बदरीनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां श्रद्धालु जो दान और चढ़ावा अर्पित करते हैं, वह किसी व्यक्ति या संस्था के लिए आय का साधन नहीं, बल्कि भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक होता है। यदि इस पवित्र व्यवस्था में हेराफेरी का एक भी आरोप सामने आता है तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था पर सीधा आघात माना जाता है।
दान-चढ़ावा हेराफेरी मामले में जांच आगे बढ़ रही है। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं, रिकॉर्ड देखे जा रहे हैं और संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ हो रही है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यदि जांच में किसी व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य मिलते हैं तो कानून के अनुसार उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। इसमें किसी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
परंतु इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल एक कर्मचारी को आरोपी बनाकर पूरे प्रकरण का सच सामने आ जाएगा? क्या यह संभव है कि वर्षों से चल रही व्यवस्था में किसी एक व्यक्ति ने अकेले इतना बड़ा खेल किया हो और किसी वरिष्ठ अधिकारी, निगरानी तंत्र या प्रशासनिक जिम्मेदार व्यक्ति को इसकी भनक तक न लगी हो? यही वह सवाल है जिसका उत्तर उत्तराखंड की जनता जानना चाहती है।
यदि सरकार वास्तव में निष्पक्ष जांच चाहती है तो जांच का दायरा केवल निलंबित कर्मचारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभी नामित पदाधिकारी, संबंधित प्रशासनिक अधिकारी, गणना व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार अधिकारी तथा पूरे सिस्टम की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जांच केवल फाइलों और बयानों तक सीमित रहने के बजाय आय से अधिक संपत्ति, वित्तीय लेनदेन और कार्यकाल के दौरान अर्जित परिसंपत्तियों तक पहुंचनी चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न मंदिर समिति के अध्यक्ष और शीर्ष पदाधिकारियों की जवाबदेही का है। यदि मंदिर की व्यवस्था उनके अधीन संचालित होती है तो किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी भी उनसे पूछी जानी चाहिए। यदि सब कुछ पारदर्शी था तो फिर ऐसी घटना कैसे हुई? यदि निगरानी व्यवस्था प्रभावी थी तो कथित अनियमितता समय रहते क्यों नहीं पकड़ी गई? यदि निगरानी कमजोर थी तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि दान की गणना की प्रक्रिया में कितने लोग उपस्थित रहते हैं, किसकी क्या जिम्मेदारी होती है, किस अधिकारी के हस्ताक्षर के बाद धन जमा होता है और पूरी प्रक्रिया का ऑडिट किस स्तर पर किया जाता है। यदि प्रक्रिया इतनी मजबूत थी तो फिर कथित गड़बड़ी की संभावना कैसे बनी?
इतिहास गवाह है कि देश में अनेक बड़े घोटालों में प्रारंभिक दौर में छोटे कर्मचारियों या निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, जबकि बाद में बड़े नाम सामने आए या कई मामलों में असली जिम्मेदार कभी कानून के दायरे में आए ही नहीं। कई मामलों में कुछ लोग जेल गए और बाद में बाहर आ गए, जबकि जनता को आज तक पूरी सच्चाई पता नहीं चल सकी। यही कारण है कि इस मामले में भी लोगों के मन में संदेह पैदा हो रहा है कि कहीं किसी एक व्यक्ति को बलि का बकरा बनाकर पूरे प्रकरण को समाप्त करने की कोशिश तो नहीं होगी।
यदि सरकार वास्तव में अपनी कथित जीरो टॉलरेंस नीति पर कायम है तो उसे किसी भी स्तर पर बैठे व्यक्ति को संरक्षण देने का आरोप अपने ऊपर नहीं आने देना चाहिए। जीरो टॉलरेंस का अर्थ केवल निचले स्तर के कर्मचारी पर एफआईआर दर्ज कर देना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है कि पद, प्रभाव, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक शक्ति से ऊपर उठकर निष्पक्ष कार्रवाई की जाए।
मुख्यमंत्री ने इस मामले को आस्था से जुड़ा विषय बताया है और इसे अत्यंत गंभीर अपराध कहा है। यदि सरकार इस कथन पर पूरी तरह अमल करना चाहती है तो उसे सबसे पहले उन सभी लोगों की भूमिका की जांच करानी चाहिए जो मंदिर की वित्तीय व्यवस्था, प्रशासनिक नियंत्रण और दान प्रबंधन से जुड़े रहे हैं। जांच का दायरा जितना व्यापक होगा, जनता का विश्वास उतना ही मजबूत होगा।
संपत्ति की जांच इस पूरे प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। यदि किसी अधिकारी, पदाधिकारी या संबंधित व्यक्ति की संपत्ति उसके ज्ञात आय स्रोतों से मेल खाती है तो उसका नाम स्वतः संदेह से बाहर हो जाएगा। दूसरी ओर यदि आय और संपत्ति में असामान्य अंतर पाया जाता है तो जांच एजेंसियों को आगे बढ़ने का ठोस आधार मिलेगा। यही कारण है कि निष्पक्ष जांच का सबसे प्रभावी तरीका सभी संबंधित लोगों की संपत्ति का स्वतंत्र सत्यापन है।
यह जांच केवल वर्तमान पदाधिकारियों तक सीमित न रहे। जिन अधिकारियों या कर्मचारियों ने पूर्व में इस व्यवस्था को संभाला है और जिनकी भूमिका प्रासंगिक बनती है, उनकी भी जांच की जानी चाहिए। यदि किसी के कार्यकाल में वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिलते हैं तो उस अवधि की भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी अपेक्षा है। श्रद्धालु यह विश्वास करके दान देते हैं कि उनका अर्पण धार्मिक कार्यों, सेवा और जनकल्याण में उपयोग होगा। यदि उस विश्वास पर प्रश्नचिह्न लगता है तो उसकी भरपाई केवल बयानबाजी से नहीं हो सकती।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। इसके लिए दान गणना की पूरी प्रक्रिया की लाइव डिजिटल रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र ऑडिट, समयबद्ध निरीक्षण, नियमित सामाजिक लेखा परीक्षा और तकनीकी निगरानी जैसी व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए। प्रत्येक दान की गणना बहुस्तरीय निगरानी में हो और उसका डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक बयान की नहीं, बल्कि ऐसे ठोस कदमों की है जिनसे जनता को यह विश्वास हो कि किसी निर्दोष को फंसाया नहीं जाएगा और किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाया भी नहीं जाएगा। कानून का एक ही पैमाना होना चाहिए।
यदि सरकार वास्तव में निष्पक्ष है तो उसे स्वयं आगे बढ़कर मंदिर समिति के अध्यक्ष, सभी नामित पदाधिकारियों, संबंधित अधिकारियों, दान व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों तथा आवश्यक होने पर संबंधित पुरोहितों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की वैधानिक प्रक्रिया के तहत संपत्ति की जांच कराने का निर्णय लेना चाहिए। इससे यदि सभी निर्दोष हैं तो उनका सम्मान और बढ़ेगा, और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसका भी पर्दाफाश होगा।
बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) में फर्जी बिलों का मामला गहराया
बदरीनाथ धाम में चढ़ावे की कथित हेराफेरी के बीच अब बीकेटीसी में वीआईपी यात्रियों के ठहरने और खानपान के नाम पर फर्जी बिल बनाने का मामला भी गंभीर रूप ले चुका है। तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई 2025 से जुड़े कई संदिग्ध भुगतान चिह्नित करते हुए सरकार को भेजी प्राथमिक रिपोर्ट में उच्च स्तरीय जांच की सिफारिश की है। रिपोर्ट में पूर्व सीईओ विजय थपलियाल द्वारा नियमों के विपरीत छह लाख रुपये की अग्रिम धनराशि स्वीकृत करने और मुख्य प्रभारी अधिकारी अनिल ध्यानी के प्रस्ताव पर सवाल उठाए गए हैं।
जांच के दौरान कई ऐसे नाम सामने आए, जिनके बारे में दावा किया गया कि उन्होंने बीकेटीसी से कोई सुविधा या भुगतान लिया ही नहीं। विधायक आशा नौटियाल और भाजपा नेत्री नेहा जोशी ने स्पष्ट किया कि उनके ठहरने और भोजन का पूरा खर्च उन्होंने स्वयं वहन किया था। इसी तरह हेरिटेज एविएशन के सीईओ रोहित माथुर ने लिखित रूप से बताया कि एक वीआईपी अतिथि का संपूर्ण खर्च उनकी कंपनी ने उठाया था, जबकि बीकेटीसी के रिकॉर्ड में उसके नाम पर 60 हजार रुपये का बिल दर्ज था। जांच में ऐसे कई अन्य मामलों का भी उल्लेख है, जिनमें लोगों के नाम पर हजारों रुपये के भुगतान दर्शाए गए। इन खुलासों ने बीकेटीसी की वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
बदरीनाथ धाम की पवित्रता किसी व्यक्ति, पद या संस्था से कहीं अधिक बड़ी है। करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इसलिए इस मामले में आधी-अधूरी जांच नहीं, बल्कि ऐसी निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यापक जांच होनी चाहिए जो हर संदेह का अंत कर दे। तभी यह कहा जा सकेगा कि सरकार ने आस्था की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने निर्णयों से भी की है।
