पुष्कर-गया में पिंडदान के बाद घर पर श्राद्ध करना चाहिए या नहीं? पंडित त्रिलोचन पनेरु ने दूर किया भ्रम

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उत्तराखंड/रुद्रपुर। पितृपक्ष के दौरान पितरों के प्रति श्रद्धा, तर्पण तथा श्राद्ध कर्म को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में एक प्रमुख प्रश्न यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने पुष्कर, गया जी या बद्रीनाथ जैसे तीर्थस्थलों पर पिंडदान एवं श्राद्ध करा दिया है, तो क्या उसके बाद घर पर पितृपक्ष अथवा वार्षिक श्राद्ध करने की आवश्यकता रहती है?
आध्यात्मिक विषयों के अध्येता पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार तीर्थस्थल पर किया गया श्राद्ध अपने स्थान पर विशेष धार्मिक महत्व रखता है, लेकिन इससे गृहस्थ के वार्षिक श्राद्ध, तर्पण तथा पितरों के प्रति निर्धारित कर्तव्यों का पूर्ण रूप से अंत नहीं माना जाना चाहिए।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


उन्होंने बताया कि गया, पुष्कर अथवा अन्य तीर्थों में किया गया पिंडदान पितरों की तृप्ति एवं सद्गति की कामना से किया जाने वाला विशेष कर्म है। वहीं पितृपक्ष में अपने घर पर किया जाने वाला पार्वण श्राद्ध तथा वार्षिक तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध अलग धार्मिक कर्तव्य की श्रेणी में आता है। इसलिए तीर्थ श्राद्ध को घर के नियमित श्राद्ध का पूर्ण विकल्प मानना उचित नहीं है।
पंडित पनेरु के अनुसार तीर्थ में पिंडदान के बाद घर पर श्राद्ध की विधि परिवार की परंपरा, कुलाचार तथा संबंधित आचार्य के निर्देश के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए। कई कर्मकांड परंपराओं में तीर्थ पर पिंडदान के बाद पुनः उसी प्रकार पिंड निर्माण करने के स्थान पर तर्पण, संकल्प, ब्राह्मण भोजन अथवा यथाशक्ति दान जैसे कर्मों का विधान बताया जाता है। इसलिए किसी भी परिवार को स्वयं से नियम निर्धारित करने के बजाय अपने कुलपुरोहित या योग्य आचार्य से विधि पूछनी चाहिए।
उन्होंने पितृपक्ष में तर्पण, पंचबलि तथा श्रद्धापूर्वक अन्न अथवा दान की परंपरा का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि श्राद्ध का मूल भाव केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण तथा श्रद्धा व्यक्त करना है।
पंडित त्रिलोचन पनेरु ने कहा कि तीर्थ श्राद्ध को लेकर यह धारणा बना लेना कि अब जीवनभर घर पर पितरों का स्मरण या श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, उचित नहीं है। उन्होंने धर्मावलंबियों से आग्रह किया कि पितृपक्ष में अपनी पारिवारिक परंपरा तथा शास्त्रीय विधि के अनुसार पितरों का तर्पण करें और आवश्यकता होने पर विद्वान आचार्य से मार्गदर्शन लें।
उन्होंने यह भी कहा कि पितृपक्ष सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है। तीर्थ में किया गया पिंडदान हो या घर पर किया जाने वाला श्राद्ध—दोनों का उद्देश्य श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण और उनकी शांति की कामना करना है।
आध्यात्मिक संदेश: पितरों के प्रति श्रद्धा किसी एक तीर्थ अथवा एक अवसर तक सीमित नहीं मानी जाती। परिवार की परंपरा, कुलाचार तथा स्थानीय कर्मकांड-विधि के अनुसार योग्य आचार्य से परामर्श लेकर श्राद्ध एवं तर्पण करना ही उचित है।


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