देवभूमि में इंसानियत पर दरिंदगी और हिमालय पर जलप्रलय का खतरा, उत्तराखंड के सामने दोहरी चुनौती;रामनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ युवती के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म


देवभूमि में इंसानियत पर दरिंदगी और हिमालय पर जलप्रलय का खतरा, उत्तराखंड के सामने दोहरी चुनौती
रामनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ युवती के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म से मानवता शर्मसार, आठ महीने की गर्भवती मिली बेसहारा युवती; दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन से बद्रीनाथ और अलकनंदा के ग्लेशियरों पर मंडरा रहा खतरा, भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदा की आशंका

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


उत्तराखंड। देवभूमि उत्तराखंड आज दो ऐसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो समाज और प्रकृति दोनों के भविष्य को लेकर चिंता पैदा करती हैं। एक ओर नैनीताल जिले के रामनगर से इंसानियत को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां मानसिक रूप से अस्वस्थ एक बेसहारा युवती के साथ कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया। युवती करीब आठ महीने की गर्भवती बताई जा रही है। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने हिमालय के ग्लेशियरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बद्रीनाथ और अलकनंदा घाटी के ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव भविष्य में बड़े प्राकृतिक संकट की आशंका बढ़ा रहे हैं। एक घटना समाज की संवेदनहीनता को उजागर करती है तो दूसरी प्रकृति के साथ लगातार हो रहे खिलवाड़ के परिणामों की चेतावनी दे रही है।
रामनगर में दरिंदगी की शिकार हुई बेसहारा युवती
नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र में करीब 25 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ युवती पिछले आठ से नौ महीनों से विभिन्न इलाकों में भटकती दिखाई दे रही थी। बेसहारा युवती की जिंदगी किस परिस्थिति में गुजर रही थी और उसकी देखभाल करने वाला कौन था, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं थी। इसी बीच युवती अचानक काशीपुर रोडवेज बस अड्डे के पास पेट दर्द से बुरी तरह तड़पती हुई दिखाई दी। उसकी हालत देखकर किसी व्यक्ति ने समाजसेवी मुकेश सुयाल को सूचना दी।
सूचना मिलते ही मुकेश सुयाल अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। युवती की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे चिकित्सकीय परीक्षण के लिए ले जाया गया। डॉक्टरों ने जांच के दौरान उसके गर्भवती होने की जानकारी दी। बताया गया कि युवती करीब आठ महीने की गर्भवती है। इसके बाद मुकेश सुयाल ने बिना देरी किए उसे हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कराया और पूरे मामले की सूचना पुलिस को दी।
होली के आसपास सामूहिक दुष्कर्म का आरोप
मुकेश सुयाल के अनुसार युवती से बातचीत करने पर पता चला कि वह मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के आसपास के क्षेत्र की रहने वाली है। युवती ने कथित तौर पर बताया कि होली के आसपास रामनगर क्षेत्र में दो से तीन लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था। यदि युवती के आरोप सही साबित होते हैं तो यह बेहद गंभीर और अमानवीय अपराध है। मानसिक रूप से अस्वस्थ और अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर महिला के साथ ऐसी घटना समाज की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
समाजसेवी मुकेश सुयाल ने घटना पर आक्रोश जताते हुए कहा कि ऐसे दरिंदों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए। आरोपियों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई ऐसी घिनौनी हरकत करने का साहस न कर सके।
रामनगर कोतवाल सुशील कुमार के अनुसार पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। नियमानुसार आगे की कार्रवाई के लिए महिला सेल को भी जानकारी दी जा रही है। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना केवल पुलिस और प्रशासन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। सवाल यह भी है कि आठ से नौ महीने तक एक मानसिक रूप से अस्वस्थ युवती विभिन्न क्षेत्रों में भटकती रही, लेकिन उसकी सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी किसी ने क्यों नहीं उठाई? समाज की जिम्मेदारी केवल घटना सामने आने के बाद संवेदना व्यक्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। ऐसी महिलाओं की पहचान, सुरक्षा, उपचार और पुनर्वास के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाना समय की मांग है।
दूसरी ओर हिमालय के ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का खतरा
उत्तराखंड के लिए चिंता केवल सामाजिक अपराधों तक सीमित नहीं है। हिमालयी पर्यावरण पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी लगातार गंभीर होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी जलवायु संबंधी आकलनों में ध्रुवीय क्षेत्रों के बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चेतावनी दी गई है।
तुर्किये में होने वाले 31वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP-31 से पहले इंटरनेशनल क्रिस्टोफर क्लाइमेट इनिशिएटिव और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) से जुड़ी रिपोर्ट के हवाले से ग्लेशियरों के भविष्य को लेकर चिंताजनक दावे सामने आए हैं। इन दावों के अनुसार ध्रुवीय क्षेत्रों में तापमान वृद्धि का स्तर लगभग 1.4 डिग्री तक पहुंच चुका है। तापमान में और वृद्धि होने पर दुनिया के अनेक ग्लेशियर तेजी से पिघल सकते हैं। रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर आधे ग्लेशियरों के समाप्त होने और समुद्र के जलस्तर में भारी वृद्धि की आशंका जताई गई है।
हालांकि ग्लेशियरों के समाप्त होने और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की वास्तविक स्थिति तापमान वृद्धि तथा उत्सर्जन के अलग-अलग परिदृश्यों पर निर्भर करेगी। इसलिए इन चेतावनियों को निश्चित भविष्यवाणी के बजाय गंभीर पर्यावरणीय संकेत के रूप में समझना जरूरी है।
बद्रीनाथ और अलकनंदा घाटी पर मंडराता खतरा
उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ी चिंता हिमालयी ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव हैं। बद्रीनाथ क्षेत्र और अलकनंदा बेसिन में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पतले होने, पीछे हटने और बर्फीले हिस्सों में दरारें पड़ने जैसी स्थितियां सामने आ रही हैं। यदि किसी संवेदनशील ग्लेशियर या बर्फीले हिस्से का बड़ा भाग टूटकर नीचे गिरता है तो हिमनदीय झीलों में पानी का दबाव बढ़ने और अचानक बाढ़ आने का खतरा पैदा हो सकता है।
ऐसी स्थिति में अलकनंदा नदी के किनारे बसे क्षेत्रों, पुलों, सड़कों, धार्मिक स्थलों और आबादी को भारी नुकसान पहुंच सकता है। अलकनंदा आगे चलकर गंगा नदी का हिस्सा बनती है। इसलिए किसी बड़े हिमनदीय हादसे का प्रभाव नदी घाटी के विस्तृत क्षेत्र तक पहुंच सकता है।
उत्तराखंड पहले भी केदारनाथ आपदा और चमोली की ऋषिगंगा आपदा जैसी भयावह घटनाओं का सामना कर चुका है। इन हादसों ने साबित किया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति के संकेतों की अनदेखी करना कितना विनाशकारी हो सकता है। पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण, जंगलों का कटाव, पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी और संवेदनशील क्षेत्रों में विकास गतिविधियां खतरे को और बढ़ा सकती हैं।
समाधान के लिए सरकार और समाज को उठाने होंगे कदम
जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता है। उत्तराखंड में ग्लेशियरों की नियमित निगरानी, हिमनदीय झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली और आपदा प्रबंधन को मजबूत करना जरूरी है। विकास योजनाएं भी हिमालय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए।
वहीं रामनगर की घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि मंदिरों, तीर्थस्थलों और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए विश्वभर में पहचाने जाने वाले उत्तराखंड में यदि एक असहाय महिला सुरक्षित नहीं है तो हमारी सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
देवभूमि की पहचान केवल मंदिरों, तीर्थस्थलों और हिमालय की सुंदरता से नहीं बनती, बल्कि यहां के लोगों की संवेदनशीलता, महिलाओं की सुरक्षा और प्रकृति के संरक्षण से भी बनती है। एक ओर इंसानियत को बचाने की जरूरत है तो दूसरी ओर हिमालय को। यदि समाज और सरकार ने समय रहते इन दोनों चुनौतियों को गंभीरता से नहीं लिया तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | अवतार सिंह बिष्ट, उत्तराखंड देश-दुनिया की खबरों पर नजर