देहरादून। उत्तराखंड में हरेला पर्व प्रकृति, हरियाली और जीवन का उत्सव माना जाता है। हर वर्ष इस पर्व पर लोग पौधे लगाकर धरती को हरा-भरा रखने का संकल्प लेते हैं। इस बार भी भारतीय जनता पार्टी ने 16 जुलाई से 15 अगस्त तक पूरे प्रदेश में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान चलाने की घोषणा की है। पार्टी का लक्ष्य 11,729 बूथों पर छह लाख से अधिक पौधे लगाने का है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
जनप्रतिनिधियों से लेकर कार्यकर्ताओं तक सभी को वृक्षारोपण की जिम्मेदारी दी गई है।
इसी समय दूसरी तस्वीर देहरादून-ऋषिकेश मार्ग से सामने आ रही है, जहां हाईवे चौड़ीकरण परियोजना के लिए लगभग 3000 से 4000 परिपक्व पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। यही विरोधाभास आज सबसे बड़ा प्रश्न बनकर खड़ा है। एक तरफ पौधे लगाने का अभियान है, दूसरी तरफ दशकों पुराने वृक्षों पर चलती आरी है।
हरेला पर्व का संदेश केवल पौधा लगाने तक सीमित नहीं है। इसका मूल भाव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, जंगलों का संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली बचाना है। उत्तराखंड की संस्कृति में पेड़ परिवार का हिस्सा माने जाते हैं। ऐसे में जब हजारों परिपक्व वृक्ष एक साथ काटे जाते हैं तो यह केवल लकड़ी का नुकसान नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और सांस्कृतिक क्षति भी है।
सरकार का पक्ष है कि सड़क परियोजना सभी कानूनी प्रक्रियाओं के तहत स्वीकृत हुई है। वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियां प्राप्त की गई हैं और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एलिफेंट अंडरपास, वाइल्डलाइफ बॉक्स कल्वर्ट तथा अन्य उपाय किए जाएंगे। सरकार का कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
दूसरी ओर पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क्षेत्र हाथियों की प्राकृतिक आवाजाही का महत्वपूर्ण मार्ग है। उनका तर्क है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से जंगल का स्वरूप बदलेगा, जैव विविधता प्रभावित होगी और भविष्य में इसका असर वन्यजीवों के साथ स्थानीय पर्यावरण पर भी दिखाई देगा। उनका यह भी कहना है कि परिपक्व वृक्षों का स्थान नए पौधे तुरंत नहीं ले सकते। जिस पेड़ को 50 से 100 वर्ष लगते हैं, उसकी भरपाई कुछ पौधे लगाकर अल्पकाल में संभव नहीं होती।
यही कारण है कि हरेला पर्व पर चल रहे वृक्षारोपण अभियान के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या विकास की परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई को अंतिम विकल्प बनाया गया? क्या वैकल्पिक डिजाइन या मार्ग पर पर्याप्त विचार हुआ? क्या जितने पेड़ काटे जा रहे हैं, उनके संरक्षण के अन्य विकल्प पूरी गंभीरता से तलाशे गए?
हरेला पर्व लोगों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देता है। यदि इस अवसर पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं तो यह निश्चित रूप से स्वागतयोग्य प्रयास है। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि पहले से मौजूद स्वस्थ और परिपक्व वृक्षों को बचाने की हर संभव कोशिश हो। पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि वृक्षारोपण और वृक्ष संरक्षण, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
इस हरेला पर्व पर उत्तराखंड के अनेक नागरिक उन परिपक्व वृक्षों को भी स्मरण कर रहे हैं जो विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुके हैं या जिनकी कटाई प्रस्तावित है। यह श्रद्धांजलि किसी परियोजना का विरोध भर नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक विरासत के प्रति सम्मान का भाव है जिसने दशकों तक छाया, स्वच्छ हवा, जल संरक्षण और वन्यजीवों को आश्रय दिया।
हरेला का वास्तविक संदेश तभी सार्थक माना जाएगा जब नए पौधों के साथ पुराने वृक्षों का संरक्षण भी प्राथमिकता बने। विकास आवश्यक है, सड़कें भी आवश्यक हैं, लेकिन उत्तराखंड की पहचान उसके जंगल, नदियां और जैव विविधता भी हैं। चुनौती यही है कि विकास और प्रकृति के बीच ऐसा संतुलन बनाया जाए, जिससे आने वाली पीढ़ियों को बेहतर आधारभूत सुविधाओं के साथ सुरक्षित पर्यावरण भी मिल सके।
हरेला पर्व की सभी प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं। साथ ही उन परिपक्व वृक्षों को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने वर्षों तक उत्तराखंड की धरती, वन्यजीवों और मानव जीवन को सहारा दिया। प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना ही हरेला की सबसे बड़ी सीख है।
