएगा इजरायल?
इसी मुसीबत और तबाही से निकालने के लिए इजरायल ने सऊदी अरब को हूतियों के खिलाफ लड़ाई में मदद की पेशकश की. नेतन्याहू ने अमेरिका के जरिये ये संदेश भिजवाया कि अगर सऊदी अरब चाहे तो इजरायल सऊदी की सुरक्षा के लिए हूतियों के खिलाफ जंग में उनकी मदद कर सकता है.इज़रायल के इस प्रस्ताव का ट्रंप ने भी खुलेआम समर्थन किया.
सऊदी अरब हूतियों के हमले से दहल रहा है, ना सिर्फ आर्थिक तौर पर उसे भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है बल्कि इस हमले में कई लोगों की जाने भी जा चुकी हैं, बावजूद इसके सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इजरायल की मदद लेने से साफ इनकार दिया. उन्होंने ये भी साफ कर दिया कि जब तक इजरायल फिलीस्तीन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बंद नहीं करेगा, तब तक दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते नहीं बन सकते.
मुस्लिम उम्माह के दबाव में सऊदी का इनकार
सऊदी अरब की ओर से इनकार की सबसे बड़ी वजह फिलीस्तीन का मुद्दा है, जिस पर सऊदी अपनी शर्तों पर अडिग है. क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को डर है कि अगर उन्होंने हूतियों के खिलाफ इजरायल के साथ सैन्य गठबंधन किया, तो सऊदी अरब और मुस्लिम जगत की आम जनता में उनके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया होगी. गाजा और मध्य पूर्व के मौजूदा हालातों के बीच इजरायल के साथ खड़े होना सऊदी जनता को मंजूर नहीं होगा. लिहाजा सऊदी विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि जब तक स्वतंत्र फिलीस्तीन राष्ट्र का निर्माण नहीं होता, वो इजरायल के साथ किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे.
सऊदी अरब और अमेरिका आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान, हूतियों को हथियार, ट्रेनिंग और तकनीकी मदद देता है. ईरान की दी हुई मिसाइलें और ड्रोन ही सऊदी अरब पर कहर बनकर टूट रहे हैं. इनसे हो रहे भारी नुकसान के बावजूद सऊदी किसी भी कीमत पर इजरायल के साथ हूतियों के मुद्दे पर समझौते को तैयार नहीं है.
इजरायल क्यों चाहता है सऊदी की मदद करना?
सऊदी के इनकार की वजह तो समझ में आ गई लेकिन सवाल है कि आखिर इजरायल अपने पारंपरिक प्रतिद्वंदी सऊदी अरब की मदद क्यों करना चाहता है. दरअसल, ईरान समर्थित हूती विद्रोही इजरायल और सऊदी दोनों के दुश्मन हैं. ऐसे में इजराय को उम्मीद है कि सऊदी अरब की मदद करने से दोनों के संबंध मजबूत होंगे. इससे आगे चलकर दोनों के बीच राजनयिक संबंध बनाने का मौका भी बन सकता है. हूतियों को नुकसान पहुंचा तो इससे ईरान भी कमजोर होगा. इजरायल, सऊदी अरब की मदद कर क्षेत्र की एक बड़ी अरब शक्ति के साथ सैन्य तालमेल भी बढ़ा सकता है.
दोनों मुल्कों का साझा दुश्मन ईरान है. इसके बावजूद सऊदी अरब और इजरायल में राजनयिक संबंध नहीं हैं. ट्रंप कई बार सऊदी अरब से इजरायल के साथ दोस्ती करने की अपील कर चुके हैं. इसके लिए अमेरिका ने अब्राहम समझौते का रास्ता भी सुझाया है. 2020 में इस समझौते के तहत UAE और बहरीन ने 1948-49 में बने इजरायल को मान्यता दी. इसके साथ ही, कई अन्य अरब देशों ने इजरायल के साथ अपने संबंध सामान्य किए. लेकिन सऊदी अरब ने इजरायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया. वर्ष 2023 में अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और सऊदी के रिश्ते सामान्य करने पर गंभीर बातचीत शुरू हुई, लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद बातचीत रुक गई.
सऊदी इजरायल से हाथ मिलाएगा या देखता रहेगा बर्बादी?
हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं, अमेरिका की मौजूदगी के बाद भी हूती खुलेआम सऊदी को बेखौफ होकर दहला रहे हैं. ऐसे में इजरायल की तरफ से बढ़ाए गए मदद की हाथ को भले ही सऊदी अरब ने अपनी मुस्लिम जनता और फिलीस्तीन के दबाव में झटक दिया हो लेकिन अगर हूतियों को हराना है तो दौलत के साथ तकनीक और ताकत की भी जरूरत उसे जरूर पड़ेगी. जो उसे इजरायल से मिल सकती है. ऐसे में सवाल है कि क्या आने वाले वक्त में सऊदी अरब, इजरायल के साथ कोई समझौता करेगा या फिर वो पहले की तरह ही फिलीस्तीन की बांसुरी बजाकर अपनी बर्बादी होते हुए देखताा रहेगा.
