11 दिन का हरेला मानने वाले परिवारों में 6 जुलाई 2026 (सोमवार) को बीजारोपण किया गया और 16 जुलाई 2026 (गुरुवार, कर्क संक्रांति) को हरेला मनाया जाएगा।
10 दिन की परंपरा वाले परिवारों में 7 जुलाई 2026 (मंगलवार) को बीजारोपण किया गया।
9 दिन की परंपरा वाले परिवारों में 8 जुलाई 2026 (बुधवार) को बीजारोपण किया गया।
मुख्य हरेला पर्व इस विवरण के अनुसार 16 जुलाई 2026, गुरुवार (कर्क संक्रांति) को मनाया जाएगा।
उत्तराखंड की संस्कृति और हरेला का संबंध
हरेला उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊँ अंचल का सबसे महत्वपूर्ण लोकपर्व माना जाता है। यह केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, पर्यावरण और लोक संस्कृति का संगम है।
इसका उत्तराखंड की संस्कृति से गहरा संबंध इसलिए है क्योंकि:
यह सावन मास और वर्षा ऋतु के स्वागत का पर्व है।
खेती-किसानी पर आधारित पहाड़ी जीवन में इसे नई फसल और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
हरेला बोकर उगे हरे अंकुर हरियाली, खुशहाली और नए जीवन का संदेश देते हैं।
परिवार के बड़े-बुजुर्ग हरेला सिर और कान पर रखकर दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगल का आशीर्वाद देते हैं।
इस पर्व को भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से भी जोड़ा जाता है।
आधुनिक समय में हरेला वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण का जनआंदोलन बन चुका है। इस अवसर पर पूरे उत्तराखंड में लाखों पौधे लगाए जाते हैं।
इस प्रकार, हरेला उत्तराखंड की लोक परंपरा, कृषि संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और प्रकृति के प्रति सम्मान का जीवंत प्रतीक है, जो यह संदेश देता है कि “प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी जीवन समृद्ध रहेगा।”
हरेला: प्रकृति, आस्था और सनातन संस्कृति का महापर्व, हरियाली के साथ समृद्धि का संदेश
रुद्रपुर। देवभूमि उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म और सनातन संस्कृति का जीवंत उत्सव है। हरियाली, नवजीवन और समृद्धि के प्रतीक इस पावन पर्व पर घर-घर में श्रद्धापूर्वक हरेला अर्पित कर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है तथा परिवार के सुख, शांति और दीर्घायु की कामना की जाती है।
हरेला पर्व की शुरुआत बीजारोपण से होती है। परंपरा के अनुसार मिट्टी से भरे पात्र में गेहूं, जौ, धान, मक्का, सरसों और अन्य अनाजों के बीज बोए जाते हैं। प्रतिदिन जल का छिड़काव और विधि-विधान से पूजन किया जाता है। निर्धारित अवधि पूर्ण होने पर उगे हुए हरे अंकुरों को शुभ मुहूर्त में काटकर परिवार के बड़े-बुजुर्ग सभी सदस्यों के सिर और कानों पर रखते हुए सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं।
लोकमान्यताओं के अनुसार हरेला भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन तथा सावन मास के स्वागत का भी प्रतीक है। यह पर्व मनुष्य को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, धरती के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश देता है। उत्तराखंड में इस अवसर पर बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान भी चलाए जाते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित और स्वच्छ पर्यावरण का संकल्प लिया जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से हरेला यह प्रेरणा देता है कि जैसे एक छोटा-सा बीज अंकुरित होकर विशाल वृक्ष बनता है, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर श्रद्धा, सेवा, करुणा और सदाचार के बीज बोए जाएं तो जीवन भी सुख, शांति और समृद्धि से भर उठता है।
हरेला पर्व हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति ही परमात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप है। वृक्षों, जल, भूमि और समस्त सृष्टि का संरक्षण ही सच्ची पूजा है। इसी भावना के साथ उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति आज भी प्रकृति और अध्यात्म के इस अद्भुत पर्व को श्रद्धा, उल्लास और सामाजिक सहभागिता के साथ मनाती आ रही है।
