उत्तराखंड सरकार ने अब आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है कि राज्य देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बना है। यह घोषणा उस दावे से अलग है, जिसमें कुछ समय पहले विभिन्न सरकारी मंचों और प्रचार सामग्री में उत्तराखंड को देश का सबसे साक्षर राज्य बताया गया था। उस समय हमने इस दावे पर तथ्यात्मक प्रश्न उठाए थे और पूछा था कि जब राष्ट्रीय स्तर पर कई राज्य पहले से बेहतर साक्षरता दर रखते हैं, तब उत्तराखंड को “देश में नंबर एक” किस आधार पर बताया जा रहा है?
आज सामने आए आधिकारिक तथ्य बताते हैं कि उत्तराखंड को पूर्ण साक्षर राज्य का दर्जा मिला है और इस उपलब्धि के मामले में वह देश का छठा राज्य है। इससे पहले मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम यह उपलब्धि हासिल कर चुके हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यह उपलब्धि निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, परंतु इससे एक बड़ा प्रश्न भी उठता है कि यदि वास्तविक स्थिति यही थी, तब पहले “देश का सबसे साक्षर राज्य” जैसे दावे क्यों किए गए? क्या सरकार ने उपलब्धि को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया था, या फिर साक्षरता दर और पूर्ण साक्षर राज्य जैसी दो अलग-अलग अवधारणाओं को एक साथ मिलाकर प्रचार किया गया?
दो अलग-अलग बातें, जिन्हें एक बना दिया गया
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि साक्षरता दर (Literacy Rate) और पूर्ण साक्षर राज्य (Fully Literate State) दोनों अलग अवधारणाएं हैं।
साक्षरता दर जनगणना के आधार पर तय होती है, जबकि पूर्ण साक्षर राज्य का दर्जा भारत सरकार के उल्लास (ULLAS) कार्यक्रम के निर्धारित मानकों और वयस्क साक्षरता अभियान की सफलता के आधार पर दिया जाता है।
यदि इन दोनों अवधारणाओं को अलग-अलग स्पष्ट किया जाता, तो भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। किंतु जब प्रचार में केवल “देश का सबसे साक्षर राज्य” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, तब स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह धारणा बनी कि उत्तराखंड पूरे देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है।
हमारी खबर में उठाए गए थे सवाल
जब पहले यह दावा सामने आया था, तब हमने अपनी रिपोर्ट में प्रश्न उठाया था कि—
क्या उत्तराखंड वास्तव में देश में पहले स्थान पर है?
क्या केंद्र सरकार ने ऐसी कोई आधिकारिक रैंकिंग जारी की है?
क्या जनगणना के आंकड़े इस दावे की पुष्टि करते हैं?
क्या यह केवल राजनीतिक प्रचार है?
उस समय इन सवालों के स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आए। अब सरकार स्वयं कह रही है कि उत्तराखंड देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बना है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पहले प्रस्तुत की गई भाषा और वर्तमान आधिकारिक स्थिति में अंतर है।
अब सरकार की भाषा बदली
ताजा घोषणा में मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड को देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बताया है। यह शब्दावली अधिक सटीक और तथ्य आधारित प्रतीत होती है।
यानी अब सरकार “देश का सबसे साक्षर राज्य” कहने के बजाय “छठा पूर्ण साक्षर राज्य” कह रही है। इसे सरकार की ओर से अधिक स्पष्ट और जिम्मेदार प्रस्तुति माना जा सकता है।
उपलब्धि का सम्मान, तथ्यों का भी सम्मान
उत्तराखंड का पूर्ण साक्षर राज्य बनना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। इसमें हजारों शिक्षकों, स्वयंसेवकों, शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और समाज के विभिन्न वर्गों की मेहनत शामिल है।
परंतु उपलब्धियों को प्रस्तुत करते समय तथ्यात्मक शुद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि उपलब्धि छठे स्थान की है तो उसे पहले स्थान के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं माना जा सकता।
लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों की सराहना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उनके दावों की तथ्यात्मक जांच करना।
सवाल उठाना लोकतंत्र की ताकत
मीडिया का दायित्व केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित करना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करना भी है।
यदि किसी दावे में भ्रम की संभावना हो तो प्रश्न पूछना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। इसी उद्देश्य से हमारी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए थे। अब सरकार की नई घोषणा उन सवालों के बाद अधिक स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है।
आगे की चुनौती
पूर्ण साक्षर राज्य का दर्जा प्राप्त करना पहला चरण है। अब वास्तविक चुनौती होगी—
विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना।
सरकारी स्कूलों में सीखने के स्तर में सुधार करना।
डिजिटल साक्षरता को गांव-गांव तक पहुंचाना।
वयस्क शिक्षा अभियान को निरंतर जारी रखना।
ड्रॉपआउट दर कम करना।
युवाओं को रोजगारपरक कौशल से जोड़ना।
यदि इन क्षेत्रों में निरंतर सुधार होता है, तभी पूर्ण साक्षरता का लाभ समाज तक पहुंचेगा।
सरकार से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न
पहले “देश का सबसे साक्षर राज्य” कहने का आधार क्या था?
क्या उस दावे का कोई आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध है?
यदि राज्य छठा पूर्ण साक्षर राज्य है, तो पहले नंबर एक का प्रचार क्यों किया गया?
भविष्य में क्या सरकार उपलब्धियों को तथ्यों के अनुरूप प्रस्तुत करेगी?
क्या शिक्षा की गुणवत्ता और सीखने के परिणामों पर भी समान गंभीरता से काम होगा?
निष्कर्ष
उत्तराखंड का देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बनना गर्व का विषय है और इस उपलब्धि के लिए सभी संबंधित पक्ष बधाई के पात्र हैं। साथ ही, यह घटनाक्रम यह भी याद दिलाता है कि सरकारी दावों की तथ्यात्मक जांच लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हमारा उद्देश्य किसी उपलब्धि को कम करके आंकना नहीं, बल्कि तथ्यों को स्पष्ट रूप से सामने लाना है। यदि पहले किए गए दावों और वर्तमान आधिकारिक घोषणा में अंतर दिखाई देता है, तो उस पर प्रश्न उठाना पत्रकारिता का दायित्व है।
अब उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में सरकार उपलब्धियों को उसी रूप में प्रस्तुत करेगी, जैसी उनकी वास्तविक और आधिकारिक स्थिति है। इससे जनता का विश्वास भी मजबूत होगा और उपलब्धियों का महत्व भी बना रहेगा।
भारत सरकार के स्कूल शिक्षा साक्षरता विभाग के बाद निर्धारित मानकों को पूरा करने के बाद राज्यपाल ने आज राज्य को पूर्ण साक्षर घोषित करने की स्वीकृति प्रदान की।
इससे पहले मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम पूर्ण साक्षर राज्य घोषित हो चुके हैं। अब उत्तराखंड भी इस सूची में शामिल हो गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे राज्य के लिए मील का पत्थर बताते हुए कहा कि यह उपलब्धि सरकार के सतत प्रयासों और जनभागीदारी का परिणाम है। कहा कि सरकार डिजिटल साक्षरता, वित्तीय साक्षरता, सतत शिक्षा और जीवनोपयोगी कौशल प्रत्येक नागरिक तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।
