रुद्रपुर ,चंबल के बीहड़ों में कभी आतंक का पर्याय रहे दस्यु सरगना निर्भय सिंह गुर्जर का नाम उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की पुलिस के लिए लंबे समय तक चुनौती बना रहा। हत्या, लूट, डकैती और फिरौती के लिए अपहरण जैसे संगीन अपराधों के आरोपों से घिरे निर्भय के खिलाफ 100 से अधिक मुकदमे दर्ज थे। वर्ष 2005 में पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत के साथ उसके गैंग का अंत हुआ।
निर्भय सिंह गुर्जर का जन्म इटावा जिले के गंगदासपुर गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। आर्थिक तंगी के चलते वह कम उम्र में ही छोटी-मोटी चोरियों की ओर मुड़ गया। बाद में वह कुख्यात डकैत लालाराम के गिरोह में शामिल हुआ और धीरे-धीरे खुद का गैंग खड़ा कर लिया।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, निर्भय का गिरोह फिरौती के लिए अपहरण, लूट और डकैती की वारदातों में सक्रिय था। उसके गिरोह में करीब 60 सदस्य बताए जाते थे। वह कई वर्षों तक चंबल के बीहड़ों में पुलिस को चकमा देता रहा और कई बार जंगलों में पत्रकारों को बुलाकर इंटरव्यू भी देता था।
निर्भय के निजी जीवन को लेकर भी कई चर्चाएं होती रहीं। पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरला और नीलम नाम की दो महिलाओं का उसके गैंग से जुड़ाव था। बताया जाता है कि दोनों शुरू में अपहरण के बाद गैंग के संपर्क में आईं और बाद में लंबे समय तक उसी के साथ रहीं। निर्भय उन्हें अपनी करीबी साथी मानता था। मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि वह शराब का शौकीन था और उसकी पसंद के अनुसार दोनों आधुनिक पहनावा अपनाती थीं। हालांकि, इन व्यक्तिगत दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
वर्ष 2005 में गैंग के भीतर मतभेद बढ़ने लगे। बताया जाता है कि उसके दत्तक पुत्र श्याम और नीलम के बीच संबंध बनने के बाद दोनों गैंग छोड़कर चले गए, जिससे निर्भय कमजोर पड़ गया। इसी दौरान पुलिस ने उसके खिलाफ अभियान तेज किया। पहले उसके कई साथी मारे गए और अंततः नवंबर 2005 में औरैया के अजीतमल क्षेत्र के पास पुलिस मुठभेड़ में निर्भय सिंह गुर्जर ढेर हो गया।
निर्भय सिंह गुर्जर की मौत के साथ चंबल के सबसे चर्चित और खूंखार डकैतों में से एक का अंत हुआ। उसकी कहानी आज भी अपराध जगत के इतिहास में एक ऐसे शख्स के रूप में दर्ज है, जिसने गरीबी से निकलकर अपराध का रास्ता चुना और अंततः पुलिस मुठभेड़ में अपनी जान गंवाई।
बीहड़ों का खौफ: निर्भय सिंह गुर्जर की अपराधगाथा
