रुद्रपुर। नगर निगम रुद्रपुर के वार्ड संख्या-06, नवगठित वार्ड संख्या-20 एवं 21 में SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं पर दर्ज कराई गई कथित आपत्तियों को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। एक महिला के नाम से बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज होने और बाद में उसी महिला द्वारा जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष शपथपत्र देकर इन आपत्तियों से पूरी तरह अनभिज्ञता जताए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रिया में उसकी कथित भूमिका पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
पुष्पा उर्फ पुष्पा उप्रेती पत्नी गिरीश, निवासी भूतबंगला, रुद्रपुर ने 9 सितंबर 2026 को जिला निर्वाचन अधिकारी, ऊधम सिंह नगर को दिए प्रार्थना पत्र में कहा है कि SIR प्रक्रिया के दौरान उनके नाम से कुछ मतदाताओं के संबंध में आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि उन्होंने ऐसी कोई ऑनलाइन अथवा ऑफलाइन आपत्ति दाखिल नहीं की। उनके अनुसार किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा उनके नाम का इस्तेमाल करते हुए आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं।
पुष्पा उप्रेती ने अपने शपथपत्र में भी इसी बात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि उनके नाम और पते का इस्तेमाल करते हुए SIR प्रक्रिया के तहत आपत्तियां दर्ज कराई गईं, जबकि उन्होंने स्वयं ऐसी कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। उन्होंने अपने नाम से दर्ज सभी आपत्तियों को खारिज करने की इच्छा जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष व्यक्त की है।
मामले को गंभीर बनाने वाली बात यह है कि स्थानीय स्तर पर करीब 300 आपत्तियां पुष्पा उप्रेती के नाम से लगाए जाने की बात सामने आई है। इतने बड़े पैमाने पर किसी महिला के नाम का इस्तेमाल कर मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज होने का मामला चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
भाजपा कार्यालय से फोन आने का महिला का आरोप
पुष्पा उप्रेती ने कथित तौर पर यह भी आरोप लगाया है कि भाजपा कार्यालय से उनके पास फोन आए और उन्हें बार-बार कार्यालय बुलाया जा रहा था। उनके अनुसार वह स्वयं किसी राजनीतिक दल से जुड़ी हुई महिला नहीं हैं और चुनावी राजनीति में उनकी कोई सक्रिय भूमिका भी नहीं रही है।
एक सामान्य महिला के नाम से सैकड़ों आपत्तियां दर्ज होना, उसके बाद उसका यह कहना कि उसने ऐसी कोई आपत्ति दाखिल ही नहीं की और फिर राजनीतिक कार्यालय से फोन आने का आरोप लगना पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना देता है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी महिला ने स्वयं आपत्तियां दाखिल की थीं तो उसे अपने नाम से दर्ज आपत्तियों को वापस लेने के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष शपथपत्र देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि महिला की सहमति से पूरा कार्य हुआ था तो उसके द्वारा अपने नाम के दुरुपयोग की बात क्यों कही गई? इन सवालों का जवाब निर्वाचन अधिकारियों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
गैर राजनीतिक महिला को राजनीतिक विवाद में घसीटने का आरोप
पुष्पा उप्रेती के मामले ने सामाजिक स्तर पर भी चिंता पैदा कर दी है। एक ऐसी महिला, जिसका प्रत्यक्ष राजनीतिक संबंध किसी दल से सामने नहीं आया है, उसके नाम का इस्तेमाल मतदाताओं पर आपत्तियां लगाने में किए जाने के आरोप ने राजनीति के तौर-तरीकों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पार्वती समाज से जुड़ी इस महिला के मामले को लेकर समाज के लोगों में भी चर्चा है कि एक सामान्य परिवार की महिला को राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बनाए जाने की कोशिश क्यों हुई। यदि महिला की सहमति के बिना उसके नाम से आपत्तियां दर्ज की गई हैं तो यह सिर्फ एक व्यक्ति के नाम के दुरुपयोग का मामला नहीं रह जाता, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन जाता है।
किसी महिला की सामाजिक छवि को प्रभावित करने वाले इस प्रकार के घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। महिला का नाम सैकड़ों आपत्तियों से जुड़ने के बाद उसकी ओर से सार्वजनिक रूप से यह कहना कि उसने कोई आपत्ति दाखिल नहीं की, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत छवि पर पड़े संभावित प्रभाव को भी गंभीरता से देखने की मांग करता है।
गोपी किशन के शपथपत्र ने भी बढ़ाए सवाल
इसी प्रकरण में गोपी किशन पुत्र दिल्ली धार, निवासी प्रीत विहार कॉलोनी, फाजलपुर महरौला, रुद्रपुर द्वारा भी जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष शपथपत्र प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई है। गोपी किशन ने अपने शपथपत्र में कहा है कि उनके नाम से भी SIR प्रक्रिया के अंतर्गत मतदाताओं पर आपत्तियां दर्ज कराई गईं, जबकि उनके द्वारा ऐसी कोई ऑनलाइन अथवा ऑफलाइन आपत्ति दाखिल नहीं की गई।
उन्होंने भी अपने नाम से दर्ज आपत्तियों को समाप्त करने की इच्छा व्यक्त की है। दो अलग-अलग व्यक्तियों के नाम से आपत्तियों के संबंध में इस प्रकार के शपथपत्र सामने आने के बाद अब प्रशासन के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि आखिर इन आपत्तियों को किसने और किस उद्देश्य से दर्ज कराया।
भाजपा से जवाब मांगता घटनाक्रम
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की चुनावी रणनीति और स्थानीय संगठन की कार्यशैली पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। महिला द्वारा भाजपा कार्यालय से फोन आने का आरोप लगाया जाना जांच का विषय है। इस आरोप को राजनीतिक सत्य के रूप में स्वीकार करने से पहले इसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। साथ ही भाजपा के लिए भी यह आवश्यक हो जाता है कि वह सामने आकर स्पष्ट करे कि पुष्पा उप्रेती को फोन किसने किए, उन्हें कार्यालय क्यों बुलाया गया और उनके नाम से दर्ज आपत्तियों के संबंध में संगठन की कोई भूमिका थी अथवा कोई बाहरी व्यक्ति उनके नाम का इस्तेमाल कर रहा था।
राजनीतिक दलों का काम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करना है। मतदाता सूची जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में किसी आम नागरिक के नाम का इस्तेमाल विवाद पैदा करने के लिए किया गया तो इससे लोकतंत्र की बुनियाद प्रभावित होती है।
भाजपा खुद को अनुशासन और सुशासन की राजनीति का पक्षधर बताती रही है। ऐसे में उसके किसी कार्यकर्ता, पदाधिकारी अथवा कार्यालय से जुड़े व्यक्ति पर इस प्रकार के आरोप लगना गंभीर विषय है। पार्टी को जांच से पहले किसी निष्कर्ष से बचते हुए अपने स्तर पर भी तथ्य सामने रखने चाहिए।
पार्वती समाज की महिला के साथ खड़ा होना जरूरी
पुष्पा उप्रेती का मामला एक राजनीतिक विवाद से आगे बढ़कर सामाजिक संवेदनशीलता का विषय बन गया है। पार्वती समाज की एक सामान्य महिला के नाम को यदि उसकी जानकारी के बिना सैकड़ों आपत्तियों से जोड़ दिया गया, तो उसके सामाजिक सम्मान और छवि पर स्वाभाविक रूप से असर पड़ सकता है।
राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई में आम नागरिकों को मोहरा बनाया जाना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए गंभीर चिंता का विषय है। राजनीति के लिए कार्यकर्ता और संगठन उपलब्ध हैं, आम परिवारों की महिलाओं को विवाद में खींचकर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित करने की कोशिश के आरोप लोकतांत्रिक मर्यादा पर सवाल खड़े करते हैं।
इस पूरे मामले में जिला निर्वाचन अधिकारी को प्रत्येक आपत्ति की जांच करनी चाहिए। आपत्ति किस माध्यम से दाखिल हुई, किस मोबाइल नंबर, दस्तावेज, लॉगिन अथवा पहचान के आधार पर दर्ज हुई, किस स्तर से सत्यापन हुआ और संबंधित व्यक्ति की वास्तविक सहमति थी अथवा किसी अन्य ने उनके नाम का इस्तेमाल किया—इन सभी बिंदुओं की तकनीकी और प्रशासनिक जांच जरूरी है।
यदि जांच में किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किसी महिला के नाम का इस्तेमाल करने की पुष्टि होती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इससे भविष्य में मतदाता सूची की प्रक्रिया में किसी आम नागरिक के नाम के दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा।
फिलहाल पुष्पा उप्रेती के शपथपत्र ने भाजपा और प्रशासन दोनों के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोपों की सच्चाई जांच से सामने आएगी, मगर एक बात साफ है कि किसी भी राजनीतिक दल को चुनावी लाभ के लिए आम नागरिकों की पहचान और प्रतिष्ठा को विवाद में डालने की छूट लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
रुद्रपुर की राजनीति में यह प्रकरण आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। अब निगाह जिला निर्वाचन अधिकारी की जांच और भाजपा की ओर से आने वाली आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी है।

