रुद्रपुर | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
उत्तराखंड सरकार मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK), प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, बर्थ वेटिंग होम और दूरस्थ क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं के लिए निःशुल्क हेलीकॉप्टर सेवा जैसी अनेक योजनाओं का संचालन कर रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य प्रत्येक गर्भवती महिला को सुरक्षित संस्थागत प्रसव की सुविधा उपलब्ध कराना है। सरकारी आंकड़ों में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत लगातार बढ़ने का दावा किया जाता है, लेकिन पहाड़ की वास्तविक परिस्थितियां अब भी कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
राज्य के सीमांत और दुर्गम जिलों में आज भी विशेषज्ञ डॉक्टरों, स्त्री रोग विशेषज्ञों, एनेस्थेटिस्ट और बाल रोग विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफरल केंद्र बनकर रह गए हैं। प्रसव पीड़ा शुरू होने पर महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जिला अस्पताल भेजना पड़ता है। बरसात, भूस्खलन और सड़क बाधित होने की स्थिति में यह सफर कई बार जानलेवा साबित हो जाता है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और अन्य स्वास्थ्य रिपोर्टों से यह भी सामने आया है कि राज्य में बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं को समय पर सभी आवश्यक प्रसव पूर्व जांच (ANC) उपलब्ध नहीं हो पाती। सरकारी अस्पतालों की सीमित सुविधाओं के कारण अनेक परिवार निजी अस्पतालों का रुख करते हैं, जिससे उनके ऊपर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
हालांकि सरकार ने बर्थ वेटिंग होम, 108 एम्बुलेंस सेवा और हेलीकॉप्टर एयरलिफ्ट जैसी पहल शुरू की हैं, लेकिन इनका लाभ सभी दूरस्थ क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा। कई गांवों में आज भी सड़क, संचार और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी सुरक्षित मातृत्व के लक्ष्य के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मातृ मृत्यु दर में और कमी लाने के लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में स्थायी विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति, आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता, नियमित दवा आपूर्ति, मजबूत रेफरल व्यवस्था और स्वास्थ्य कर्मियों के रिक्त पदों को भरना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उत्तराखंड ने सुरक्षित मातृत्व की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति अवश्य की है, लेकिन जब तक अंतिम गांव की गर्भवती महिला को समय पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं होती, तब तक सुरक्षित प्रसव का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं माना जा सकता। सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद इस अंतर को पाटना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती होगी।
(हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स विशेष रिपोर्ट)
