लेकिन क्या आप जानते हैं कि कन्या पूजन में कन्याओं के साथ एक बालक को भी बैठाने की परंपरा क्यों है? इसके पीछे कौन सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं.
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
धर्म में विजयादशमी का पर्व अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे दशहरा नाम से भी जाना जाता है। यह दिन मुख्य रूप से भगवान राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत से जुड़ा है।
ब्रह्मा जी ने इंद्रदेव को बताया था कन्या पूजन का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार इंद्रदेव ने ब्रह्मा जी से मां भगवती को प्रसन्न करने का उपाय पूछा था. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें कुमारी कन्याओं के पूजन का महत्व बताया. इसी मान्यता के आधार पर नवरात्र में छोटी कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनकी पूजा की जाती है.
कन्या पूजन को कंजक पूजन भी कहा जाता है. इसमें कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं. मान्यता है कि इससे मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है.
कन्या पूजन में एक बालक को क्यों बैठाते हैं?
कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराने की परंपरा भी कई जगह प्रचलित है. इस बालक को बटुक भैरव या लंगूर के स्वरूप में देखा जाता है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान भैरव को देवी शक्ति का रक्षक माना जाता है. इसलिए मां भगवती की पूजा के साथ भैरव की आराधना को भी महत्वपूर्ण माना गया है. इसी विश्वास के चलते कन्या पूजन में एक बालक को शामिल किया जाता है. हालांकि, यह परंपरा हर क्षेत्र और परिवार में एक जैसी नहीं होती.
अष्टमी या नवमी, कब करें कन्या पूजन?
नवरात्र में कन्या पूजन अष्टमी या नवमी, दोनों में से किसी एक दिन किया जा सकता है. श्रद्धालु अपनी परंपरा और पूजा के अनुसार दिन चुनते हैं.
पूजन के लिए सबसे पहले मां दुर्गा को भोग लगाएं. इसके बाद कन्याओं और बालक के पैर धोकर उन्हें स्वच्छ स्थान पर बैठाएं. फिर श्रद्धापूर्वक भोजन कराएं और सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार दें.
इस तरह कन्या पूजन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि छोटी बच्चियों के सम्मान, सेवा और उनमें देवी का स्वरूप देखने की भावना से भी जुड़ा है.
भक्तों के लिए विजयादशमी सिर्फ एक त्योहार नहीं है।
बल्कि इसे धर्म, साहस, भक्ति और नकारात्मकता पर सकारात्मक मूल्यों की जीत का अवसर भी माना जाता है। इस दिन मुख्य रूप से रावण के पुतले का दहन किया जाता है और उसके साथ बुराइयों का भी दहन होता है, वहीं इस दिन कई अन्य परंपराएं भी निभाई जाती हैं जिनका अलग महत्व होता है।
उन्हीं में से एक है शस्त्र पूजा करना। यही नहीं इस दिन को बहुत सारे कामों जैसे वहां खरीदना, नया बिजनेस शुरु करना भी शुभ माना जाता है। आइए आपको बताते हैं दशहरा के दिन शस्त्रों की पूजा क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व होता है।
दशहरा पर क्यों होती है शस्त्र पूजा?
ज्योतिष की मानें तो दशहरा के दिन शास्त्रों और हथियारों की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है और यह प्रथा सदियों से चली आ रही है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि इसकी शुरुआत महाभारत काल से हुई थी। ऐसा माना जाता है कि अज्ञातवास में जाते समय पांडवों ने अपने हथियार एक शमी के पेड़ में छिपा दिए थे।
एक साल पूरा होने पर, उन्होंने विजयदशमी के दिन ही उस पेड़ से अपने शस्त्रों को वापस लिया था और उन्हीं शास्त्रों को पूजा करके कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए चले गए थे।
उसी समय से दशहरा वाले दिन हर साल शास्त्रों की पूजा विधि-विधान से की जाती है। मान्यता यह भी है कि जिस प्रकार दशहरा यानी विजयदशमी के दिन शास्त्रों की पूजा के बाद युद्ध में अर्जुन और पांडवों की विजय हुई थी, उसी तरह से आज भी जो इस दिन अस्त्र-शास्त्रों की पूजा करता है उसे हर काम में विजय मिलती है।
दशहरा में होती है आयुध पूजा
दशहरा के दिन अस्त्र-शस्त्र की पूजा से मतलब केवल औजारों की पूजा नहीं होता है बल्कि इस दिन आयुध पूजा होती है जिसका मतलब यह होता है कि आपकी में रोज़ी-रोटी कमाने वाले हर सामान की पूजा होती है, चाही वो आपकी कलम ही क्यों न हो। घरों में इस दिन उन सभी चीजों की पूजा होती है जो आपके व्यवसाय या नौकरी-पेशे से जुड़े होते हैं।
आप जिस भी चीज से काम करते हैं, उसे साफ किया जाता है, हल्दी, कुमकुम और फूलों से सजाया जाता है और फिर उसकी पूजा की जाती है। जैसे फैक्ट्री में मशीनरी, वाहन, वाद्य यंत्र या रसोई के बर्तन सभी की पूजा करना शुभ माना जाता है। यही नहीं आज के समय में इस दिन आपके कार्यस्थल पर इस्तेमाल होने वाली चीजों जैसे लैपटॉप की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।
दशहरा के दिन शस्त्र पूजा का महत्व
दशहरा के दिन वाहन और शस्त्र पूजा करने को व्यक्ति को विजय का आशीर्वाद मिलता है और हर काम में सफलता के योग बनते हैं। यही नहीं शस्त्र पूजा से शक्ति और साहस का भी संचार होता है।
अगर आप भी इस दिन शस्त्र पूजा करते हैं तो इसके शुभ फल मिलते हैं और जीवन में सफलता के योग बनते हैं। इस साल दशहरा का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा और इस दिन रावण दहन के साथ शस्त्रों की पूजा भी फलदायी होगी।
