रुद्रपुर, उत्तराखंड। बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर सत्य की विजय का संदेश देने वाला पावन पर्व विजयादशमी यानी दशहरा आज, 20 अक्टूबर 2026 को देशभर में धार्मिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रपुर में भी दशहरे को लेकर उत्साह का माहौल है। शहर के गांधी पार्क में आज रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा। रामलीला मंचन, भगवान श्रीराम के जयकारों और रावण दहन के आयोजन के बीच हजारों लोगों के इस परंपरा से जुड़ने की उम्मीद है। कार्यक्रम में पहुंचने वाले लोगों को स्थानीय आयोजकों से पुतला दहन के वास्तविक समय और सुरक्षा संबंधी निर्देशों की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
विजयादशमी केवल पुतलों को जलाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लोभ, अन्याय और नकारात्मकता को समाप्त करने का आध्यात्मिक संदेश भी देता है। भगवान श्रीराम के आदर्शों का स्मरण करते हुए यह पर्व सत्य, मर्यादा, कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
विजयादशमी का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय
हिंदू पंचांग के अनुसार, विजयादशमी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 51 मिनट से आरंभ होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहने की गणना बताई गई है। इसी आधार पर आज विजयादशमी के धार्मिक आयोजन किए जा रहे हैं।
रावण दहन के लिए प्रदोष काल: शाम 5 बजकर 47 मिनट से रात 8 बजकर 23 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। धार्मिक परंपरा में सूर्यास्त के आसपास का प्रदोष काल रावण दहन के लिए विशेष महत्व रखता है। हालांकि, यह पंचांग आधारित धार्मिक समय है। रुद्रपुर के गांधी पार्क सहित देश के अलग-अलग रामलीला मैदानों में पुतला दहन का वास्तविक समय आयोजक समितियों के कार्यक्रम के अनुसार अलग हो सकता है।
विजय मुहूर्त: उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार, दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक विजय मुहूर्त बताया गया है। इस अवधि को विजय, शुभ कार्यों के आरंभ और शस्त्र पूजन के लिए विशेष माना जाता है।
अपराह्न पूजा मुहूर्त: दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से शाम 3 बजकर 30 मिनट तक का समय भी पूजा-अर्चना के लिए शुभ बताया गया है।
ध्यान देने योग्य है कि अलग-अलग स्थानों की सूर्योदय-सूर्यास्त गणना और पंचांग पद्धति के कारण मुहूर्त में अंतर हो सकता है। पूजा या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए स्थानीय पंचांग और विद्वान आचार्य की सलाह को प्राथमिकता देना उचित है।
भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर स्थापित की धर्म की विजय
रामायण की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंका के राजा रावण ने माता सीता का हरण किया था। माता सीता को मुक्त कराने और अधर्म का अंत करने के लिए भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई की। भीषण युद्ध के बाद भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया और धर्म की विजय स्थापित की।
रावण को विद्वान, शिवभक्त और शक्तिशाली राजा के रूप में भी वर्णित किया गया है। इसके बावजूद उसका अहंकार, अनुचित आचरण और अपनी शक्ति का दुरुपयोग उसके पतन का कारण बना। यही प्रसंग यह समझाता है कि ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव होने के बावजूद यदि व्यक्ति मर्यादा तथा न्याय का मार्ग छोड़ देता है, तो उसका पतन निश्चित हो सकता है।
दशहरे पर रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन इसी पौराणिक प्रसंग की स्मृति में किया जाता है। रावण दहन के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया जाता है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, सत्य और धर्म का महत्व सर्वोपरि है।
दशहरे पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन क्यों माने जाते हैं शुभ?
विजयादशमी से जुड़ी लोकप्रिय धार्मिक मान्यताओं में नीलकंठ पक्षी के दर्शन का भी विशेष स्थान है। लोकविश्वास के अनुसार, दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन होना शुभ संकेत माना जाता है। इसे सुख-समृद्धि, मंगल, सकारात्मकता और नई शुरुआत की कामना से जोड़ा जाता है।
मान्यता के अनुसार, नीलकंठ पक्षी दिखाई देने पर भगवान श्रीराम और महादेव का स्मरण करके परिवार की सुख-शांति तथा जीवन में सफलता की प्रार्थना की जाती है। हालांकि, यह धार्मिक और लोकपरंपरा पर आधारित विश्वास है, किसी निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं।
नीलकंठ पक्षी और भगवान शिव के नाम के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर समझना भी जरूरी है। पौराणिक कथा में समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव द्वारा अपने कंठ में धारण करने का वर्णन है। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। पक्षी के दर्शन की परंपरा को इसी नाम और शुभता से जुड़ी लोकमान्यताओं के संदर्भ में देखा जाता है।
यदि दशहरे पर नीलकंठ पक्षी दिखाई दे, तो उसे प्रकृति की सुंदरता के रूप में देखकर भगवान का स्मरण किया जा सकता है। पक्षी को पकड़ने, परेशान करने या दर्शन कराने के लिए उसे नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए। आस्था के साथ जीवों के प्रति करुणा भी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शस्त्र पूजन और विजयादशमी का आध्यात्मिक महत्व
विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की परंपरा भी प्रचलित है। प्राचीन काल में योद्धा अपने शस्त्रों की पूजा करके धर्म की रक्षा और कर्तव्य पालन का संकल्प लेते थे। आज भी कई स्थानों पर लोग अपने औजारों, वाहनों, पुस्तकों और कार्य से जुड़े उपकरणों का पूजन करते हैं।
इस परंपरा का व्यापक अर्थ है कि मनुष्य अपनी शक्ति और साधनों का उपयोग समाज की रक्षा, सेवा और कल्याण के लिए करे। शक्ति का उद्देश्य दूसरों को दबाना नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना और कमजोर लोगों की सहायता करना होना चाहिए।
इसी दिन कई स्थानों पर नए कार्य की शुरुआत, व्यापारिक प्रतिष्ठानों में पूजा, वाहन पूजन और पारिवारिक धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। मान्यता है कि विजयादशमी पर आरंभ किए गए शुभ कार्यों से जीवन में सफलता की कामना की जाती है।
उत्तराखंड से देश और विदेश तक दशहरे की अलग-अलग परंपराएं
देवभूमि उत्तराखंड में विजयादशमी का पर्व धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। रुद्रपुर, हल्द्वानी, काशीपुर, नैनीताल, देहरादून और प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में रामलीला, पूजा-अर्चना, मेलों तथा रावण दहन के आयोजन स्थानीय परंपराओं के अनुसार होते हैं। पर्व लोगों को परिवार, समाज और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर भी देता है।
देश की राजधानी दिल्ली में लाल किला मैदान सहित अनेक स्थानों पर रामलीला और रावण दहन की परंपरा प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और अन्य राज्यों में भी दशहरा विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूपों में मनाया जाता है। कई जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजन, देवी आराधना और स्थानीय मेलों का विशेष महत्व होता है।
महाराष्ट्र में विजयादशमी पर शमी के पत्तों को प्रतीकात्मक रूप से सोना मानकर बांटने की परंपरा प्रचलित है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के समापन और देवी दुर्गा की विदाई के साथ विजयादशमी का विशेष संबंध है। दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आयुध पूजा, विद्यारंभ और देवी की आराधना की परंपराएं देखने को मिलती हैं। मैसूर का दशहरा भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी दशहरे को अपनी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आस्था से जोड़कर मनाते हैं। नेपाल सहित कई देशों में विजयादशमी से जुड़ी परंपराएं प्रचलित हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों में भारतीय समुदायों के अनेक संगठन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रामलीला, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक पूजा आयोजित करते हैं। हालांकि, हर देश और शहर में रावण दहन अनिवार्य रूप से नहीं होता; आयोजन स्थानीय अनुमति, सुरक्षा व्यवस्था और समुदाय की परंपरा पर निर्भर करते हैं।
रावण दहन देखने जाने वाले लोग रखें इन बातों का ध्यान
रुद्रपुर के गांधी पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर दशहरे के आयोजन के दौरान भीड़ बढ़ सकती है। ऐसे में बच्चों को अपने साथ रखें, निर्धारित प्रवेश और निकास मार्गों का उपयोग करें तथा प्रशासन और आयोजकों के निर्देशों का पालन करें। पुतलों और आतिशबाजी से सुरक्षित दूरी बनाए रखें। किसी भी आपात स्थिति में पुलिस, अग्निशमन विभाग और आयोजन समिति के निर्देशों का पालन करें।
घर पर भी विजयादशमी के अवसर पर भगवान श्रीराम की पूजा, परिवार के साथ धार्मिक पाठ और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य किए जा सकते हैं। पर्व का वास्तविक महत्व केवल उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में सत्य, संयम, सदाचार और करुणा को अपनाने में भी निहित है।
विजयादशमी का संदेश: पहले अपने भीतर की बुराई पर विजय
रुद्रपुर से लेकर देश और विदेश तक विजयादशमी का पर्व अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल संदेश समान है—अन्याय के सामने झुकना नहीं, अहंकार से दूर रहना और सत्य के मार्ग पर चलना।
आज गांधी पार्क में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के दहन के साथ जब आकाश में अग्निशिखाएं उठेंगी, तब यह दृश्य भगवान श्रीराम की विजय की स्मृति को जीवंत करेगा। आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे बड़ी विजय तब होगी, जब मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार और अन्याय को समाप्त करने का संकल्प लेगा।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | अवतार सिंह बिष्ट | रुद्रपुर, उत्तराखंड
