हरक प्रकरण पर भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने, बागेश्वर में भी 2027 की राह आसान नहीं, पांच साल के विकास पर जनता मांगेगी हिसाब


रुद्रपुर उत्तराखंड। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक दावों का दौर तेज हो गया है। पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. हरक सिंह रावत के परिवार से जुड़े विवाद में उनकी पत्नी और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष दीप्ति रावत ने वीडियो जारी कर अपनी चुप्पी तोड़ी है। दूसरी तरफ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने जैनी प्रकरण को लेकर कांग्रेस से जवाब मांगा है। वहीं बागेश्वर की कपकोट और बागेश्वर विधानसभा सीटों पर भाजपा की पिछली जीत को पार्टी की मजबूती के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन इन दोनों राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि तथ्यों और धरातल पर हुए काम से देना होगा।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


दीप्ति रावत ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में एक अन्य महिला को मीडिया में हरक सिंह रावत की पत्नी बताए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि वह हरक सिंह रावत की पत्नी हैं और उन्हें अपनी पहचान साबित करने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई दूसरी महिला ऐसा दावा कर रही है तो उसे तथ्यों के साथ अपनी बात साबित करनी चाहिए। उन्होंने किसी की जमीन या संपत्ति हड़पने के आरोपों को भी खारिज किया और चेतावनी दी कि उनके परिवार के खिलाफ भ्रामक प्रचार बंद नहीं हुआ तो वह न्यायालय की शरण लेंगी। दीप्ति के अनुसार इस पूरे विवाद से उनका परिवार मानसिक तनाव से गुजर रहा है।
हालांकि इस प्रकरण में केवल पारिवारिक पहचान का सवाल नहीं है, बल्कि डॉ. हरक सिंह रावत के राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़े पुराने विवाद भी चर्चा में हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण, पेड़ों की कटाई और कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जांच एजेंसियों की कार्रवाई पहले ही सुर्खियों में रही है। प्रवर्तन निदेशालय ने जनवरी 2025 में सहसपुर क्षेत्र में करीब 101 बीघा जमीन, जिसकी कीमत लगभग 70 करोड़ रुपये बताई गई, अस्थायी रूप से अटैच की थी। जांच के दौरान संपत्ति खरीद से जुड़े पहलुओं में दीप्ति रावत का नाम भी सामने आया था। इसके अतिरिक्त हरिओम सहगल की ओर से हरक सिंह रावत के संबंधियों पर संपत्ति के सौदे में 56 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए शिकायत किए जाने का मामला भी सामने आया है। इन मामलों में आरोपों और जांच को दोष सिद्धि नहीं माना जा सकता, लेकिन सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को सवालों का जवाब दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर देना चाहिए।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने जैनी प्रकरण पर कहा है कि एक महिला ने आरोप लगाए हैं तो उनका तथ्यात्मक जवाब सार्वजनिक होना चाहिए। उनका कहना है कि यह घटनाक्रम कांग्रेस शासनकाल का है और उस समय जो कुछ हुआ, उसकी सच्चाई सामने आनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक जवाबदेही का तकाजा यह भी है कि भाजपा केवल कांग्रेस से सवाल न पूछे, बल्कि अपने शासनकाल में सामने आने वाले विवादों पर भी समान गंभीरता दिखाए। कानून और जांच की कसौटी सभी के लिए एक जैसी होनी चाहिए।
दिल्ली में कांग्रेस की रैली को लेकर भाजपा ने इसे अराजक तत्वों का जमावड़ा बताते हुए व्यापारियों को नुकसान पहुंचाने और अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाया है। लेकिन किसी भी राजनीतिक रैली का मूल्यांकन उसके वास्तविक आचरण और कानून व्यवस्था की स्थिति के आधार पर होना चाहिए। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अधिकार है और यदि कहीं हिंसा या अराजकता होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। केवल राजनीतिक विरोध के कारण किसी रैली को अराजकता का नाम देना भी उचित नहीं है।
बागेश्वर में भाजपा की जीत, लेकिन 2027 की राह में विकास के सवाल
बागेश्वर जिले की कपकोट और बागेश्वर सुरक्षित विधानसभा सीटों पर भाजपा ने पिछले चुनावों में अपना प्रभाव कायम रखा है। वर्ष 2022 में कपकोट से भाजपा के सुरेश सिंह गड़िया ने कांग्रेस के ललित मोहन सिंह फर्स्वाण को 4,046 मतों से हराया था। वहीं बागेश्वर सीट पर चंदन राम दास के निधन के बाद 2023 में हुए उपचुनाव में भाजपा की पार्वती दास ने कांग्रेस के बसंत कुमार को 2,405 मतों से पराजित किया। इन परिणामों को भाजपा के संगठनात्मक प्रभाव का प्रमाण बताया जा रहा है। लेकिन उपचुनाव में जीत का अंतर घटकर 2,405 रह जाना यह भी बताता है कि कांग्रेस ने मुकाबले को चुनौतीपूर्ण बनाया है।
अब सवाल यह है कि क्या 2022 और 2023 के चुनावी परिणाम 2027 में भी भाजपा की जीत सुनिश्चित कर देंगे? क्या पांच वर्षों के कामकाज का हिसाब दिए बिना केवल पुराने आंकड़ों के सहारे चुनाव जीता जा सकता है? बागेश्वर की वास्तविक स्थिति चुनावी आंकड़ों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
कपकोट क्षेत्र में धरमघर-मजखेत सड़क का मामला इसका उदाहरण है। ग्रामीण लंबे समय से सड़क निर्माण की मांग कर रहे हैं। कई बार आश्वासन और धन स्वीकृति की बातें सामने आईं, लेकिन सड़क का अधूरापन आज भी लोगों की परेशानी बना हुआ है। बरसात में आवागमन कठिन हो जाता है और मरीजों को अस्पताल पहुंचाना ग्रामीणों के लिए चुनौती बन जाता है।
शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक है। कपकोट ब्लॉक के 23 राजकीय इंटर कॉलेजों में से 11 में स्थायी प्रवक्ताओं की तैनाती नहीं होने की खबर सामने आई। सवाल है कि पहाड़ के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी? क्या ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों का भविष्य शिक्षकों की कमी के भरोसे छोड़ा जा सकता है?
स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल भी सरकार और जनप्रतिनिधियों के लिए चुनौती है। जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी की शिकायतें लगातार उठती रही हैं। कांडा क्षेत्र में भी विशेषज्ञ चिकित्सकों की मांग को लेकर आंदोलन और प्रदर्शन हुए हैं। दूरस्थ गांवों में रहने वाले लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के उपचार के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
पेयजल, सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क और रोजगार जैसे मुद्दे आज भी बागेश्वर के ग्रामीण क्षेत्रों की प्राथमिक समस्याओं में शामिल हैं। क्षेत्र पंचायत की बैठकों में ग्रामीण प्रतिनिधियों ने शिक्षकों की कमी, खराब संचार सेवाओं, झूलते बिजली के तार और राशन कार्ड से जुड़ी समस्याएं उठाई हैं। धूराफाट, रीठागाड़ और खरेही क्षेत्र के ग्रामीणों ने सड़क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर मांगपत्र दिए। कमस्यार घाटी में भी पुल, बिजली, स्वास्थ्य और यातायात की समस्याएं उठती रही हैं।
अक्टूबर 2026 में कपकोट के थांगधार और गड़खरीख के ग्रामीणों की ओर से मांगें पूरी नहीं होने पर चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दिया जाना बताता है कि विकास के दावों और जनता की अपेक्षाओं के बीच अभी भी दूरी है। यदि ग्रामीणों को सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है तो इसे सामान्य शिकायत मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2027 में चुनावी नारों से नहीं, जनसरोकारों से तय होगा भविष्य
भाजपा के सामने चुनौती केवल अपनी दोनों सीटों को बचाने की नहीं, बल्कि जनता को पिछले पांच वर्षों के कामकाज का हिसाब देने की भी है। कितनी सड़कें पूरी हुईं, कितने विद्यालयों में शिक्षक पहुंचे, कितने अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती हुई, कितने गांवों में पेयजल और मोबाइल नेटवर्क की समस्या दूर हुई तथा पलायन रोकने के लिए कितने स्थायी रोजगार के अवसर पैदा किए गए? इन सवालों के जवाब जनता जानना चाहती है।
कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। केवल भाजपा की कमियां गिनाने से चुनाव नहीं जीता जा सकता। उसे भी बागेश्वर के लिए ठोस विकास योजना, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन रोकने का व्यावहारिक एजेंडा जनता के सामने रखना होगा। उत्तराखंड क्रांति दल और अन्य राजनीतिक दलों को भी जनसमस्याओं पर अपनी सक्रियता जमीन पर साबित करनी होगी।
राजनीति में आरोपों का दौर चलता रहेगा, लेकिन जनता की प्राथमिकताएं नहीं बदलतीं। उसे बेहतर सड़क, अस्पताल में डॉक्टर, स्कूल में शिक्षक, घर में पानी और युवाओं के लिए रोजगार चाहिए। हरक सिंह रावत प्रकरण में भी आरोपों की निष्पक्ष जांच और तथ्यों का सार्वजनिक होना जरूरी है। वहीं बागेश्वर में भाजपा को अपनी पिछली जीत के बजाय पांच साल के विकास कार्यों के आधार पर जनता का विश्वास हासिल करना होगा।
2027 का चुनाव भाजपा के लिए केवल सीट बचाने की परीक्षा नहीं, बल्कि विकास के दावों को साबित करने की अग्निपरीक्षा भी होगा। बागेश्वर की जनता इस बार यह जरूर पूछेगी कि पिछले चुनाव में किए गए वादों में से कितने पूरे हुए और जो समस्याएं आज भी कायम हैं, उनका समाधान कब होगा? लोकतंत्र में जीत का प्रमाण चुनावी आंकड़े होते हैं, लेकिन जनविश्वास का प्रमाण जनता के जीवन में आया बदलाव होता है।
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