फर्जी प्रमाणपत्र से MBBS दाखिले का मामला: 45-45 लाख में सीट दिलाने का आरोप, दो गिरफ्तार — उत्तराखंड के लिए बड़ा सवाल

Spread the love


देहरादून। उत्तराखंड में MBBS दाखिलों से जुड़े कथित फर्जी प्रमाणपत्र मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलाने के मामले में पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस जांच में तीन अभ्यर्थियों के MBBS दाखिले के लिए करीब 45-45 लाख रुपये में सौदा तय होने की बात सामने आई है। आरोप है कि प्रत्येक मामले में करीब 20 लाख रुपये एडवांस लिए गए और शेष रकम दाखिला होने तथा कक्षाएं शुरू होने के बाद लेने की बात थी।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बिहार के पूर्णिया निवासी और वर्तमान में मेरठ में रह रहे रूपेश पंडित तथा हरिद्वार के लक्सर निवासी अरविंद कुमार के रूप में बताई गई है। पुलिस के मुताबिक रूपेश पिछले करीब पांच वर्षों से एजुकेशन कंसल्टेंसी के क्षेत्र में काम कर रहा था और विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए अभ्यर्थियों से संपर्क करता था। अरविंद से उसका पुराना परिचय बताया गया है और उसने अपनी बेटी के दाखिले के लिए रूपेश से संपर्क किया था।
45 लाख की सीट और 20 लाख एडवांस का आरोप
पुलिस की पूछताछ में कथित तौर पर सामने आया कि MBBS में प्रवेश दिलाने के लिए तीन अभ्यर्थियों के मामले में करीब 45-45 लाख रुपये की रकम तय की गई थी। इसमें करीब 20-20 लाख रुपये एडवांस दिए जाने की बात सामने आई है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस रकम का लेन-देन किन लोगों के बीच हुआ और इसके पीछे केवल दो व्यक्ति थे या कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था।
यह मामला केवल फर्जी दस्तावेज बनाने तक सीमित नहीं दिखाई देता। जांच का सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दस्तावेज वास्तव में फर्जी थे तो वे सरकारी प्रक्रिया से गुजरकर प्रमाणपत्र के रूप में जारी कैसे हो गए और उन्हीं प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में दाखिला कैसे मिल गया?
एक ही कथित स्वतंत्रता सेनानी का इस्तेमाल
मामले की शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के दस्तावेजों की जांच से हुई। प्रशासनिक जांच में तृप्ति, स्वाति, खुशी और परी नाम की चार अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही कथित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम से जुड़ी पहचान का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।
जांच में संबंधित सरकारी पंजिका में धर्मवीर वर्मा के नाम का रिकॉर्ड नहीं मिलने से प्रमाणपत्रों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हुए। प्रशासनिक सत्यापन में अभ्यर्थियों के पते और मोबाइल नंबरों में भी कथित विसंगतियां मिलीं। स्थलीय सत्यापन के दौरान कुछ दिए गए पतों पर संबंधित अभ्यर्थियों अथवा उनके परिवार के रहने की पुष्टि नहीं हो सकी।
जांच में यह भी सामने आया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र के लिए जरूरी दस्तावेजों के स्थान पर कहीं अभ्यर्थियों और उनके माता-पिता के आधार कार्ड लगाए गए थे। कुछ शपथपत्रों में नाम और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी कथित विसंगतियां भी सामने आईं।
10 सितंबर को प्रमाणपत्र निरस्त, MBBS दाखिले भी रद्द
तहसील स्तर की जांच के बाद चारों प्रमाणपत्रों को निरस्त करने की संस्तुति की गई। इसके बाद 10 सितंबर 2026 को एसडीएम सदर की ओर से चारों प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और संबंधित चार MBBS दाखिले भी रद्द कर दिए गए। चार अभ्यर्थियों के खिलाफ प्राथमिकी की कार्रवाई भी सामने आई है।
Live Hindustan global time+
इसके बाद मामला और गंभीर हो गया। पुलिस ने जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित की। एसपी जया बलूनी के नेतृत्व में गठित टीम अब यह पता लगाने में जुटी है कि कथित फर्जी प्रमाणपत्र कहां तैयार हुए, किसने दस्तावेज उपलब्ध कराए, सरकारी सत्यापन किस स्तर पर हुआ और मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के दौरान दस्तावेजों की जांच किस तरह की गई।
सरकारी तंत्र की भूमिका पर भी उठे सवाल
अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी प्रक्रिया बन गया है। एसआईटी ने एसडीएम सदर और एडीएम कार्यालय की संबंधित पत्रावलियां कब्जे में लेकर यह जांच शुरू की है कि आवेदन से लेकर सत्यापन और प्रमाणपत्र जारी होने तक फाइल किन-किन स्तरों से गुजरी।
एसआईटी ने कथित स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा के बेटे मनोज कुमार के बयान भी दर्ज किए हैं। राजस्व विभाग के संबंधित कर्मचारियों से भी पूछताछ की जा रही है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि फर्जी प्रमाणपत्र किसने बनाया। सवाल यह भी है कि सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद नहीं होने वाले व्यक्ति के नाम पर प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ी?
जांच का दायरा और बढ़ सकता है
मामले की जांच अब चार दाखिलों तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक आरक्षित श्रेणियों के दस्तावेजों की व्यापक जांच की मांग उठी है और करीब 350 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच की जरूरत संबंधी शिकायत भी अधिकारियों तक पहुंची है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए हैं; व्यापक सत्यापन की मांग अलग विषय है।
यही कारण है कि इस प्रकरण को केवल कुछ छात्रों के कथित फर्जीवाड़े के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि पुलिस की जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाला व्यक्ति कौन था, एजुकेशन कंसल्टेंसी की भूमिका क्या थी, पैसों का नेटवर्क कहां तक फैला था और सरकारी प्रमाणपत्र जारी करने तथा मेडिकल दाखिले के सत्यापन में कहीं लापरवाही या मिलीभगत हुई थी या नहीं।
उत्तराखंड के लिए यह सिर्फ एक फर्जीवाड़ा नहीं, व्यवस्था की परीक्षा है
MBBS की एक सीट किसी विद्यार्थी के लिए वर्षों की मेहनत, NEET की तैयारी और भविष्य के सपने से जुड़ी होती है। यदि किसी पात्र अभ्यर्थी की जगह कथित फर्जी दस्तावेजों के जरिए कोई दूसरा व्यक्ति आरक्षित सीट हासिल करता है तो इससे केवल एक सीट प्रभावित नहीं होती, बल्कि पूरी प्रवेश व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा होता है।
उत्तराखंड का दुर्भाग्य यही है कि जिस राज्य में शिक्षा और चिकित्सा के बेहतर अवसरों की उम्मीद की जाती है, वहां यदि प्रमाणपत्रों की सत्यता और सरकारी सत्यापन व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं तो सरकार और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बहाल करने की है।
इस मामले में अंतिम दोष तय करना अदालत और जांच एजेंसियों का विषय है। लेकिन जांच को इस सवाल तक जरूर पहुंचना चाहिए कि फर्जी दस्तावेज बनाने वाले से लेकर प्रमाणपत्र जारी होने और मेडिकल कॉलेज में स्वीकार किए जाने तक पूरी श्रृंखला में कौन-कौन से पड़ाव थे।
क्योंकि असली सवाल सिर्फ “फर्जी प्रमाणपत्र किसने बनाया?” नहीं है।
असली सवाल यह भी है—
“जब सरकारी रिकॉर्ड में मूल आधार ही मौजूद नहीं था, तो प्रमाणपत्र जारी कैसे हुआ और MBBS की सीट तक पहुंच कैसे बनी?”
यही सवाल अब उत्तराखंड की पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तर प्रदेश, संपूर्ण भारत, देश-विदेश, खेल, आध्यात्मिक, राजनीतिक और जन सरोकारों की खबरें


Spread the love