14 अप्रैल 1990 श्रीनगर का शेर कश्मीर इंस्टट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस सरला भट्ट नाम की एक 25 साल की नर्स अपना काम खत्म करके हॉस्टल के कमरे में आराम कर रही होती है। तभी अचानक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के हथियारबंद आतंकी उनके कमरे में घुसते हैं।

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बंदूक की नोक पर सरला को अगवा करते हैं। लगातार चार दिनों तक इस कश्मीरी पंडित नर्स का सामूहिक बलात्कार किया जाता है। उसे तरह-तरह की यातनाएं दी जाती हैं। फिर पांचवें दिन 18 अप्रैल को उसकी लाश श्रीनगर के डाउनटाउन में फेंक दी जाती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

खून से रिसता हुआ शरीर और शरीर में गोलियों के निशान और कई अंग कटे हुए होते हैं जो उसके साथ हुई क्रूरता की गवाही दे रहे थे। लाश के साथ एक हाथ से लिखा हुआ नोट भी पड़ा हुआ था जिसमें जेकेएलएफ के दहशतगर्दों ने सरला भट्ट को पुलिस का मुखबिर बताया था। उसकी हत्या करने की बात कबूली थी। 36 साल तक सरला का परिवार न्यायिक इंतजार में था। 2017 और 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दो बार घाटी में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार की दोबारा जांच की याचिका को खारिज कर दिया। लेकिन 12 अगस्त 2025 को स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने इस केस को फिर से खोला और अब यह खबर आई है कि एजेंसी ने यह केस सुलझा लिया है। कट टू 29 जून 2026 यानी करीब 36 साल बाद जम्मू कश्मीर लिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने 29 जून को एक संदेश के साथ प्रेस नोट जारी किया। ना कोई आतंकी अपराध भुलाया जाएगा ना कोई अपराधी कानून की पकड़ से बच पाएगा। जम्मू कश्मीर पु बताया कि एजेंसी ने करीब 36 साल पुराने सरला भट्ट अपहरण और हत्याकांड मामले में श्रीनगर की टाडा कोर्ट में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। इसमें अलगाववादी संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी जेकेएलएफ के लीडर यासीन मलिक समेत पांच लोगों के नाम है। यासीन मलिक फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है और उम्र कैद की सजा काट रहा है। चार्ज शीट के मुताबिक सरला भट्ट को अगवा किया गया, टॉर्चर किया गया था और फिर उनकी हत्या कर दी गई थी। केस के पांच आरोपियों में से तीन की मौत हो चुकी है। जबकि एक आरोपी अभी फरार है। पुलिस जांच ये कर रही है कि हत्या यासीन मलिक के कहने पर की गई थी या फिर नहीं। आज हम सरला भट्ट केस की कहानी जानेंगे। कौन थी सरला भट्ट? 36 साल पहले किस तरह जेकेएलएफ के आतंकियों ने उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी और इस मामले में यासिन मलिक का नाम कैसे जुड़ा।

1990 की वो खौफनाक दास्तान जिसे भुलाया नहीं जा सकता

साल 1990 का दौर घाटी में रहने वाले अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। इसी खौफनाक दौर की एक बेहद दर्दनाक और रूह कंपा देने वाली कहानी है सरला भट्ट की। अनंतनाग की रहने वाली 27 वर्षीय सरला भट्ट पेशे से एक नर्स थीं, जो श्रीनगर के सौरा स्थित ‘शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ (SKIMS) में अपनी सेवाएं दे रही थीं। लेकिन कश्मीरी पंडित होने के कारण वे उस दौर में पनपे चरमपंथ की क्रूर शिकार बनीं।

अपहरण और पांच दिनों का मानसिक व शारीरिक टॉर्चर

यह खौफनाक सिलसिला 14 अप्रैल 1990 को शुरू हुआ। सरला भट्ट SKIMS के ‘हब्बा खातून हॉस्टल’ में थीं, जब हथियारबंद आतंकी बंदूक की नोक पर उनका अपहरण कर ले गए। अगले पांच दिनों तक उनका कोई सुराग नहीं मिला। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इन पांच दिनों के दौरान आतंकियों ने उन्हें बंधक बनाकर रखा, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया और उन्हें अमानवीय यातनाएं दीं।

सड़क पर मिला क्षत-विक्षत शव

अपहरण के पांच दिन बाद, 19 अप्रैल 1990 को सरला भट्ट का बेहद क्षत-विक्षत और क्षत-विक्षत शव सड़क पर फेंका हुआ मिला। दरिंदगी की हद यह थी कि उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। उनके बेजान जिस्म के पास आतंकियों ने एक नोट भी छोड़ा था, जिसमें अपनी इस बर्बरता को सही ठहराने के लिए सरला को पुलिस का ‘मुखबिर’ बताया गया था।

कानूनी जांच और विसंगतियां

इस जघन्य हत्याकांड को लेकर निगीन पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 56/1990 दर्ज की गई थी। हालांकि, राष्ट्रीय दैनिक ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस आधिकारिक दस्तावेज में उनके साथ हुई यौन हिंसा (रेप) का कोई उल्लेख नहीं किया गया था, जो उस दौर की प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है। इस पूरे मामले में प्रतिबंधित संगठन जेकेएलएफ (JKLF) के तत्कालीन नेता पीर नूरुल हक शाह उर्फ ‘एयर मार्शल’ का नाम मुख्य आरोपी के रूप में सामने आया था।

सरला भट्ट की हत्या क्यों की गई?

SKIMS श्रीनगर के सौरा इलाके में स्थित था, जिसे कश्मीरी में ‘सोवुर’ भी कहा जाता है। उस समय यह इलाका जेकेएलएफ और उसके समर्थकों का गढ़ माना जाता था। सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में घायल हुए जेकेएलएफ के सदस्यों को इलाज के लिए अक्सर इसी अस्पताल में लाया जाता था। भट्ट का उनसे अक्सर सामना होता था। जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इन सदस्यों को शक होने लगा था कि SKIMS में काम करने वाली एक कश्मीरी पंडित नर्स, घायलों के बारे में जानकारी पुलिस या खुफिया एजेंसियों तक पहुंचा सकती है। भट्ट को कई बार धमकियां भी दी गईं, लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी। 8 अप्रैल 1990 को, खुफिया जानकारी के आधार पर जम्मू कश्मीर पुलिस ने नरवारा में छापेमारी की और जेकेएलएफ के बड़े सदस्यों को पकड़ने की कोशिश की। उस समय वहाँ मौजूद मलिक ने पुलिस को देख लिया, लेकिन वह घायल होने के बावजूद भागने में कामयाब रहा। जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, चार्जशीट में कहा गया है कि मलिक ने यह नतीजा निकाला था कि शायद किसी कश्मीरी पंडित नर्स ने पुलिस को खबर दी थी। हालांकि, इस नतीजे का कोई सबूत नहीं था। इसके बजाय, एसआईए की चार्जशीट में साफ़ तौर पर कहा गया है कि भट पर मुखबिर होने का आरोप पूरी तरह से झूठा था और इसे एक पहले से सोची-समझी हत्या को अंजाम देने का बहाना बनाने के लिए गढ़ा गया था। 18 अप्रैल 1990 की सुबह, भट को उनके अस्पताल के पास से बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया गया था। अगले दिन जब उनका शव मेडिकल इंस्टिट्यूट के पास के इलाके मल्लाबाग से मिला, तो उनके शरीर पर कई गोलियों के निशान थे। उनके शव के पास हाथ से लिखा एक नोट मिला, जिसमें उन पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगाया गया था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कई कश्मीरी पंडित संगठनों ने आरोप लगाया कि हत्या से पहले भट को “यातना दी गई और उनके साथ बलात्कार किया गया”; हालांकि, पुलिस रिपोर्ट में सिर्फ़ हत्या का ज़िक्र था। उनकी बेरहमी से हत्या के बाद, जम्मू कश्मीर पुलिस ने श्रीनगर के नगीन पुलिस स्टेशन में अज्ञात उग्रवादियों के खिलाफ़ मामला (FIR नंबर 56/1990 के तहत) दर्ज किया। जांच में बहुत कम प्रगति हुई और 1990 के दशक की शुरुआत में पुलिस द्वारा दर्ज की गई कई FIR को आखिरकार ‘अनट्रेस्ड’ (बिना किसी सुराग के) मानकर बंद कर दिया गया।

SIA ने भट की हत्या की जांच कब दोबारा शुरू की?

जम्मू कश्मीर डीजीपी के आदेश पर मार्च 2024 में यह केस एसआईए जम्मू कश्मीर को सौंप दिया गया था। पिछले साल अगस्त में एसआईए ने भट की हत्या की जांच फिर से शुरू की। एजेंसी ने श्रीनगर में कई जगहों पर छापेमारी की, जिसमें मलिक और पूर्व कमांडर जावेद अहमद मीर के घर के अलावा जेकेएलएफ के छह अन्य संदिग्ध सदस्य भी शामिल थे।

चार्जशीट में क्या आरोप लगाए गए हैं?

चार्जशीट में मलिक के साथ चाल्कू का भी ज़िक्र है, जिसकी पहचान उस व्यक्ति के तौर पर हुई है जिसने गोली चलाई थी। जैसा कि पहले बताया गया है, बाकी तीन लोग शेख, सोफी और टपलू मारे जा चुके हैं। मलिक अभी टेरर फंडिंग के एक अलग मामले में न्यायिक हिरासत में है। वह उम्रकैद की सज़ा काट रहा है। माना जाता है कि चाल्कू पीओके भाग गया है। अधिकारियों ने उसके ख़िलाफ़ उद्घोषणा की कार्यवाही शुरू कर दी है। जम्मू कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया: जांच से पता चला कि सुश्री सरला भट को आखिरी बार 18 अप्रैल 1990 को दोपहर करीब 2:30 बजे SKIMS में जीवित देखा गया था और उसके बाद JKLF के आतंकवादियों ने उनका अपहरण कर लिया था। चश्मदीदों और सुरक्षित गवाहों ने लगातार कहा है कि उन्हें बुचपोरा क्रॉसिंग के पास आरोपी के साथ देखा गया था, जिसके बाद उन्हें इलाहीबाग-लाल बाज़ार इलाके की ओर ले जाया गया, जहाँ उनके साथ बेरहमी से मारपीट की गई, उन्हें घसीटा गया, प्रताड़ित किया गया और आखिरकार 18 अप्रैल 1990 की शाम को ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। इन आरोपों में रणबीर दंड संहिता (RPC) के तहत अपहरण, गलत तरीके से रोकना, हत्या, आपराधिक साजिश और सबूत नष्ट करना, साथ ही TADA और आर्म्स एक्ट के संबंधित प्रावधान शामिल हैं। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने मीडिया को बताया कि SIA की जांच से यह पक्के तौर पर साबित होता है कि 18 अप्रैल 1990 को JKLF के आतंकवादियों ने संगठन के कमांड स्ट्रक्चर के तहत रची गई आपराधिक साजिश के तहत सुश्री सरला भट का अपहरण किया, उन्हें प्रताड़ित किया और उनकी हत्या कर दी। चश्मदीदों के बयान, मेडिकल और बैलिस्टिक जांच के नतीजे, आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने वाला नोट, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, गवाहों के बयान और आसपास की परिस्थितियां मिलकर सबूतों की एक ऐसी ठोस और पुख्ता कड़ी बनाती हैं जो यह साबित करती है कि यह हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ JKLF के सुनियोजित और लक्षित हिंसा अभियान का हिस्सा थी। इस अभियान का मकसद दहशत फैलाना और कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी से जबरन पलायन के लिए मजबूर करना था।

चार्जशीट दाखिल करने में 35 साल क्यों लगे?

एसआईए के अनुसार, सालों तक उग्रवादी समूहों के लगातार डर और धमकियों की वजह से गवाह सामने आने से हिचकिचाते रहे। मार्च 2024 में मामला SIA को सौंपे जाने के बाद, जांचकर्ताओं ने पूरे मामले को फिर से खोला, पुराने रिकॉर्ड की दोबारा जांच की और नए बयान तथा फोरेंसिक, बैलिस्टिक, मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक सबूत इकट्ठा किए। एजेंसी ने कहा कि उसने दशकों में जमा किए गए सुरक्षित गवाहों के बयानों, स्वतंत्र चश्मदीदों के बयानों, दस्तावेज़ी रिकॉर्ड और वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर घटनाओं के पूरे क्रम को फिर से तैयार किया।


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