विश्व बैंक की रिपोर्ट के आंकड़ों और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बीच सवालों का अंतर; उत्तराखंड में भी राशन व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
उत्तराखंड। विश्व बैंक की गरीबी एवं समानता संबंधी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2011 से 2023 के बीच भारत में करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिदिन 4.20 डॉलर की क्रय शक्ति के आधार पर गरीबी का अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया है। यदि ये आंकड़े वास्तविक आर्थिक सुधार की तस्वीर पेश करते हैं, तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि जब करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आ चुके हैं, तो देश में 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन देने की आवश्यकता क्यों बनी हुई है?
यह सवाल उत्तराखंड के संदर्भ में भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उत्तराखंड को देश के अपेक्षाकृत छोटे राज्यों में गिना जाता है, लेकिन यहां पहाड़ और मैदान की आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा अंतर है। पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन, सीमित रोजगार, खेती की कठिनाइयां और मौसमी आय की समस्या है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में औद्योगिक रोजगार के बावजूद बड़ी संख्या में मजदूर और असंगठित क्षेत्र के कामगार आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड में मुफ्त राशन पाने वाले सभी परिवार वास्तव में आज भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं? क्या राशन कार्डों का नियमित सत्यापन हो रहा है? क्या आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके परिवार अब भी गरीबों के लिए निर्धारित सरकारी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं?
सरकार एक तरफ गरीबी घटने और लोगों की आय में सुधार के आंकड़े प्रस्तुत करती है, दूसरी तरफ करोड़ों परिवारों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था जारी रखती है। निश्चित रूप से जरूरतमंद परिवारों को खाद्य सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन पात्रता की पारदर्शी समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि गरीबी रेखा से ऊपर आ जाने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम हो गया है। अनियमित रोजगार, महंगाई, बीमारी, बच्चों की शिक्षा और मकान का खर्च किसी परिवार को दोबारा आर्थिक संकट में डाल सकता है। इसलिए मुफ्त राशन बंद करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि इसका लाभ सही पात्र परिवारों तक पहुंच रहा है या नहीं।
सरकार से कुछ सीधे सवाल
क्या उत्तराखंड में मुफ्त राशन पाने वाले परिवारों का आय और आर्थिक स्थिति के आधार पर ताजा सर्वेक्षण कराया जाएगा?
क्या अपात्र और आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों को योजना से बाहर कर वास्तविक जरूरतमंदों को प्राथमिकता दी जाएगी?
क्या पहाड़ के गरीब, भूमिहीन मजदूर, विधवा, बुजुर्ग और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की अलग से पहचान की जाएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, यदि गरीबी तेजी से घट रही है तो उत्तराखंड में स्थायी रोजगार, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की स्थिति में कितना सुधार हुआ है?
गरीबी घटने का दावा स्वागत योग्य है, लेकिन असली कसौटी यह है कि लोगों को मुफ्त राशन पर निर्भर रहने के बजाय सम्मानजनक रोजगार और स्थायी आमदनी कब मिलेगी। सरकार को आंकड़ों के साथ जमीन पर भी अपनी उपलब्धियों का हिसाब देना चाहिए।
