केदारताल की बर्फीली वादियों में दो सगी बहनों की मौत, बढ़ती झील के खतरे ने बढ़ाई चिंता; प्राकृतिक बांध टूटा तो 45 मिनट में गंगोत्री तक पहुंच सकती है जलप्रलय की लहर


उत्तरकाशी/लखनऊ। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित केदारताल ट्रेक पर बर्फबारी और हिमस्खलन ने दो परिवारों की खुशियां छीन लीं। लखनऊ की दो सगी बहनें वर्तिका वर्मा और दीपिका वर्मा इस प्राकृतिक आपदा की चपेट में आकर जिंदगी की जंग हार गईं। बुधवार सुबह चलाए गए सर्च ऑपरेशन के दौरान दोनों के शव बरामद किए गए। हादसे की खबर लखनऊ स्थित उनके घर पहुंचते ही परिवार में कोहराम मच गया। जिस सफर पर दोनों बहनें रोमांच और खूबसूरत पहाड़ी नजारों की यादें संजोने निकली थीं, वही सफर उनके जीवन का आखिरी सफर बन गया।
इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ट्रेकिंग की सुरक्षा, बदलते मौसम और हिमस्खलन के खतरे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि जिस केदारताल क्षेत्र में यह हादसा हुआ, उसी झील को लेकर वैज्ञानिकों ने भविष्य में बड़े जलप्रलय की आशंका भी जताई है। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच), रुड़की के वैज्ञानिकों के शोध के मुताबिक, यदि केदारताल का प्राकृतिक बांध टूटता है तो महज 45 मिनट में बाढ़ की लहर गंगोत्री तक पहुंच सकती है।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


गुडंबा के गायत्रीपुरम की रहने वाली थीं दोनों बहनें
मृतकों की पहचान लखनऊ के गुडंबा क्षेत्र स्थित गायत्रीपुरम निवासी वर्तिका वर्मा और दीपिका वर्मा के रूप में हुई है। दोनों उत्तरकाशी के प्रसिद्ध केदारताल ट्रेक पर गई थीं। यह क्षेत्र ऊंचाई पर स्थित होने के कारण अत्यधिक ठंड, बर्फबारी और अचानक मौसम बदलने जैसी चुनौतियों से घिरा रहता है।
जानकारी के अनुसार, ट्रेकिंग के दौरान दोनों बहनें बर्फबारी और हिमस्खलन की चपेट में आ गईं। घटना के बाद उनकी तलाश के लिए बचाव एवं सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया। परिवार को लगातार दोनों की सुरक्षित वापसी की उम्मीद थी, लेकिन बुधवार सुबह उनके शव मिलने की सूचना ने परिजनों को गहरे सदमे में डाल दिया।
हादसे के समय उनके साथ ट्रेकिंग दल में कितने अन्य सदस्य मौजूद थे, हिमस्खलन किस समय हुआ और अन्य लोगों की स्थिति क्या रही, इसकी विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है। शवों को लखनऊ लाने की प्रक्रिया और प्रशासन की ओर से आगे की कार्रवाई का विवरण भी प्रतीक्षित है।
केदारताल झील का तेजी से बढ़ता आकार वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय
दो बहनों की मौत के बीच केदारताल झील को लेकर सामने आया वैज्ञानिक अध्ययन भी गंभीर चिंता पैदा करता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिमोट सेंसिंग में प्रकाशित शोध में झील के बढ़ते क्षेत्रफल, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में संभावित बाढ़ का वैज्ञानिक आकलन किया गया है।
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, केदारताल झील का क्षेत्रफल वर्ष 1990 के आसपास 64,455.86 वर्गमीटर था। वर्ष 2020 में यह बढ़कर 1,05,772.99 वर्गमीटर और वर्ष 2025 में 1,33,823.1 वर्गमीटर हो गया। इस प्रकार लगभग 35 वर्षों में झील के क्षेत्रफल में 107.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच ही झील का विस्तार करीब 28 हजार वर्गमीटर बढ़ गया।
सितंबर 2026 में लगभग 20 वैज्ञानिकों की टीम ने झील का सर्वेक्षण किया। सर्वे के दौरान इसकी लंबाई करीब 600 मीटर और चौड़ाई लगभग 200 मीटर मापी गई। झील की अधिकतम गहराई 13 मीटर तथा अनुमानित जल भंडारण क्षमता करीब 1.56 अरब लीटर आंकी गई।
प्राकृतिक बांध टूटा तो 45 मिनट में गंगोत्री तक पहुंच सकती है बाढ़
वैज्ञानिकों ने झील के प्राकृतिक बांध के टूटने की काल्पनिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए दो आयामी जलगतिकीय मॉडल का इस्तेमाल किया। इस मॉडल के मुताबिक, यदि झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो उससे निकलने वाली बाढ़ की लहर शुरुआती 15 मिनट में ही अधिकतम प्रवाह तक पहुंच सकती है। इस दौरान पानी का प्रवाह लगभग 2,800 घनमीटर प्रति सेकंड तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
इसके बाद बाढ़ का पानी केदारगंगा घाटी से होते हुए करीब 20 किलोमीटर का रास्ता तय कर लगभग 45 मिनट में गंगोत्री पहुंच सकता है। गंगोत्री पहुंचने के बाद भी पानी का प्रवाह लगभग 1,450 घनमीटर प्रति सेकंड रहने का अनुमान है। घाटी के संकरे हिस्सों में पानी की गहराई दो मीटर तक हो सकती है, जबकि संगम के आसपास बसे क्षेत्रों में संभावित जलभराव की गहराई शून्य से 15 मीटर तक रहने का आकलन किया गया है।
ऐसी स्थिति में नदी किनारे बसे क्षेत्रों, सड़कों, पुलों, भवनों और अन्य बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका है।
केदारगंगा से भागीरथी और फिर ऋषिकेश तक पहुंच सकता है पानी
शोधकर्ता डॉ. लवकुश कुमार पटेल के अनुसार, तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमनद झीलों का विस्तार हो रहा है। अत्यधिक बारिश और प्राकृतिक बांधों पर बढ़ता दबाव ऐसी झीलों को भविष्य में खतरनाक बना सकता है।
उन्होंने बताया कि केदारगंगा नदी गंगोत्री में भागीरथी नदी से मिलती है। ऐसे में यदि झील से अचानक भारी मात्रा में पानी निकलता है तो उसका प्रभाव केवल केदारताल और गंगोत्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नदी के प्रवाह के साथ आगे के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। यह पानी भागीरथी के रास्ते ऋषिकेश तक पहुंचने की आशंका पैदा कर सकता है।
प्रशासन और आपदा प्रबंधन के सामने बड़ी चुनौती
केदारताल में दो सगी बहनों की मौत और झील के बढ़ते आकार को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी, दोनों घटनाएं हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक जोखिम की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं। वैज्ञानिकों ने हिमनद झीलों की नियमित निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, प्राकृतिक बांधों की स्थिति का आकलन और समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता बताई है।
यह भी जरूरी है कि ऊंचाई वाले ट्रेकिंग मार्गों पर मौसम की सटीक जानकारी, हिमस्खलन की चेतावनी, प्रशिक्षित गाइड, सुरक्षित पड़ाव और आपातकालीन बचाव व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
वर्तिका और दीपिका की मौत ने दो परिवारों को ऐसा दुख दिया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वहीं केदारताल से जुड़ा वैज्ञानिक अध्ययन नीति-निर्माताओं और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए चेतावनी है कि हिमालय की बदलती परिस्थितियों को नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है। सवाल केवल एक ट्रेकिंग हादसे का नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की सुरक्षा का है जो इन पहाड़ों में रहते हैं और जिनकी जिंदगी नदियों तथा हिमालयी झीलों से जुड़ी है।