2029 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को घेरने की रणनीति तैयार कर रहा विपक्ष अपने ही अंतर्विरोधों के जाल में उलझता नजर आ रहा है। आगामी चुनावों के लिए अभी से जमीन तैयार करने के मकसद से 8 जून को ‘इंडिया’ गठबंधन की एक बेहद अहम और गुप्त बैठक बुलाई गई थी।

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बंद दरवाजे के पीछे हुई इस बैठक का मुख्य उद्देश्य आपसी मतभेदों को भुलाकर एक मजबूत साझा एजेंडा तैयार करना था। लेकिन, इस बैठक के खत्म होते ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी का एक भाषण सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दिया गया। इस कदम ने गठबंधन के भीतर एक नया सियासी बवंडर खड़ा कर दिया है, जिससे कई प्रमुख सहयोगी दल बेहद असहज और नाराज हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।

वामपंथी दलों की दोटूक: ‘भाषण तो सबके सामने आने चाहिए’

राहुल गांधी के भाषण को एकतरफा तौर पर सार्वजनिक किए जाने से सबसे ज्यादा नाराजगी वामपंथी खेमे में देखी जा रही है। सीपीएम (CPM), सीपीआई (CPI) और सीपीआई (एमएल) लिबरेशन का स्पष्ट मानना है कि अगर बीजेपी जैसी मजबूत पार्टी का मुकाबला करना है, तो सबसे पहले गठबंधन के सदस्यों के बीच आपसी विश्वास को मजबूत करना होगा। सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने राहुल गांधी के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें उन्होंने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का जिक्र किया था।

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बेबी ने साफ शब्दों में कहा कि बंद कमरे में अन्य नेताओं ने भी अपनी महत्वपूर्ण राय रखी थी, लेकिन केवल कांग्रेस नेता के विचारों को ही बाहर लाया गया, जो कि गठबंधन की मर्यादा के खिलाफ है। वहीं, सीपीआई के जनरल सेक्रेटरी डी. राजा ने भी तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि अगर ऐसा ही है, तो बैठक में शामिल सभी नेताओं के भाषण सामने आने चाहिए, क्योंकि कई दलों ने कांग्रेस की भूमिका को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई थीं।

चुनावी गठबंधन से आगे बढ़ने की चुनौती और मशविरे की कमी

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने इस विवाद के बीच गठबंधन के भविष्य के स्वरूप पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इंडिया ब्लॉक को सिर्फ चुनावों या संसद सत्र के दौरान साथ आने वाले एक अस्थायी समूह से आगे निकलना होगा। भट्टाचार्य ने जोर देकर कहा कि यदि वास्तव में बीजेपी का विरोध करना है, तो जनता से जुड़े जमीनी मुद्दों को उठाने के लिए मिलकर एक ठोस योजना बनानी होगी।

राहुल के भाषण को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया पर उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह पूरी तरह से एक आंतरिक बैठक थी। अगर कांग्रेस को यह वीडियो जारी ही करना था, तो बैठक में मौजूद सभी राजनीतिक दलों से पहले विचार-विमर्श और सलाह-मशविरा किया जाना चाहिए था।

मतभेद और क्षेत्रीय समीकरणों का बदलता रंग

इस पूरे विवाद पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद मनोज झा ने बेहद सधे हुए अंदाज में टिप्पणी की। उन्होंने राहुल गांधी के फैसले पर सीधे कुछ भी कहने से इनकार कर दिया, लेकिन यह जरूर स्वीकार किया कि इंडिया गठबंधन अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का एक समूह है, इसलिए विचारों में मतभेद होना स्वाभाविक है। उन्होंने सभी दलों से तालमेल बिठाने की अपील की। दूसरी तरफ, तमिलनाडु से गठबंधन के लिए सबसे बुरी खबर आई है, जहां डीएमके (DMK) नेतृत्व कांग्रेस के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाए हुए है।

तमिलनाडु में कांग्रेस की ‘धोखेबाज़ी’ और DMK का नया स्टैंड

तमिलनाडु में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलते दिख रहे हैं। कांग्रेस द्वारा टीवीके सरकार को समर्थन दिए जाने के बाद डीएमके ने राज्य में कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ने के अपने फैसले को और मजबूत कर लिया है। राज्यसभा में डीएमके के फ्लोर लीडर तिरुचि शिवा ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा, “हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है; तमिलनाडु में कांग्रेस की धोखेबाज़ी के बाद हम उनके साथ कहीं भी, किसी भी मंच को साझा नहीं कर सकते।”

हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे विपक्ष के अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाई में शामिल रहेंगे। इस बयान से साफ है कि आगामी दिनों में सीटों के बंटवारे और साझा नेतृत्व को लेकर कांग्रेस की राह आसान नहीं होने वाली है।


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