एम्स में अलग काउंटर की उपलब्धि का शोर, रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज की बदहाली पर कौन देगा जवाब? उत्तराखंड के प्रवेश द्वार रुद्रपुर में डॉक्टरों का संकट, मरीजों को एम्स की कतारों की ओर धकेल रही व्यवस्थ ।

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उत्तराखंड के प्रवेश द्वार रुद्रपुर में डॉक्टरों का संकट, मरीजों को एम्स की कतारों की ओर धकेल रही व्यवस्था

उत्तराखंड सरकार ने एम्स ऋषिकेश में राज्य के नागरिकों के लिए अलग एकीकृत ओपीडी काउंटर शुरू होने को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया है। इस काउंटर पर ओपीडी पंजीकरण, बिलिंग, डिस्चार्ज और अन्य संबंधित सेवाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराई जाएंगी। इस पहल का उद्देश्य मरीजों की सुविधा बढ़ाना और उन्हें अलग-अलग काउंटरों के चक्कर से राहत देना बताया गया है।

निस्संदेह, यदि किसी मरीज को अस्पताल में कम समय में बेहतर सेवा मिलती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। परंतु इस उपलब्धि के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों कि उत्तराखंड के मरीजों को अपने ही राज्य में सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित एम्स ऋषिकेश पर निर्भर होना पड़ रहा है?

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि उत्तराखंड के प्रवेश द्वार, औद्योगिक राजधानी और सबसे तेजी से बढ़ते शहरों में शामिल रुद्रपुर का जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय एवं मेडिकल कॉलेज आज भी संसाधनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव से जूझ रहा है। करोड़ों रुपये की लागत से बने इस संस्थान से जनता को आधुनिक चिकित्सा सेवाओं की उम्मीद थी, परंतु स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह अपेक्षाओं पर खरा उतरने के बजाय धीरे-धीरे “सफेद हाथी” बनता जा रहा है।

डॉक्टरों की कमी सबसे बड़ा संकट

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन विशेषज्ञ चिकित्सकों पर वर्षों से मरीज भरोसा करते थे, उनका स्थानांतरण कर दिया गया। स्थानांतरण के बाद लंबे समय तक उनके स्थान पर नए विशेषज्ञों की नियुक्ति नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप अनेक विभाग प्रभावित हो गए।

सरकार यदि वास्तव में स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करना चाहती है तो सबसे पहले जिला और मेडिकल कॉलेज स्तर के अस्पतालों को विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक उपकरण और पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराना होगा। यदि आधारभूत अस्पताल ही मजबूत होंगे तो एम्स जैसे संस्थानों पर अनावश्यक दबाव भी कम होगा।

प्रसूति सेवाओं पर गंभीर सवाल

रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज की सबसे चिंताजनक स्थिति प्रसूति सेवाओं को लेकर सामने आती रही है। स्थानीय स्तर पर ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनमें समय पर बेहतर उपचार न मिलने के कारण महिलाओं की मृत्यु तक हो चुकी है। ऐसे मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं।

यदि मेडिकल कॉलेज में सुरक्षित प्रसव, स्त्री रोग विशेषज्ञ, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, नवजात शिशु देखभाल और आपातकालीन सेवाएं पूरी क्षमता से उपलब्ध हों तो अधिकांश मरीजों को दूसरे शहरों का रुख ही न करना पड़े।

औद्योगिक नगरी को मिला अधूरा स्वास्थ्य ढांचा

रुद्रपुर केवल एक जिला मुख्यालय नहीं, बल्कि उत्तराखंड की औद्योगिक राजधानी है। यहां हजारों उद्योग संचालित हैं और लाखों श्रमिक कार्यरत हैं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं, औद्योगिक चोटें और आपातकालीन चिकित्सकीय मामले सामने आते हैं।

ऐसे शहर में यदि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बनी रहे तो यह केवल स्थानीय लोगों का नहीं बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र का विषय बन जाता है।

क्या एम्स ही अंतिम विकल्प है?

एम्स ऋषिकेश में अलग काउंटर बनने से पंजीकरण प्रक्रिया आसान हो सकती है, लेकिन यह उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की मूल समस्या का समाधान नहीं है।

रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और चंपावत जैसे क्षेत्रों के मरीजों को यदि गंभीर बीमारी होने पर अंततः एम्स ही जाना पड़े, तो यह संकेत है कि जिला और मेडिकल कॉलेज अस्पताल अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर पा रहे हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक चुनौती

सरकार का कहना है कि नए काउंटर से पर्वतीय क्षेत्रों के मरीजों को राहत मिलेगी। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है क्योंकि अस्पताल के भीतर प्रक्रिया सरल होगी।

लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या दूरस्थ गांव से आने वाला मरीज पहले 250 से 350 किलोमीटर की यात्रा करने की परेशानी से मुक्त हो गया?

यदि उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चमोली या बागेश्वर का मरीज कई घंटे का सफर तय करके एम्स पहुंचेगा, तब जाकर उसे अलग काउंटर मिलेगा। इससे यात्रा की कठिनाई समाप्त नहीं होती।

स्थानीय अस्पताल मजबूत क्यों नहीं?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रत्येक मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर, आधुनिक मशीनें, दवाएं और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध हों तो लगभग 80 से 90 प्रतिशत मरीजों का इलाज स्थानीय स्तर पर संभव है।

इससे मरीजों का समय, धन और मानसिक परेशानी तीनों कम होंगे।

करोड़ों का निवेश, अपेक्षित परिणाम कहाँ?

राज्य सरकार ने मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के निर्माण पर भारी धनराशि खर्च की है। जनता का सवाल है कि जब भवन तैयार हैं तो उनमें विशेषज्ञ डॉक्टर, सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं और आधुनिक सुविधाएं पूरी तरह क्यों उपलब्ध नहीं हैं?

यदि भवन खड़े हों और डॉक्टर उपलब्ध न हों, तो जनता को उसका वास्तविक लाभ कैसे मिलेगा?

रुद्रपुर के मरीजों की मजबूरी

रुद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों के मरीज अक्सर हल्द्वानी, बरेली, मुरादाबाद, दिल्ली और ऋषिकेश तक इलाज के लिए जाने को विवश होते हैं।

इससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

मेडिकल कॉलेज का उद्देश्य

किसी भी मेडिकल कॉलेज का उद्देश्य केवल मेडिकल शिक्षा देना नहीं होता। उसका सबसे महत्वपूर्ण दायित्व आम जनता को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना भी होता है।

यदि मरीजों को प्राथमिक से लेकर गंभीर उपचार तक के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़े तो मेडिकल कॉलेज की उपयोगिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

सरकार से प्रमुख सवाल

  • रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज में सभी स्वीकृत विशेषज्ञ पद कब तक भरे जाएंगे?
  • जिन डॉक्टरों का स्थानांतरण हुआ, उनके स्थान पर नई नियुक्तियां क्यों लंबित हैं?
  • प्रसूति एवं आपातकालीन सेवाओं को पूर्ण क्षमता से कब तक संचालित किया जाएगा?
  • क्या मेडिकल कॉलेज में 24 घंटे सभी आवश्यक विशेषज्ञ उपलब्ध हैं?
  • गंभीर मरीजों को रेफर करने की संख्या कम करने के लिए क्या कार्ययोजना है?
  • औद्योगिक नगरी रुद्रपुर के लिए अलग स्वास्थ्य विकास योजना कब बनेगी?

देहरादून में ग्रीन पार्क, जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत

सरकार देहरादून में परेड मैदान और गांधी पार्क को जोड़कर बड़ा ग्रीन स्पेस विकसित करने की योजना बना रही है। शहरों में हरित क्षेत्र विकसित होना निश्चित रूप से आवश्यक है।

परंतु जनता यह भी अपेक्षा करती है कि स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी उसी गंभीरता से निवेश और निगरानी हो। पार्क लोगों को स्वच्छ वातावरण देंगे, जबकि मजबूत अस्पताल लोगों का जीवन बचाएंगे।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों के अनुसार समाधान स्पष्ट है—

  • सभी मेडिकल कॉलेजों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तत्काल नियुक्ति।
  • रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरना।
  • प्रसूति, ट्रॉमा, आईसीयू और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करना।
  • आधुनिक जांच सुविधाओं का विस्तार।
  • डॉक्टरों के अनावश्यक स्थानांतरण पर प्रभावी नीति।
  • पर्वतीय और मैदानी जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं का संतुलित विकास।

निष्कर्ष

एम्स ऋषिकेश में उत्तराखंड के नागरिकों के लिए अलग एकीकृत काउंटर शुरू होना प्रशासनिक दृष्टि से एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। इससे अस्पताल परिसर के भीतर मरीजों को सुविधा मिलेगी।

लेकिन इससे कहीं बड़ा प्रश्न उत्तराखंड की समग्र स्वास्थ्य व्यवस्था का है। यदि रुद्रपुर जैसे विकसित और औद्योगिक शहर का मेडिकल कॉलेज ही विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव से जूझ रहा है, तो दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

सरकार की वास्तविक उपलब्धि तब मानी जाएगी जब रुद्रपुर, हल्द्वानी, श्रीनगर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और अन्य मेडिकल कॉलेजों में मरीजों को विशेषज्ञ उपचार अपने जिले में ही उपलब्ध हो। जिस दिन उत्तराखंड का नागरिक अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल में भरोसे के साथ इलाज करा सकेगा, उसी दिन स्वास्थ्य व्यवस्था को वास्तव में सशक्त कहा जा सकेगा। तब एम्स का अलग काउंटर सुविधा का माध्यम होगा, मजबूरी का प्रतीक नहीं।


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