रुद्रपुर। नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की आराधना, आस्था, संयम और आत्मिक शांति के दिन होते हैं। नौ दिनों तक व्रत रखने, अखंड ज्योति प्रज्वलित करने और मां के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना के बाद महानवमी का दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। मोहनी बिष्ट के लिए नवमी पूजन धार्मिक आध्यात्मिक अनुभूति है, जिसकी स्मृतियां पूरे वर्ष हृदय में बसी रहती हैं।
हर वर्ष की भांति इस बार भी नौ दिनों तक अखंड ज्योति प्रज्वलित रही। मां दुर्गा की आराधना, पूजा-पाठ और व्रत के साथ घर का वातावरण भक्तिमय बना रहा। ऐसा अनुभव हुआ, मानो नौ दिनों तक मन सांसारिक व्यस्तताओं से दूर किसी अलौकिक दुनिया में विचरण कर रहा हो। अखंड ज्योति की लौ के सामने प्रार्थना करते हुए मन में यही भाव रहा कि मां की कृपा परिवार पर सदैव बनी रहे और जीवन में सुख, शांति तथा सद्भाव का प्रकाश फैलता रहे।
नवमी के दिन कन्या पूजन का इंतजार सुबह से ही शुरू हो जाता है। लगभग 11:30 बजे कन्याओं के पूजन की तैयारी रहती है। मोहनी बिष्ट कि पिछले कई वर्षों से कन्या पूजन की यह परंपरा उनके जीवन की विशेष स्मृतियों का हिस्सा बन गई है। उनकी अनुभूति है कि कई बार कन्याओं को बुलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। अचानक घंटी बजती है और ऐसा एहसास होता है कि मां के स्वरूप में नन्ही कन्याएं द्वार पर आ पहुंची हैं।
घंटी की आवाज सुनते ही मन श्रद्धा और प्रसन्नता से भर उठता है। बच्चों के नन्हे कदमों के साथ घर में खुशियों का संचार होता है। उनकी मासूम मुस्कान, चंचलता और उत्साह पूरे वातावरण को आनंदमय बना देते हैं। भक्तिभाव से भरे उस क्षण में ऐसा लगता है, मानो मां दुर्गा ने अपनी कृपा से घर के आंगन को पावन कर दिया हो।
इस बार कन्या पूजन के दौरान बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। देवी स्वरूप नन्हे बच्चों ने पहले जय माता दी के जयकारे लगाए। इसके बाद बच्चों ने हनुमान अंश से जुड़े फिल्मी भजन को सामूहिक भजन को गाकर सुनाया, उनकी मासूम आवाज ने माहौल को और भी आनंदमय बना दिया। वातावरण भक्ति के रंग में रंग गया।
बच्चों की आवाज, उनके उत्साह और जय माता दी के जयकारों ने ऐसा समां बांधा कि हर कोई उस पल को अपने मन में संजो लेना चाहता था। उनकी मासूमियत में श्रद्धा थी, उनके स्वरों में आनंद था और उनके व्यवहार में बचपन की सहज भक्ति दिखाई दे रही थी। यह दृश्य केवल मनोरंजन का क्षण नहीं, बल्कि उस संस्कार का सुंदर उदाहरण था, जिसमें बच्चे परिवार और परिवेश से पूजा, भजन तथा धार्मिक परंपराओं से जुड़ना सीखते हैं।
नौ देवियों की आराधना के बाद विधि-विधान से हुआ कन्या पूजन
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। इनमें मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कूष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री शामिल हैं। प्रत्येक स्वरूप अपने भीतर शक्ति, तप, साहस, करुणा और कल्याण का संदेश समेटे हुए है।
महानवमी पर पूजा-अर्चना के बाद परंपरानुसार कन्याओं का स्वागत किया गया। उनके चरण पखारे गए, तिलक लगाया गया और श्रद्धापूर्वक पूजा की गई। इसके बाद कन्याओं को भोजन कराया गया तथा उपहार और दक्षिणा भेंट कर सम्मानपूर्वक विदा किया गया। इस दौरान मन में यही प्रार्थना रही कि मां सभी बच्चों को स्वस्थ, प्रसन्न और सुरक्षित रखें तथा प्रत्येक बेटी को जीवन में सम्मान, अवसर और खुशियां प्राप्त हों।
कन्या पूजन का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह नारी शक्ति के सम्मान, बालिकाओं के प्रति स्नेह और समाज में बेटियों के महत्व को स्वीकार करने का संदेश भी देता है। कन्याओं की मुस्कान और उनके आशीर्वाद की भावना से मन को जो संतोष मिलता है, वह शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
विदाई के बाद भी हृदय में जीवित रहेंगी ये स्मृतियां
पूजा पूरी हुई, उपहार देकर कन्याओं को विदा किया गया, लेकिन उनके साथ बिताए पलों की मधुरता मन में रह गई। बच्चों के भजन, उनकी जिद, जय माता दी के जयकारे और उनके चेहरों की मुस्कान लंबे समय तक यादों में गूंजती रहेगी।
नौ दिनों तक जिस घर में अखंड ज्योति का प्रकाश, मां की आराधना और भक्ति का वातावरण बना रहा, वहां नवमी का दिन एक सुंदर स्मृति बनकर रह गया। मोहनी और अवतार सिंह बिष्ट के लिए अब अगले वर्ष की नवरात्रि की प्रतीक्षा भी शुरू हो गई है। मन में यही उत्साह है कि अगले वर्ष फिर मां की आराधना होगी, अखंड ज्योति प्रज्वलित होगी और कन्या पूजन के पावन अवसर पर नन्हे बच्चों की किलकारियों से घर गूंज उठेगा।
मां दुर्गा से यही प्रार्थना है कि परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें, हर घर में सुख-शांति हो, बच्चों के चेहरे पर मुस्कान रहे और बेटियों को सदैव सम्मान मिले। नौ दिनों की साधना से प्राप्त आध्यात्मिक शांति पूरे वर्ष हृदय में बनी रहे।
नवमी पूजन की अलौकिक अनुभूति: नौ दिन की साधना, अखंड ज्योति और कन्या स्वरूप में मां के दर्शन, बच्चों के भजनों ने बांधा समांपिछले पांच वर्षों से चली आ रही परंपरा, घंटी बजते ही कन्याओं के आगमन का एहसास; जय माता दी के जयकारों और भजनों से भक्तिमय हुआ वातावरण
