उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बीच निर्वाचन विभाग ने दस्तावेजों को लेकर फैली उलझन दूर करते हुए स्पष्ट किया है कि निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध न होने की स्थिति में आधार कार्ड, राशन कार्ड और आयुष्मान कार्ड के माध्यम से भी सत्यापन कराया जा सकता है। इस फैसले से अनेक लोगों को राहत अवश्य मिली है, मगर इसके साथ एक बड़ा सवाल फिर सामने आ गया है—क्या आम नागरिक का अधिकांश समय अब केवल दस्तावेजों, सत्यापन, लिंकिंग और सरकारी प्रक्रियाओं में ही बीतने लगा है?
पिछले कुछ वर्षों पर दृष्टि डालें तो आम नागरिक लगातार किसी न किसी सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा बना दिखाई देता है। कभी आधार कार्ड बनवाने और उसमें नाम, पता या जन्मतिथि ठीक कराने की प्रक्रिया, कभी बैंक खाते से आधार जोड़ने का अभियान, कभी गैस कनेक्शन को आधार से जोड़ने की औपचारिकता, कभी राशन कार्ड का सत्यापन, कभी आयुष्मान कार्ड, कभी परिवार पहचान से जुड़े दस्तावेज, कभी ऑनलाइन आवेदन, कभी ई-केवाईसी, कभी भूलेख का सत्यापन और अब मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
सरकार का पक्ष यह है कि इन सभी अभियानों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, फर्जीवाड़े पर रोक लगाना और योजनाओं का लाभ सही पात्र व्यक्ति तक पहुंचाना है। प्रशासनिक दृष्टि से यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण माना जा सकता है। दूसरी ओर आम नागरिक का अनुभव यह भी है कि इन प्रक्रियाओं के बीच उसे बार-बार सरकारी कार्यालयों, जन सेवा केंद्रों, तहसीलों, ब्लॉक कार्यालयों, बैंकों और विभिन्न विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। कई स्थानों पर एक दस्तावेज के लिए दूसरे दस्तावेज की मांग होती है। कहीं नाम की वर्तनी अलग होने पर आवेदन लौट जाता है, कहीं पते में अंतर होने पर नया प्रमाण मांगा जाता है। इसके बाद नागरिक फिर नई लाइन में खड़ा दिखाई देता है। कई बार पूरा दिन केवल एक दस्तावेज जमा कराने या सत्यापन कराने में निकल जाता है।
एसआईआर अभियान के दौरान भी यही दृश्य देखने को मिल रहा है। अनेक मतदाता नोटिस मिलने के बाद विभिन्न प्रमाण जुटाने में लगे हैं। निर्वाचन विभाग बार-बार स्पष्ट कर रहा है कि किसी पात्र मतदाता का नाम हटाने का उद्देश्य नहीं है और वैकल्पिक दस्तावेज भी स्वीकार किए जा रहे हैं। इसके बावजूद लोगों में आशंका बनी हुई है, जिसके कारण बूथों और निर्वाचन कार्यालयों में लगातार भीड़ देखी जा रही है।
कटाक्ष यही है कि यदि किसी सरकार की सबसे अधिक दिखाई देने वाली उपलब्धि जनता को विभिन्न प्रकार की लाइनों और सत्यापन प्रक्रियाओं का अभ्यस्त बना देना हो, तो यह भी अपने आप में एक अलग प्रशासनिक संस्कृति का उदाहरण बन जाता है। कभी बैंक की कतार, कभी राशन की कतार, कभी गैस एजेंसी, कभी जन सेवा केंद्र, कभी तहसील, कभी कलेक्ट्रेट, कभी पटवारी कार्यालय और अब मतदाता सूची सत्यापन केंद्र—आम नागरिक का एक बड़ा हिस्सा इन प्रक्रियाओं में लगातार व्यस्त दिखाई देता है।
विशेषकर बेरोजगार युवाओं के बीच यह चर्चा भी सुनाई देती है कि रोजगार के अवसर सीमित होने के बीच सरकारी प्रक्रियाओं की सूची लगातार लंबी होती जा रही है। कभी किसी योजना के लिए आवेदन, कभी किसी प्रमाणपत्र का नवीनीकरण, कभी किसी पोर्टल पर पंजीकरण और कभी किसी दस्तावेज का सत्यापन। परिणामस्वरूप समय, श्रम और आर्थिक संसाधनों का भी अतिरिक्त बोझ बढ़ता है।
डिजिटल इंडिया के दौर में यह अपेक्षा की जाती है कि तकनीक नागरिकों का समय बचाएगी और प्रक्रियाएं सरल होंगी। कई मामलों में ऐसा हुआ भी है, मगर जमीनी स्तर पर अभी भी बड़ी संख्या में लोगों को ऑनलाइन आवेदन के बाद ऑफलाइन सत्यापन, दस्तावेजों की हार्ड कॉपी और कार्यालयों के अनेक चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे सुविधा की बजाय कई बार जटिलता का अनुभव होता है।
आम नागरिक की अपेक्षा केवल इतनी है कि एक बार सरकार के पास उपलब्ध दस्तावेजों का उपयोग विभिन्न विभाग आपस में समन्वय के साथ कर सकें, ताकि हर नई प्रक्रिया में नागरिक से वही जानकारी और वही प्रमाण बार-बार प्रस्तुत कराने की आवश्यकता कम हो। यदि आधार, राशन कार्ड, बैंक, आयुष्मान और अन्य सरकारी अभिलेख पहले से उपलब्ध हैं, तो विभागों के बीच समन्वय बढ़ाकर नागरिक का समय और श्रम बचाया जा सकता है।
एसआईआर अभियान भी इसी दिशा में लोगों के मन में कई प्रश्न छोड़ रहा है। यदि उद्देश्य केवल मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध बनाना है, तो प्रक्रिया ऐसी हो कि पात्र मतदाता को राहत का अनुभव हो, परेशानी का नहीं। सरकारी व्यवस्था की सफलता केवल नियम बनाने से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उन नियमों का पालन करते समय आम नागरिक को कितनी सुविधा या कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका मतदाता है। यदि वही मतदाता बार-बार कागजों, प्रमाणपत्रों और सत्यापन की भूलभुलैया में उलझा रहे, तो व्यवस्था पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। पारदर्शिता आवश्यक है, सटीक अभिलेख भी आवश्यक हैं, मगर इनके साथ नागरिकों के समय और सम्मान का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक माना जाना चाहिए।
शायद अब समय इस बात पर गंभीरता से विचार करने का है कि देश का नागरिक सरकारी कार्यालयों की कतारों में कम और अपने परिवार, रोजगार, शिक्षा तथा उत्पादक कार्यों में अधिक समय दे सके। प्रशासनिक दक्षता की असली पहचान यही होगी कि नागरिक को सुविधा मिले, प्रक्रियाओं का बोझ कम हो और सरकारी सेवाएं उसके द्वार तक पहुंचें, न कि नागरिक हर कुछ महीनों में किसी नई सूची, नए सत्यापन या नए दस्तावेज के लिए फिर एक नई लाइन में खड़ा दिखाई दे।
