संपादकीय: एक राज्य, दो नजरिए क्यों? महिला किसी मजहब की नहीं, इंसान होती है?

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मुस्लिम महिलाओं को घर, हिंदू महिलाओं के लिए क्या? धामी सरकार से उठे समानता के सवाल

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स की ओर से तीन तलाक, निकाह हलाला और बेसहारा मुस्लिम विधवा महिलाओं के लिए आवास और आर्थिक पुनर्वास की योजना का प्रस्ताव सामने आया है। बोर्ड की आगामी बैठक में इस प्रस्ताव पर विचार होना है। प्रस्ताव के तहत वक्फ संपत्तियों का इस्तेमाल कर जरूरतमंद महिलाओं को आवास देने और उन्हें रोजगार व कौशल विकास से जोड़ने की बात कही गई है।
महिलाओं को छत मिले, सम्मान मिले और वे अपने बच्चों के साथ सुरक्षित जीवन जी सकें—इस मानवीय उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सवाल कहीं और है।
सवाल यह है कि अगर सरकार महिला कल्याण को अधिकार मानती है तो यह अधिकार धर्म की सीमा में क्यों बंटे?
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू है। ऐसे में राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह महिला कल्याण की ऐसी नीति बनाए जिसमें पीड़ित, तलाकशुदा, विधवा, परित्यक्ता और बेसहारा महिला की पहचान पहले इंसान के रूप में हो, उसके धर्म के आधार पर नहीं। उत्तराखंड की UCC व्यवस्था में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधान लागू हैं।
यहीं से धामी सरकार से एक सीधा सवाल बनता है—क्या उत्तराखंड में किसी हिंदू तलाकशुदा या बेसहारा महिला को भी ऐसी ही आवासीय सुरक्षा मिलेगी?
अगर जवाब हां है तो सरकार को इसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए। अगर जवाब नहीं है तो फिर महिला कल्याण की नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
वक्फ बोर्ड का धन और संपत्ति अपने वैधानिक उद्देश्य तथा लागू कानूनों के अधीन हैं। इसलिए इस योजना को सीधे राज्य सरकार की ओर से प्रत्येक मुस्लिम महिला को सरकारी मकान देने की घोषणा समझना भी अभी जल्दबाजी होगी। बोर्ड स्वयं कह रहा है कि प्रस्ताव आगामी बैठक में रखा जाएगा और पात्रता तथा संपत्तियों के इस्तेमाल की कानूनी स्थिति पर विचार किया जाना बाकी है।
लेकिन राजनीतिक प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वक्फ बोर्ड का यह प्रस्ताव सरकार के व्यापक सामाजिक न्याय के दावे के संदर्भ में देखा जाएगा।
यदि सरकार सचमुच महिला सशक्तीकरण चाहती है तो फिर नीति ऐसी क्यों न हो कि मुस्लिम महिला को वक्फ की संपत्ति से, हिंदू महिला को सरकारी योजना से और किसी अन्य समुदाय की महिला को किसी अलग खांचे से नहीं, बल्कि जरूरत के समान मानदंड से सहायता मिले?
यही असली परीक्षा है।
राजनीति में सबसे आसान रास्ता पहचान की राजनीति है। किसी समुदाय के लिए अलग घोषणा कर दीजिए, किसी दूसरे समुदाय के बीच आशंका पैदा कर दीजिए और फिर चुनावी बहस को विकास, रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था से हटाकर हिंदू-मुस्लिम विमर्श में ले जाइए।
लेकिन उत्तराखंड के मतदाता को इससे आगे देखने का अधिकार है।
क्या प्रदेश की हर बेसहारा महिला के लिए सरकार के पास समान नीति है?
किसी हिंदू परिवार की बेटी तलाक के बाद बेघर होती है तो उसके लिए क्या व्यवस्था है? किसी हिंदू विधवा के पास रहने को घर नहीं है तो उसे कौन-सी योजना के तहत स्थायी आवास मिलेगा? किसी महिला का पति उसे छोड़ देता है और वह बच्चों के साथ सड़क पर आ जाती है तो सरकार उसकी जिम्मेदारी किस योजना के माध्यम से उठाएगी?
इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक नारे से नहीं, सरकारी आंकड़ों और स्पष्ट नीति से मिलना चाहिए।
यह भी उतना ही जरूरी है कि बुलडोजर की राजनीति और कल्याणकारी राज्य की राजनीति को अलग-अलग कसौटी पर देखा जाए। यदि किसी अवैध निर्माण पर कानून के अनुसार कार्रवाई होती है तो उसका आधार धर्म नहीं, कानून होना चाहिए। लेकिन यदि कार्रवाई में समानता के सवाल उठते हैं तो सरकार को पारदर्शी आंकड़ों के साथ जवाब देना चाहिए। दूसरी तरफ किसी गरीब या बेसहारा परिवार को आवास दिया जाता है तो उसका आधार भी धार्मिक पहचान के बजाय स्पष्ट पात्रता मानदंड होना चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार किसी धर्म की मसीहा नहीं होती।
सरकार का काम है हर नागरिक के अधिकार की रक्षा करना।
इसलिए भाजपा सरकार के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा समुदाय खुश होगा और कौन नाराज। सवाल यह होना चाहिए कि राज्य की नीति कितनी समान, पारदर्शी और कानूनसम्मत है।
अगर वक्फ बोर्ड मुस्लिम महिलाओं के लिए आवास की पहल करता है तो सरकार को समानांतर रूप से यह भी बताना चाहिए कि आर्थिक रूप से कमजोर और बेसहारा हिंदू महिलाओं के लिए क्या व्यवस्था है। क्या उनके लिए अलग आवासीय सहायता योजना है? क्या तलाकशुदा महिलाओं के लिए पुनर्वास नीति है? क्या विधवाओं के लिए पर्याप्त आवास उपलब्ध हैं? कितनी महिलाओं को अब तक लाभ मिला और कितनी प्रतीक्षा सूची में हैं?
यही सवाल भाजपा सरकार से पूछे जाने चाहिए।
क्योंकि किसी मुस्लिम महिला को घर मिलना हिंदू महिला के अधिकार के खिलाफ नहीं है। असली समस्या तब पैदा होती है जब सरकार की नीति ऐसी दिखाई देने लगे जिसमें एक समुदाय के लिए संवेदना और दूसरे के लिए केवल राजनीतिक भाषण दिखाई दे।
उत्तराखंड देवभूमि है। यहां सामाजिक सौहार्द की राजनीति की जरूरत है, धार्मिक ध्रुवीकरण की नहीं।
सरकार यदि वास्तव में सबका विकास चाहती है तो उसे एक स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए—
उत्तराखंड में बेसहारा महिला की पहचान पहले महिला और नागरिक के रूप में होगी; उसका धर्म बाद में भी पूछा जा सकता है, लेकिन उसके अधिकार तय करने का आधार धर्म नहीं होगा।
मुस्लिम महिला को घर मिले—यह स्वागत योग्य है।
हिंदू महिला को भी घर मिले—यह उससे भी बड़ा सामाजिक न्याय होगा।
विधवा को सहारा मिले, तलाकशुदा को सुरक्षा मिले, परित्यक्ता को सम्मान मिले और गरीब परिवार की बेटी को सिर छिपाने की जगह मिले—यही कल्याणकारी राज्य की पहचान है।
उत्तराखंड की जनता को अब यह तय करना है कि वह राजनीतिक नारों में जवाब खोजती है या सरकारों से समान कानून, समान अवसर और समान सामाजिक सुरक्षा का हिसाब मांगती है।
सवाल हिंदू बनाम मुस्लिम का नहीं है।
सवाल है—सरकार किसके साथ न्याय कर रही है और क्या वह न्याय सबके लिए बराबर है?
यही सवाल धामी सरकार से भी पूछा जाना चाहिए और हर आने वाली सरकार से भी।
क्योंकि वोट किसी धर्म का नहीं होता, नागरिक का होता है। और सरकार की जिम्मेदारी भी किसी एक धर्म के प्रति नहीं, पूरे प्रदेश के प्रति होती है।


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