देवभूमि उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों के बीच भगवान विष्णु का एक बेहद प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर स्थित है. स्थानीय लोग इसे प्राचीन विष्णु मंदिर के नाम से पूजते हैं.

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सैकड़ों साल पुराने विशाल देवदार के पेड़ों से घिरा ये मंदिर मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर है.

यही वजह है कि यहां पर्यटकों की भीड़ कम ही देखने को मिलती है. इस शांत और प्राकृतिक माहौल में पहुंचकर श्रद्धालुओं को एक अद्भुत आध्यात्मिक मानसिक शांति का अहसास होता है.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

विशाल देवदार के घने जंगल और 300 मीटर का रहस्यमयी पैदल रास्ता

मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को घने देवदार के जंगल के बीच से होकर करीब 300 मीटर का एक सुंदर पैदल रास्ता पार करना पड़ता है.

इन जंगलों में कुछ देवदार के पेड़ तो एक हजार साल से भी ज्यादा पुराने बताए जाते हैं. जंगल इतना घना है कि सूरज की किरणें भी जमीन तक मुश्किल से पहुंच पाती हैं.

रास्ते में जगह-जगह पानी के छोटे-छोटे प्राकृतिक झरने और विशाल चट्टानें दिखाई देती हैं. बारिश के मौसम में इस पूरे इलाके की खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है, जो किसी का भी मन मोह सकती है.

कूर्मांचल की उत्पत्ति और भगवान विष्णु के कूर्म अवतार का अद्भुत संबंध

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में हिमालय का यह पूरा इलाका समुद्र के भीतर डूबा हुआ था. तब भगवान विष्णु ने कछुए)का अवतार लेकर इस क्षेत्र को जल से बाहर निकाला था.

इसी वजह से इस जगह का नाम कूर्मांचल पड़ा, जिसे आज हम कुमाऊं के नाम से जानते हैं. आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि लाखों साल पहले टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से हिमालय समुद्र से ऊपर उठा था.

मत्स्य पुराण में भी लिखा है कि कूर्म अवतार ने पूरी सृष्टि का भार अपनी पीठ पर उठाया था, जिससे इस पावन भूमि की रचना हुई.

पादप्रक्षालन से निकलीं दो धाराएं और पद्मावती नदी का उद्गम स्थल

कार्य पूरा होने के बाद भगवान विष्णु इस पावन क्षेत्र में जलदेवता के रूप में स्थापित होकर विश्राम करने लगे. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के चरणों और हाथों से जल की दो धाराएं प्रकट हुईं, जिन्हें पदमपर्णा और पद्मावती कहा गया.

आगे चलकर ये दोनों धाराएं आपस में मिल गईं और पद्मावती नदी बन गईं. ये नदी आगे जाकर पवित्र सरयू नदी में मिल जाती है.

भगवान विष्णु ने सबसे बड़े देवदार के पेड़ के नीचे एक पत्थर के रूप में खुद को स्थापित किया था. माना जाता है कि प्राचीन काल में इस पेड़ से स्वयं शहद टपकता था, जो भगवान के पत्थर रूपी मूर्ति पर गिरता था.

दैत्य मुल्या का हमला, विभाजित देवदार और तीन वीरों की शौर्य गाथा

एक अन्य प्राचीन लोककथा के अनुसार पास ही मुल्या नाम का एक असुर रहता था. उसकी एक गाय रोज चुपके से जंगल में जाकर देवदार के नीचे बने विष्णु विग्रह पर अपना दूध चढ़ा देती थी.

जब राक्षस को यह बात पता चली, तो उसने गुस्से में आकर गदा से उस विग्रह और देवदार के पेड़ पर हमला कर दिया. इससे वह विशाल देवदार का पेड़ बीच में से दो हिस्सों में बंट गया और विग्रह से रक्त बहने लगा.

इसके बाद कुमाऊं के तीन वीर फरत्याल भाइयों ने सपने में मिले आदेश के बाद उस असुर से युद्ध किया और उसका अंत कर दिया.

जीर्णोद्धार के बाद निखरा मंदिर का रूप और प्राचीन पत्थरों का महत्व

हमले के बाद भगवान विष्णु का वह विग्रह कई टुकड़ों में बंट गया था, जिन्हें ‘पिंड’ कहा जाता है. स्थानीय लोगों ने उन्हीं प्राचीन पिंडों को एकत्र करके वहां मंदिर की स्थापना की.

हाल ही के वर्षों में इस मंदिर परिसर का आधुनिक तरीके से जीर्णोद्धार किया गया है. मुख्य मंदिर में प्राचीन पिंडों के ठीक पीछे भगवान विष्णु की एक सुंदर नई प्रतिमा भी स्थापित की गई है.

आज भी वह दो भागों में बंटा प्राचीन देवदार का पेड़ और जलधाराएं वहां मौजूद हैं, जो इस पौराणिक इतिहास की गवाही देती हैं.

डिस्क्लेमर (Disclaimer):
यह लेख पौराणिक ग्रंथों (स्कंद पुराण एवं मत्स्य पुराण), कुमाऊं की क्षेत्रीय लोककथाओं और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित एक प्रामाणिक विवरणात्मक रिपोर्ट है. इसका उद्देश्य पाठकों तक देवभूमि उत्तराखंड के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास की जानकारी पहुंचाना है.

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