अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का स्थापना दिवस भारतीय छात्र आंदोलन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। 9 जुलाई 1949 को स्थापित एबीवीपी ने छात्र हितों की आवाज़ उठाने के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण में युवाओं की सक्रिय भागीदारी का एक व्यापक अभियान खड़ा किया। “ज्ञान, शील और एकता” को अपना ध्येय वाक्य बनाकर संगठन ने शिक्षा, सामाजिक चेतना और नेतृत्व विकास के क्षेत्र में लगातार कार्य किया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
स्वतंत्रता के बाद जब देश नई शिक्षा व्यवस्था और युवा नेतृत्व की दिशा तलाश रहा था, तब एबीवीपी ने विद्यार्थियों को केवल परिसर की समस्याओं तक सीमित रखने के बजाय उन्हें राष्ट्रीय मुद्दों, सामाजिक उत्तरदायित्व और जनसेवा से जोड़ने का प्रयास किया। समय के साथ संगठन ने विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई और आज इसे दुनिया के सबसे बड़े छात्र संगठनों में गिना जाता है।
अपने सात दशक से अधिक के सफर में एबीवीपी ने शिक्षा सुधार, पारदर्शी छात्र संघ चुनाव, महिला सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान, आपदा राहत और सामाजिक जागरूकता जैसे अनेक अभियानों का नेतृत्व किया। संगठन से जुड़े अनेक कार्यकर्ता आगे चलकर राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, न्याय, विज्ञान और सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचे।
आज जब भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब युवा शक्ति की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे समय में एबीवीपी का स्थापना दिवस केवल एक संगठन का उत्सव भर नहीं, बल्कि उस विचार का प्रतीक है जिसने दशकों से विद्यार्थियों में नेतृत्व, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति की भावना को सशक्त किया है। यही ऐतिहासिक विरासत आने वाली पीढ़ियों को भी राष्ट्र निर्माण के पथ पर प्रेरित करती रहेगी।
