धर्म के नाम पर स्त्री के साथ अन्याय को आदर्श क्यों मानें? परशुराम की कथा, तुलसीदास की चौपाई और आधुनिक समाज का नैतिक विवेकहिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | आध्यात्मिक पड़ताल


धर्म मनुष्य को करुणा, सत्य, न्याय और सदाचार का मार्ग दिखाने के लिए है। लेकिन जब धर्मग्रंथों की किसी कथा या पंक्ति के आधार पर स्त्री की स्वतंत्रता, सम्मान और समानता को कमतर ठहराया जाता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या परंपरा के नाम पर हर बात को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेना चाहिए? क्या किसी धार्मिक पात्र की प्रतिष्ठा उसके प्रत्येक कर्म को नैतिक आदर्श बना देती है? और क्या हजारों वर्ष पुरानी कथाओं की व्याख्या आज के समाज में भी उसी रूप में की जानी चाहिए?
ये सवाल किसी धर्म का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि धर्म, आस्था और नैतिकता के संबंध को समझने के लिए जरूरी हैं।
तुलसीदास की चौपाई और स्त्री सम्मान का प्रश्न

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर


गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस के सुंदरकांड में यह पंक्ति आती है—
“ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥”
इस चौपाई को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। विशेष रूप से स्त्री और शूद्र को ढोल तथा पशु के साथ एक ही पंक्ति में रखे जाने और उन्हें ताड़ना का अधिकारी बताए जाने पर सवाल उठाए जाते हैं।
कुछ पारंपरिक व्याख्याकार यहां ‘ताड़ना’ का अर्थ देखभाल, निगरानी अथवा अनुशासन से जोड़कर समझाते हैं। दूसरी ओर, आलोचकों का मानना है कि इस पंक्ति का शाब्दिक अर्थ स्त्री और वंचित समुदायों के प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सकता है।
लेकिन आधुनिक समाज के सामने मूल प्रश्न स्पष्ट है—क्या किसी स्त्री को केवल स्त्री होने के कारण दंड, नियंत्रण या अधीनता का अधिकारी माना जा सकता है?
आज का संवैधानिक और मानवीय दृष्टिकोण इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक देता है। स्त्री कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसे नियंत्रित करना पुरुष का अधिकार हो। वह स्वतंत्र व्यक्तित्व, समान अधिकारों और अपनी इच्छा से जीवन जीने की गरिमा रखने वाला मनुष्य है।
धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते समय उनके ऐतिहासिक संदर्भों और विभिन्न व्याख्याओं को समझना आवश्यक है। लेकिन किसी भी व्याख्या के नाम पर स्त्री के अपमान या हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
माता रेणुका की कथा: आज्ञापालन बड़ा या जीवन?
पौराणिक परंपरा में भगवान परशुराम से जुड़ी एक कथा आती है। इसके अनुसार, उनके पिता ऋषि जमदग्नि ने माता रेणुका के वध का आदेश दिया और परशुराम ने उस आदेश का पालन किया। बाद में प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा गया, तो परशुराम ने अपनी माता और भाइयों को पुनर्जीवित करने का वर मांगा। कथा के अनुसार, उनका वरदान स्वीकार हुआ और माता रेणुका सहित उनके भाई पुनर्जीवित हुए।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। यह एक पौराणिक आख्यान है, आधुनिक इतिहास से प्रमाणित घटना नहीं। इसलिए माता रेणुका के पुनर्जीवन को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य मानने के बजाय धार्मिक परंपरा में वर्णित प्रसंग के रूप में देखना चाहिए।
अब प्रश्न है कि इस कथा से आज के समाज को क्या शिक्षा मिलनी चाहिए?
क्या पिता की आज्ञा इतनी बड़ी हो सकती है कि उसके लिए माता का जीवन समाप्त कर दिया जाए? क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक प्रतिष्ठा उसके कर्म पर नैतिक प्रश्न उठाने से रोक सकती है? और यदि आज कोई व्यक्ति परिवार के किसी सदस्य की हत्या को केवल बड़े-बुजुर्ग की आज्ञा बताकर उचित ठहराए, तो क्या समाज उसे आदर्श मान लेगा?
निश्चित रूप से नहीं।
आधुनिक नैतिकता का आधार यह है कि आज्ञापालन भी विवेक की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। माता-पिता का सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी की आज्ञा मानने के नाम पर हिंसा करना नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो जाता।
इस कथा को केवल पुत्र के समर्पण की प्रशंसा तक सीमित करने के बजाय माता रेणुका के जीवन, उनकी गरिमा और उनके साथ हुए व्यवहार के प्रश्न को भी सामने रखना चाहिए।
यदि कथा में पुत्र की आज्ञाकारिता पर चर्चा हो सकती है, तो माता के साथ हुए अन्याय पर प्रश्न क्यों नहीं उठाया जा सकता?
पुनर्जीवन की कथा: आस्था और वैज्ञानिक विवेक के बीच अंतर
परशुराम की कथा में माता और भाइयों के पुनर्जीवित होने का प्रसंग धार्मिक विश्वास से जुड़ा है। आस्था रखने वाला व्यक्ति इसे चमत्कार या दिव्य कृपा के रूप में देख सकता है। लेकिन आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से किसी मृत व्यक्ति को वरदान के माध्यम से पुनर्जीवित करने का दावा प्रमाणित नहीं है।
इसलिए कथा के आध्यात्मिक संदेश और उसके घटनाक्रम को ऐतिहासिक अथवा वैज्ञानिक तथ्य मानने के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
यदि इस प्रसंग को प्रतीकात्मक रूप से समझें, तो इसे परिवार के प्रति प्रेम, पश्चात्ताप, संबंधों की पुनर्स्थापना अथवा जीवन के महत्व पर विचार करने का अवसर बनाया जा सकता है। लेकिन यदि इसे बिना विवेक के वास्तविक घटना मानकर प्रस्तुत किया जाए, तो आस्था और अंधविश्वास के बीच की सीमा धुंधली पड़ सकती है।
धर्म का अध्ययन प्रश्न पूछने से कमजोर नहीं होता। वह तब अधिक सार्थक बनता है, जब व्यक्ति श्रद्धा के साथ तर्क और करुणा को भी स्थान देता है।
ब्राह्मणवाद और सामाजिक व्यवस्था पर सवाल
परशुराम की कथा और तुलसीदास की चौपाई पर चर्चा करते समय ब्राह्मणवाद की अवधारणा पर भी विचार किया जा सकता है। यहां ब्राह्मणवाद से आशय किसी व्यक्ति या समूचे ब्राह्मण समुदाय से नहीं, बल्कि उस सामाजिक विचारधारा से है जिसमें जन्म, जाति, धार्मिक अधिकार या पितृसत्तात्मक सत्ता के आधार पर किसी को श्रेष्ठ और किसी को अधीन मानने की व्यवस्था को उचित ठहराया जाता है।
किसी भी जाति के सभी लोगों को एक ही विचारधारा का समर्थक मानना गलत होगा। हर समुदाय में विविध विचार और दृष्टिकोण होते हैं। इसलिए आलोचना का केंद्र किसी जाति के लोग नहीं, बल्कि असमानता और भेदभाव को उचित ठहराने वाली व्यवस्था होनी चाहिए।
जब किसी धार्मिक कथा में पिता की सत्ता को सर्वोपरि माना जाता है, स्त्री की इच्छा और अधिकारों पर चर्चा पीछे छूट जाती है, अथवा सामाजिक पदानुक्रम को ईश्वरीय व्यवस्था बताकर स्वीकार करने की अपेक्षा की जाती है, तब इन धारणाओं की आलोचनात्मक समीक्षा जरूरी हो जाती है।
सवाल यह नहीं कि कोई व्यक्ति किस जाति में जन्मा है। सवाल यह है कि उसके विचार और कर्म समानता, न्याय तथा मानवीय गरिमा के पक्ष में हैं या नहीं।
धर्म की किसी व्याख्या से यदि स्त्री को कमजोर, जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को हीन अथवा किसी वर्ग को जन्मजात श्रेष्ठ बताया जाता है, तो उस व्याख्या पर प्रश्न उठाना सामाजिक न्याय की दिशा में एक आवश्यक कदम है।
आज की स्त्री और पुराने आदर्शों की पुनर्व्याख्या
आज भी समाज में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, बाल विवाह, सम्मान के नाम पर हिंसा और शिक्षा तथा संपत्ति के अधिकारों में भेदभाव जैसी समस्याएं मौजूद हैं। कई बार इन प्रथाओं को परंपरा, परिवार की प्रतिष्ठा या धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर सही साबित करने का प्रयास किया जाता है।
ऐसे वातावरण में धार्मिक कथाओं की व्याख्या का सामाजिक प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि किसी कथा को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि स्त्री का कर्तव्य केवल आज्ञा मानना है, तो उससे असमानता को बल मिल सकता है। इसके विपरीत, यदि उसी कथा के माध्यम से हिंसा के परिणाम, विवेक की आवश्यकता, पश्चात्ताप और मानवीय संबंधों के महत्व पर चर्चा हो, तो वह आधुनिक समाज के लिए विचार का विषय बन सकती है।
माता रेणुका की कथा में केवल परशुराम के पराक्रम या आज्ञापालन की चर्चा करना पर्याप्त नहीं है। माता रेणुका स्वयं भी इस कथा का केंद्रीय पात्र हैं। उनके जीवन और गरिमा को नजरअंदाज करके कथा की संपूर्ण नैतिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
स्त्री का सम्मान इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि वह किसी की माता, पत्नी, बहन या पुत्री है। उसका सम्मान इसलिए होना चाहिए क्योंकि वह स्वयं एक स्वतंत्र मनुष्य है।
क्या धार्मिक पात्रों की आलोचना करना अधर्म है?
किसी धार्मिक पात्र के कर्म पर सवाल उठाना और पूरे धर्म का अपमान करना दो अलग बातें हैं। श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति भी किसी कथा के नैतिक पक्ष पर विचार कर सकता है। धार्मिक परंपराओं के भीतर भी समय-समय पर विभिन्न व्याख्याएं, दार्शनिक बहसें और नैतिक विमर्श होते रहे हैं।
यदि किसी पात्र को आदर्श माना जाता है, तो उसके जीवन से जुड़ी घटनाओं पर नैतिक प्रश्न उठाना अनुचित क्यों हो? आदर्श का अर्थ केवल महान शक्तियों, पराक्रम या तपस्या से नहीं होना चाहिए। आदर्श वह भी है, जिसके आचरण से समाज को न्याय, करुणा और समानता की प्रेरणा मिले।
किसी कथा के सभी पहलुओं को एक साथ स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है। उसके उपयोगी नैतिक संदेश ग्रहण किए जा सकते हैं और समस्याग्रस्त पक्षों की आलोचनात्मक समीक्षा भी की जा सकती है।
धर्म और नैतिकता के बीच यही विवेकपूर्ण संवाद समाज को आगे ले जा सकता है।
निष्कर्ष: आदर्श वह, जो स्त्री की गरिमा की रक्षा करे
परशुराम की कथा, माता रेणुका का प्रसंग और तुलसीदास की चौपाई हमें एक बुनियादी प्रश्न के सामने खड़ा करते हैं—क्या परंपरा के प्रति श्रद्धा का अर्थ उसके प्रत्येक कथन और कर्म को बिना सवाल स्वीकार कर लेना है?
यदि किसी कथा में हिंसा का प्रसंग है, तो उसकी नैतिक समीक्षा होनी चाहिए। यदि किसी पंक्ति की व्याख्या स्त्री या किसी वंचित समुदाय के अपमान का आधार बनती है, तो उस व्याख्या पर सवाल उठने चाहिए। यदि कोई सामाजिक व्यवस्था जन्म या लिंग के आधार पर असमानता को उचित ठहराती है, तो उसे चुनौती देना चाहिए।
स्त्री की गरिमा किसी धार्मिक बहस में हार-जीत का विषय नहीं, बल्कि मानवता की बुनियादी कसौटी है।
आज के युग में वास्तविक आध्यात्मिकता वही है, जो मनुष्य को हिंसा से दूर, करुणा के निकट और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना सिखाए। शक्ति के साथ संवेदना, श्रद्धा के साथ विवेक और परंपरा के साथ न्याय का होना आवश्यक है।
किसी भी धार्मिक कथा से प्रेरणा लेने से पहले यह देखना चाहिए कि उसकी व्याख्या मनुष्य को अधिक संवेदनशील बना रही है या किसी के अधिकारों को कम कर रही है।
क्योंकि सच्चा आदर्श वह नहीं, जिसकी आलोचना करना वर्जित हो; सच्चा आदर्श वह है, जिसके विचार और कर्म मनुष्य की गरिमा, समानता और न्याय की रक्षा करें।
— अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर