लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में महिला डॉक्टर के कथित यौन शोषण, जबरन गर्भपात और धर्मांतरण के दबाव से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है। अब जांच की आंच आगरा और एटा मेडिकल कॉलेज तक पहुंच गई है। जांच एजेंसी कथित तौर पर 100 से अधिक डॉक्टरों और मौलानाओं के नेटवर्क, उनके आपसी संपर्कों और आर्थिक लेनदेन की पड़ताल कर रही है।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
100 से अधिक लोगों के कथित नेटवर्क की जांच
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में मुख्य आरोपित डॉ. रमीजुद्दीन उर्फ रमीज मलिक और उसके करीबी बताए जा रहे डॉ. रिजवान मलिक सहित कई लोगों के संपर्कों की जांच की जा रही है। जांच में अदनान अंसारी का नाम भी सामने आया है। STF यह पता लगाने में जुटी है कि इन लोगों के बीच किस तरह का नेटवर्क काम कर रहा था और विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में इनके संपर्क कितने व्यापक थे।
जकात के नाम पर हर महीने 10 लाख रुपये जुटाने का आरोप
जांच से जुड़ी रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कथित नेटवर्क से जुड़े लोग जकात के नाम पर हर महीने करीब 10 लाख रुपये एकत्र करते थे। STF अब इस रकम के स्रोत, बैंक खातों, लेनदेन और इस्तेमाल की जांच कर रही है। एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि धनराशि किन लोगों से जुटाई जाती थी और इसका उपयोग किन गतिविधियों में किया जाता था।
‘इस्लामिक मेडिकोज’ नाम के कथित समूह की पड़ताल
पड़ताल में ‘इस्लामिक मेडिकोज’ नाम के एक कथित समूह का उल्लेख भी सामने आया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पुस्तकों और पत्रिकाओं के माध्यम से मेडिकल कॉलेजों में नए दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों से संपर्क स्थापित किया जाता था। STF इस कथित समूह की गतिविधियों, उसके सदस्यों और मेडिकल कॉलेजों में उसके संपर्कों की जानकारी जुटा रही है।
एटा मेडिकल कॉलेज में डॉ. रिजवान की तैनाती भी जांच के घेरे में
डॉ. रिजवान मलिक करीब पांच साल तक एटा मेडिकल कॉलेज में तैनात रहा था। अक्टूबर 2023 में एक असिस्टेंट प्रोफेसर की गाड़ी में तोड़फोड़ के मामले में तत्कालीन प्राचार्य डॉ. रजनी पटेल, अकाउंटेंट अभिषेक और डॉ. रिजवान मलिक के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
इसके अलावा सूत्रों के हवाले से आरोप लगाया गया है कि एटा मेडिकल कॉलेज में तैनाती के दौरान डॉ. रिजवान ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर गैर-मुस्लिम छात्र-छात्राओं के परीक्षा परिणाम प्रभावित कराए और उन्हें सप्लीमेंट्री दिलवाई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।
KGMU के कई विभागों की भूमिका भी जांच के दायरे में
इस मामले में STF की जांच केवल मुख्य आरोपित तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, KGMU के पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, रेडियोलॉजी, मेडिसिन, बायोकेमिस्ट्री और गांधी वार्ड से जुड़े पहलुओं की भी पड़ताल की गई है। रिपोर्ट में 29 पुरुषों के नामों का उल्लेख होने की बात कही गई है, जिनमें 16 डॉक्टर, प्रोफेसर और फैकल्टी सदस्य बताए गए हैं। इसके अलावा 12 महिलाओं को कथित पीड़िताओं के रूप में दर्ज किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
शासन ने KGMU प्रशासन से मांगी कार्रवाई की रिपोर्ट
STF की जांच रिपोर्ट के आधार पर शासन ने KGMU प्रशासन को संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने और उसकी रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में आगे की कार्रवाई पर विचार कर रहा है। कार्य परिषद की बैठक में भी STF रिपोर्ट और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े पहलुओं पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई है।
क्या है पूरा मामला?
KGMU के पैथोलॉजी विभाग में तैनात रहे डॉ. रमीजुद्दीन उर्फ रमीज मलिक पर एक जूनियर महिला डॉक्टर ने शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने, जबरन गर्भपात कराने और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की। इसके बाद जांच में अन्य संपर्कों और कथित गतिविधियों के पहलुओं की भी पड़ताल शुरू हुई।
अब STF की जांच पर टिकी निगाहें
आगरा और एटा मेडिकल कॉलेज तक जांच पहुंचने के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो गए हैं। क्या मेडिकल कॉलेजों में विद्यार्थियों को जोड़ने के लिए कोई संगठित नेटवर्क सक्रिय था? जकात के नाम पर कथित रूप से जुटाई गई रकम कहां खर्च होती थी? एटा में परीक्षा परिणाम प्रभावित करने के आरोपों में कितनी सच्चाई है? क्या मेडिकल संस्थानों के जिम्मेदार अधिकारियों को इन गतिविधियों की जानकारी थी? इन सभी सवालों का जवाब STF की विस्तृत जांच से सामने आने की उम्मीद है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की टिप्पणी: मेडिकल कॉलेज शिक्षा, चिकित्सा और शोध के प्रतिष्ठित संस्थान हैं। यहां किसी भी प्रकार का यौन शोषण, दबाव, धमकी, जबरन गर्भपात या धर्मांतरण का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही किसी धर्म या समुदाय के निर्दोष लोगों को बिना प्रमाण संदेह के घेरे में रखना भी उचित नहीं है। कानून सबके लिए समान है और इस मामले में निष्पक्ष जांच के साथ दोषियों को सजा तथा पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
