भारत और चीन के रिश्तों में हाल में सुधार के कई संकेत दिए गए, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों की सेनाओं का कुछ मौकों पर आमने-सामने आना इन प्रयासों पर सवाल खड़े करता है।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने एक कार्यक्रम में बताया कि यह स्थिति अब भी कायम है। अरुणाचल के संदर्भ में पहली बार सार्वजनिक रूप से यह जानकारी सामने आई है।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर

सुलह के प्रयास: अरुणाचल प्रदेश पर चीन का एकतरफा दावा पुराना है। वह अपनी तरफ से इलाकों के नाम बदलने की चाल भी चलता रहता है। लेकिन, इस साल जुलाई में ऐसी खबरें आई थीं कि राज्य के ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग क्षेत्र में भारतीय और चीनी सेनाएं आमने-सामने आ गई हैं। हालांकि तब इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। अगस्त में NSA अजीत डोभाल सीमा विवाद को लेकर होने वाली बातचीत में हिस्सा लेने के लिए चीन गए, जबकि सितंबर में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत का दौरा किया।

भरोसे की कमी: जून 2020 में गलवान की झड़प के बाद दोनों देशों में जो दूरी आई थी, वह हालिया संवादों से थोड़ी कम हुई है। लेकिन, अरुणाचल जैसी घटनाएं भरोसे को कम करने वाली हैं। इसकी वजह से कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।

प्रोटोकॉल का पालन: दोनों देशों के बीच बातचीत का निर्धारित मैकेनिज्म है और मुद्दों को सुलझाने का पहले से तय प्रोटोकॉल। यह कोशिश होनी चाहिए कि मामला आगे न बढ़े। गलवान जैसा टकराव दोनों में से कोई पक्ष नहीं चाहेगा। उसके बाद बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती करनी पड़ी थी और बात शुरू करने में फिर करीब 5 साल लग गए। अब भी दोनों तरफ के सैनिक पीस लोकेशन पर वापस नहीं आए हैं और इस बारे में लगातार बातचीत चल रही है।

ताकत भी बढ़ाइए: किसी नए मोर्चे पर हजारों सैनिक तैनात करना, साजो-सामान पहुंचाना बेहद खर्चीला और दुरुह कार्य है। इससे इकॉनमी पर भी दबाव बढ़ता है, जो मौजूदा भू-राजनीति की वजह से पहले ही मुश्किलों में है। वहीं, ITBP महानिदेशक के बयान का एक सबक यह भी है कि भारत को सेना के आधुनिकीकरण का काम तेजी से करना होगा। सैन्य ताकत केवल लड़ने के लिए नहीं, वार्ता की मेज पर अपना पक्ष मजबूती से रखने के लिए भी जरूरी है।