अवैध फ्री-होल्ड की साज़िश? रजत जयंती पर कलंक — भ्रष्टाचार की जमीन में धंसा उत्तराखंड 

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बुलडोज़र की असली परीक्षा”रुद्रपुर में 500 करोड़ की तालाब भूमि पर मॉल निर्माण का मामला सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की नीयत का आईना है। गंगापुर रोड इसका सबसे जीवंत प्रमाण है — जहां प्राधिकरण की नाक के नीचे बिना रजिस्ट्री, बिना नक्शा, बिना लीज की कॉलोनियाँ धड़ल्ले से बस गईं। न सड़क की स्वीकृति, न नक्शे की मंजूरी — फिर भी बिजली भी मिली, पानी भी मिला, और सुविधाएँ भी पूर्ण। सवाल जनता पूछ रही है — ये चमत्कार कैसे हुआ? किसके आदेश पर हुआ?

प्राधिकरण दावा करता है कि सरकारी संपत्ति पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं होगा, लेकिन वास्तविकता यह है कि गंगापुर रोड पर अवैध कॉलोनियों के बिल्डरों को सुरक्षा कवच मिला हुआ है। यही वह क्षेत्र है जिसे लेकर पहली खबर में स्पष्ट लिखा गया था — प्राधिकरण मैं बैठे हुए अधिकारी कर्मचारी की संपत्ति की जांच की जाए। यह चेतावनी हवा में नहीं थी, बल्कि भ्रष्टाचार के संगठित नेटवर्क की ओर संकेत था।

अब बुलडोज़र की दिशा तय करेगी कि प्राधिकरण ईमानदार है या भागीदार। यदि कार्रवाई गरीब ठेला-वालों पर होती है और गंगापुर रोड जैसे बड़े घोटालों को छोड़ दिया जाता है, तो लाइव प्रसारण के माध्यम से पूरा उत्तराखंड देखेगा कि रुद्रपुर में भ्रष्टाचार अधिकारी-बिल्डर-नेता गठजोड़ के संरक्षण में कैसे फल-फूल रहा है। असली परीक्षण अब शुरू होता है — और जनता देख रही है।


रुद्रपुर। उत्तराखंड सरकार जब राज्य स्थापना की 25वीं वर्षगांठ यानी रजत जयंती वर्ष मना रही है, ठीक उसी समय मुख्यमंत्री के गृह ज़िले ऊधमसिंहनगर मुख्यालय रुद्रपुर में करीब 500 करोड़ रुपये की सरकारी भूमि घोटाले की गूंज उठी है।
मामला किच्छा बाईपास रोड पर झील के सामने, रोडवेज के नज़दीक राजस्व ग्राम लमरा, खसरा संख्या 02 की सरकारी भूमि का है, जो नगर पालिका रुद्रपुर की संपत्ति के रूप में दर्ज है। यह 4.07 एकड़ की भूमि मूलतः मछली पालन हेतु आरक्षित थी — परंतु अब इस पर भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा के तहत मॉल निर्माण का रास्ता साफ़ कर दिया गया है।


कैसे शुरू हुआ मामला

यह भूमि वर्ष 1988 में नगर पालिका रुद्रपुर द्वारा मछली पालन के लिए नीलाम की गई थी। पाँच लोगों ने ₹3,07,000 की उच्चतम बोली लगाई और अग्रिम राशि जमा भी कराई, लेकिन शासन की स्वीकृति न मिलने के कारण लीज प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
शासन ने साफ़ लिखा था कि यह भूमि केवल दो वर्ष के लिए ही दी जा सकती है — किंतु बोलीदाताओं ने सहमति नहीं दी।
इसके बाद भी बोलीदाताओं में से एक महेंद्र छाबड़ा ने 1995 में भ्रामक तथ्यों के आधार पर उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में याचिका दाखिल कर स्थगन आदेश ले लिया।


लाइव प्रसारण के दौरान अनजाने में “2088” शब्द उच्चारित हो गया था, जबकि सही वर्ष “1988” है। प्रसारण में हुई इस त्रुटि के लिए खेद प्रकट करते हुए स्पष्ट किया जाता है कि पूरे संदर्भ, तथ्यों और घटनाओं को 1988 के वर्ष से ही संबंधित माना जाए। पत्रकारिता की शुचिता और तथ्यों की सटीकता हमारे लिए सर्वोपरि है। इसलिए दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं से विनम्र निवेदन है कि उक्त वर्ष को 1988 के रूप में ही पढ़ें और समझें। आपके विश्वास और सहयोग के लिए धन्यवाद।

अवैध फ्री-होल्ड की साज़िश

वर्ष 2005 में — यानी 17 वर्ष बाद — महेंद्र छाबड़ा ने कथित रूप से तत्कालीन सचिव, आवास विभाग पी.सी. शर्मा से मिलीभगत कर भूमि को स्वयं, अपने भाइयों और पिता के नाम पर फ्री-होल्ड करवा लिया।
इसके लिए तीन असंवैधानिक शासनादेश जारी किए गए —
1️⃣ 04.08.2005,
2️⃣ 03.10.2005,
3️⃣ 30.10.2006।

इनके आधार पर 2007 में भूमि को केवल ₹2000 प्रति वर्गमीटर के सर्किल रेट पर फ्री-होल्ड कर दिया गया।
जबकि जिलाधिकारी व अपर जिलाधिकारी (नजूल) की रिपोर्ट में यह भूमि “जलमग्न खुला क्षेत्र” के रूप में दर्ज थी, जिस पर फ्री-होल्ड की अनुमति किसी भी नजूल नीति में नहीं है।


जांच में भ्रष्टाचार के प्रमाण

ईमानदार जिलाधिकारी जुगल किशोर पंत व एडीएम (नजूल) जय भारत सिंह ने जांच कर रिपोर्ट शासन को भेजी थी, जिसमें यह फ्री-होल्ड नियम विरुद्ध पाया गया और रद्द करने की संस्तुति दी गई।
लेकिन यह रिपोर्ट शासन में दबा दी गई और मामला पुनः जांच के नाम पर जिलाधिकारी उदयराज सिंह को भेजा गया।
सूत्रों के अनुसार, इसके बाद भारी रिश्वतखोरी और राजनीतिक दबाव में एक ही दिन में पिछली जांच को निरस्त कर दिया गया, और मॉल निर्माण के लिए मानचित्र स्वीकृति रोक हटाकर अनुमति दे दी गई।


कौन-कौन हैं घेरे में

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे खेल में एक प्रभावशाली सत्तारूढ़ नेता, “शबाना इंफ्रास्ट्रक्चर” नामक बिल्डर, और कुछ उद्योगपति शामिल हैं।
जानकारी के अनुसार, 36% हिस्सेदारी फ्री-होल्ड धारकों की, 7% नेताजी के उद्योगपति सहयोगी की और 58% बिल्डर की तय की गई है।
नेता जी ने पहले ही अपने उद्योगपति साथी के नाम 2739 वर्गमीटर भूमि रजिस्ट्री करवा कर “सुरक्षित” कर ली, जबकि नगर निगम का कहना है कि उस भूमि की मूल पत्रावली ही उपलब्ध नहीं है — जिससे निगम की भूमिका पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं।


कानूनी दृष्टि से भूमि पर निर्माण पूरी तरह अवैध

सुप्रीम कोर्ट ने जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य (2011) में स्पष्ट आदेश दिया है कि तालाब, जोहड़ या सार्वजनिक भूमि पर किसी का भी कब्ज़ा या फ्री-होल्ड पूरी तरह अवैध है।
इसी प्रकार उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कुँवर पाल सिंह बनाम राज्य (2018) में सरकार को निर्देश दिए कि सभी जलाशयों व सार्वजनिक भूमि को कब्ज़ामुक्त कराया जाए।
NGT के आदेश के अनुसार, नदी-नालों से 200 मीटर के दायरे में किसी भी निर्माण या व्यावसायिक गतिविधि पर प्रतिबंध है।


अब क्या माँग है

प्रार्थी अमित नारंग ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि—रुद्रपुर की इस मछली तालाब भूमि घोटाले की CBI जांच करवाई जाए और दोषी नेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों व बिल्डरों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो।”

उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि शासन ने संज्ञान नहीं लिया, तो वे माननीय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेंगे।


रजत जयंती वर्ष में यह प्रकरण उत्तराखंड शासन की पारदर्शिता पर गहरा प्रश्नचिन्ह है।
जब स्वयं मुख्यमंत्री का गृह ज़िला सरकारी भूमि पर भ्रष्टाचार से अछूता नहीं है, तो लोकायुक्त और जवाबदेही कानून की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस होती है।
यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह न केवल शासन की साख पर चोट करेगा, बल्कि राज्य स्थापना की मूल भावना — “जनता के अधिकारों की रक्षा” — को भी आघात पहुंचाएगा।



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