संपादकीय:  शिक्षा के मुद्दे पर सियासत तेज, समाधान की राह सबसे बड़ी चुनौती!  शिक्षा के सवाल पर सियासत से आगे बढ़ने की जरूरत

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 17 जुलाई को देहरादून में आयोजित होने वाले ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, भर्ती घोटालों और महंगी पढ़ाई जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। उनके आरोप सीधे केंद्र सरकार और शिक्षा व्यवस्था पर हैं। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था को भ्रष्ट और छात्रों के भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण बताते हुए शिक्षा में व्यापक बदलाव की मांग की है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 17 जुलाई को देहरादून में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के दूसरे बड़े कार्यक्रम में भाग लेंगे। इस कार्यक्रम में वह छात्रों से सीधा संवाद करेंगे और शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, भर्ती घोटालों, महंगी शिक्षा तथा युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से प्रभावित है। उनका आरोप है कि पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों छात्रों की मेहनत और भविष्य को प्रभावित किया है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता बताते हुए छात्रों से 17 जुलाई को देहरादून पहुंचने की अपील की।
कांग्रेस के अनुसार, ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की शुरुआत 17 जून को राजस्थान के कोटा से हुई थी। पार्टी का दावा है कि इस अभियान के लिए देशभर के लाखों छात्रों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया है। अभियान की वेबसाइट के अनुसार, खबर लिखे जाने तक 2.50 लाख से अधिक छात्र पंजीकरण कर चुके थे और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कार्यक्रम शिक्षा के मुद्दों के साथ-साथ उत्तराखंड में कांग्रेस के युवा जनाधार को मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।राहुल गांधी 17 जुलाई को देहरादून में छात्रों से करेंगे संवाद, शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल


यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं की घटनाओं ने लाखों युवाओं का विश्वास प्रभावित किया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक परीक्षा रद्द होना केवल समय की हानि नहीं, बल्कि मानसिक, आर्थिक और सामाजिक दबाव का भी कारण बनता है। ऐसे में पारदर्शी और जवाबदेह परीक्षा प्रणाली समय की आवश्यकता बन गई है।
दूसरी ओर, शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक जरूरी ठोस समाधान हैं। सरकारों को परीक्षा सुरक्षा, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, दोषियों पर त्वरित कार्रवाई और युवाओं के विश्वास की पुनर्स्थापना के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी केवल सवाल उठाने तक सीमित न रहकर व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करने की भी है।
देहरादून का यह कार्यक्रम राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि छात्रों की समस्याओं के समाधान की दिशा में कितना सार्थक संवाद और ठोस पहल सामने आती है। शिक्षा का भविष्य किसी दल का नहीं, पूरे देश का विषय है और इसे राजनीति से ऊपर उठाकर देखने की आवश्यकता है।


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