चमोली। उत्तराखंड के हिमालयी अंचल में नंदा देवी केवल एक आराध्य शक्ति का नाम नहीं, बल्कि बेटी, बहन, मां और लोकजीवन की जीवंत आस्था का प्रतीक हैं। नंदा राजजात की परंपरा में इतिहास, लोककथा, देव संस्कृति और हिमालयी समाज की सामूहिक स्मृतियां एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं। इसी परंपरा में कुरूड़ की नंदा को नंदा भगवती का मायका माना जाता है, जबकि थराली क्षेत्र का देवराड़ा उनका ससुराल बताया जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार नंदा देवी की यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मायके से ससुराल की ओर विदा होती बेटी की भावनात्मक यात्रा भी है। भादों में जब नंदा की डोली आगे बढ़ती है तो पहाड़ के गांवों में गीत, जागर, ढोल-दमाऊं और पारंपरिक भेंटों के साथ वातावरण आध्यात्मिक हो उठता है।
कुरूड़ को क्यों माना जाता है नंदा का मायका?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
नंदानगर-घाट क्षेत्र में देवसारी-कुरूड़ को नंदा देवी की प्राचीन सिद्धपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। लोककथा कहती है कि मंदिर स्थल पर भैंसे और मेंढे की लड़ाई के दौरान उनके खुरों से मिट्टी हटने पर स्वयंभू शिला प्रकट हुई। इसी शिला को नंदा भगवती का स्वरूप माना गया और बाद में यहां देवी की स्थापना की गई।
कुरूड़ से जुड़ी परंपरा में नंदा को बेटी के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि यहां से निकलने वाली यात्रा में ग्रामीण समाज अपने को नंदा के मायके पक्ष का हिस्सा मानता है। लोकविश्वास में देवराड़ा को उनका ससुराल माना गया है।
नंदा-सुनंदा की कथा में कितनी परतें?
नंदा और सुनंदा को लेकर कुमाऊं-गढ़वाल में अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं। एक परंपरा में नंदा को हिमालय की बेटी और भगवान शिव की पत्नी पार्वती का स्वरूप माना गया है, जबकि सुनंदा को उनकी सहचरी या छोटी बहन के रूप में स्मरण किया जाता है।
एक अन्य ऐतिहासिक-लोक परंपरा में चंद शासक बाज बहादुर चंद से नंदा की प्रतिमा के संबंध की कथा मिलती है। बागेश्वर क्षेत्र में प्रतिमा के दो हिस्सों में विभाजित होने की कथा से नंदा और सुनंदा के दो स्वरूपों की मान्यता जुड़ती है। इन कथाओं की ऐतिहासिक पुष्टि अलग-अलग स्तर पर विवादित हो सकती है, लेकिन लोकविश्वास में इनका महत्व आज भी बना हुआ है।
राजजात में चौसिंगा खाडू और डोली का रहस्य
नंदा राजजात की सबसे विशिष्ट परंपराओं में चौसिंगा खाडू का विशेष स्थान है। लोकमान्यता में इसे यात्रा का अगुवा और नंदा भगवती का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ डोली, छंतोली, नेजा-निशाण, जागर, ढोल-दमाऊं, हुड़का और ग्रामीण भेंटों की परंपरा हिमालयी देव संस्कृति का जीवंत रूप प्रस्तुत करती है।
पौड़ी के लोक साहित्यकार जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ की पजल में भी नंदा राजजात की इसी लोक-संस्कृति का अद्भुत चित्रण मिलता है। पजल में पश्वा, चौसिंगा खाडू, बद्दी, लाटू देवता, रुड्या, जागरी, ढाकरी, डौंर्या, हुड़क्या और डोल्येर जैसे पारंपरिक शब्दों के माध्यम से पूरी यात्रा का सांस्कृतिक संसार सामने आता है।
नंदा की यात्रा में छिपा है पहाड़ का पूरा समाज
नंदा राजजात केवल डोली लेकर चलने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा नहीं है। इसमें किसान अपनी भेंट लेकर आता है, कारीगर छंतोली तैयार करता है, पश्वा पर देवता अवतरित होते हैं, ढोली ढोल बजाता है और डोल्येर डोली को कंधा देते हैं।
यही कारण है कि नंदा की जातरा को समझना वास्तव में उत्तराखंड के पारंपरिक सामाजिक जीवन को समझना है।
लोकपंक्तियों में बार-बार आने वाला भाव—“जी रयां, जागि रयां”—सिर्फ आशीर्वाद नहीं, बल्कि उस सामुदायिक संस्कृति की पहचान है जिसमें देवता और भक्त के बीच दूरी समाप्त हो जाती है।
जस धवल की कथा और रूपकुंड का रहस्य
नंदा राजजात से जुड़ी सबसे चर्चित कथाओं में जस धवल की कथा भी शामिल है। लोकविश्वास के अनुसार यात्रा के दौरान नियमों की अवहेलना करने पर नंदा भगवती के कोप से उसके साथ चल रहा दल भयंकर प्राकृतिक आपदा में समाप्त हो गया।
रूपकुंड में मिले मानव कंकालों को लंबे समय तक इसी लोककथा से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों ने इन कंकालों की उम्र और उत्पत्ति को लेकर जटिल तस्वीर सामने रखी है, इसलिए उन्हें सीधे जस धवल के दल का प्रमाण मानना इतिहास की दृष्टि से सावधानी की मांग करता है। फिर भी रूपकुंड का रहस्य नंदा परंपरा की लोकस्मृति में आज भी गहराई से मौजूद है।
पजल पूछती है—नंदा की जातरा का असली पहरेदार कौन?
जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ की पजल परंपरा नंदा जातरा को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं देखती, बल्कि स्थानीय शब्दों और प्रतीकों के माध्यम से उसका सांस्कृतिक अर्थ खोलती है। कहीं पश्वा है, कहीं चौसिंगा खाडू, कहीं बद्दी और कहीं लाटू देवता।
इसी पहेलीनुमा शैली में प्रश्न उठता है कि नंदा जातरा का पासवान यानी भूमि और यात्रा का रक्षक आखिर कौन है? यह प्रश्न अपने भीतर उत्तराखंड की उस पुरानी देव परंपरा की ओर संकेत करता है, जहां देवता केवल मंदिर में विराजमान शक्ति नहीं, बल्कि गांव, खेत, जंगल, रास्ते और यात्रियों के संरक्षक भी माने जाते हैं।
नंदा राजजात: इतिहास से आगे आस्था की यात्रा
नंदा राजजात की परंपरा को लेकर प्राचीनता और आरंभ की अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए इसके हजारों वर्ष पुराने होने जैसे दावों को लोकपरंपरा और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर रखते हुए देखना जरूरी है। लेकिन इतना निर्विवाद है कि नंदा की उपासना उत्तराखंड की अत्यंत गहरी लोकधाराओं में से एक है।
कुरूड़ से लेकर नंदकेसरी, बेदनी बुग्याल और होमकुंड तक की यात्रा में हिमालय केवल भौगोलिक पृष्ठभूमि नहीं रहता। वह स्वयं इस आध्यात्मिक यात्रा का पात्र बन जाता है।
कुरूड़ में बेटी, डोली में देवी, रास्ते में लोकशक्ति और कैलाश की ओर जाती नंदा—यही नंदा राजजात की वह भावभूमि है, जिसमें उत्तराखंड का इतिहास, लोकगीत, देव संस्कृति और पहाड़ का भावनात्मक संसार एक साथ दिखाई देता है।
