हरेला पर्व पर रुद्रपुर में खुला “दीपा पहाड़ी”, उत्तराखंड की संस्कृति, स्वाद और लोक विरासत का नया केंद्र

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रुद्रपुर। हरेला पर्व के शुभ अवसर पर रुद्रपुर में उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक खानपान और लोककला को समर्पित “दीपा पहाड़ी” प्रतिष्ठान का शुभारंभ हुआ। यह प्रतिष्ठान केवल एक व्यापारिक केंद्र भर नहीं, बल्कि देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा, ग्रामीण जीवन, पारंपरिक कृषि और लोक आस्था को एक छत के नीचे सहेजने का सुंदर प्रयास है। उद्घाटन के अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला समूहों की प्रतिनिधियां तथा उत्तराखंड की संस्कृति से जुड़े लोग उपस्थित रहे। सभी ने इस पहल को स्थानीय उत्पादों और पहाड़ की पहचान को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया।
प्रतिष्ठान में प्रवेश करते ही उत्तराखंड की पारंपरिक समृद्धि का सजीव संसार दिखाई देता है। यहां पहाड़ की मिट्टी की सोंधी खुशबू, खेतों की मेहनत, गांवों की आत्मीयता और लोक संस्कृति का सहज सौंदर्य हर आगंतुक का स्वागत करता है। यहां उपलब्ध प्रत्येक उत्पाद केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन, संघर्ष और परिश्रम की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।
“दीपा पहाड़ी” में उत्तराखंड के प्रसिद्ध पारंपरिक और जैविक उत्पादों की विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध कराई गई है। इनमें शुद्ध मंडुवा, झंगोरा, भट्ट, गहत (कुल्थ), विभिन्न प्रकार के राजमा, लाल चावल, भंगजीरा, जाखिया, तिमूर, गंद्रैणी, जैविक मसाले, बुरांश का शरबत, माल्टा और काफल से तैयार उत्पाद, शुद्ध पहाड़ी शहद, पारंपरिक अचार, जड़ी-बूटियां तथा पर्वतीय जीवन से जुड़े अनेक खाद्य पदार्थ शामिल हैं। इन सभी उत्पादों का उद्देश्य लोगों तक शुद्ध, पौष्टिक और प्राकृतिक खाद्य सामग्री पहुंचाने के साथ-साथ पहाड़ के किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना भी है।
उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज आज स्वास्थ्य विशेषज्ञों की दृष्टि में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। मंडुवा, झंगोरा और गहत जैसे मोटे अनाज पोषण से भरपूर होने के साथ जीवनशैली से जुड़ी अनेक समस्याओं में लाभकारी माने जाते हैं। ऐसे समय में जब लोग जैविक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रहे हैं, तब “दीपा पहाड़ी” जैसी पहल स्थानीय किसानों के लिए नए अवसरों का द्वार खोल सकती है।
प्रतिष्ठान की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उत्तराखंड की प्राचीन लोकचित्र परंपरा ऐपण का आकर्षक प्रदर्शन भी है। ऐपण केवल एक सजावटी कला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। लाल गेरू और सफेद बिस्वार से बनाई जाने वाली यह लोककला शुभता, समृद्धि और देवी शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। वर्षों से यह कला विवाह, नामकरण संस्कार, यज्ञ, देवी-पूजन, व्रत, दीपावली, हरेला सहित अनेक धार्मिक एवं पारिवारिक अवसरों पर बनाई जाती रही है।
“दीपा पहाड़ी” में ऐपण से सुसज्जित पूजा सामग्री, पारंपरिक कलाकृतियां, सजावटी वस्तुएं और सांस्कृतिक स्मृति-चिह्न विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। इन कलाकृतियों के माध्यम से नई पीढ़ी को उत्तराखंड की लोक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया गया है। यहां आने वाले लोग केवल खरीदारी ही नहीं करते, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ाव महसूस करते हैं।
इस प्रतिष्ठान के माध्यम से स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण हस्तशिल्प से जुड़े परिवारों को भी नया मंच मिलने की उम्मीद है। लंबे समय से पहाड़ की महिलाएं पारंपरिक खाद्य पदार्थ, अचार, मसाले, लोककलाएं और हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार करती रही हैं। उचित बाजार और पहचान मिलने पर यह कार्य उनके लिए सम्मानजनक आजीविका का मजबूत आधार बन सकता है। “दीपा पहाड़ी” इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय उत्पादों को सम्मान मिले, पहाड़ के किसानों का उत्साह बढ़े, महिला स्वयं सहायता समूहों को निरंतर प्रोत्साहन प्राप्त हो और उत्तराखंड की पारंपरिक विरासत नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुंचे। जब स्थानीय उत्पाद घर-घर पहुंचेंगे, तब पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिलेगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और युवाओं का अपनी जड़ों से जुड़ाव भी और मजबूत होगा। आत्मनिर्भर उत्तराखंड की परिकल्पना तभी साकार होगी, जब स्थानीय उत्पादन, स्थानीय बाजार और स्थानीय उद्यम एक-दूसरे के सहयोगी बनेंगे।
हरेला पर्व स्वयं प्रकृति, पर्यावरण और जीवन के संतुलन का संदेश देता है। उत्तराखंड का यह लोकपर्व हरियाली, खेती, परिवार, पर्यावरण संरक्षण, समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का उत्सव है। इस दिन पौधरोपण, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और नई फसल की मंगलकामना की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसे पावन अवसर पर “दीपा पहाड़ी” का शुभारंभ इस संदेश को और अधिक सार्थक बनाता है कि अपनी संस्कृति, अपनी लोक विरासत और अपने पारंपरिक उत्पादों को सहेजना भी उतना ही पवित्र कार्य है, जितना धरती पर एक नया पौधा रोपना।
उपस्थित लोगों ने इस अवसर पर विश्वास व्यक्त किया कि यह प्रतिष्ठान आने वाले समय में उत्तराखंड की संस्कृति का सशक्त केंद्र बनेगा। यहां से स्थानीय उत्पादों को नई पहचान मिलेगी, पहाड़ के किसानों और महिला समूहों के परिश्रम को सम्मान प्राप्त होगा तथा देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत देश-विदेश तक पहुंचेगी। प्रत्येक आगंतुक अपने साथ केवल उत्पाद ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मीयता, परंपरा और प्रकृति की सुगंध भी लेकर जाएगा।
हरेला जैसे लोकपर्व पर शुरू हुई यह पहल इस बात का भी संदेश देती है कि आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। यदि समाज स्थानीय उत्पादों को अपनाए, पारंपरिक कला का सम्मान करे और अपने गांवों से जुड़े उद्यमों को प्रोत्साहन दे, तो उत्तराखंड की समृद्ध लोक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स परिवार की ओर से दीपा माटेला को इस प्रेरणादायी पहल के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। कामना है कि “दीपा पहाड़ी” निरंतर प्रगति करे, उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को नई पहचान दिलाए, मातृशक्ति के परिश्रम को सम्मान मिले और यह प्रतिष्ठान देवभूमि की संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता का प्रेरक केंद्र बनकर स्थापित हो।
हरेला पर्व के पावन अवसर पर देवभूमि उत्तराखंड के समस्त प्रदेशवासियों, देश-विदेश में बसे सभी उत्तराखंडियों तथा सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, आरोग्य, हरियाली, आध्यात्मिक ऊर्जा और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट आस्था बनाए रखें।


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