उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2025 तक राज्य को पूरी तरह नशा मुक्त बनाने का संकल्प लिया था। कागजों पर बनी रणनीतियां, बड़े-बड़े होर्डिंग्स और एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स की बैठकें यह भरोसा दिलाने की कोशिश करती हैं कि राज्य एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। लेकिन जब हम उत्तराखंड के कस्बों, पहाड़ों और शहरों की जमीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो यह सरकारी संकल्प केवल एक ‘दोहरी चाल’ और विरोधाभासों का पुलिंदा नजर आता है। एक तरफ नशे के खिलाफ भाषण दिए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ नशे की उपलब्धता को सुगम बनाया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई सरकार उत्तराखंड को नशा मुक्त बनाना चाहती है, या यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
राजस्व का लालच और नियमों की धज्जियां: सरकार पर प्रश्नचिह्न
नशा मुक्ति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा खुद सरकार की आबकारी नीतियां हैं। एक तरफ नशा मुक्ति का प्रचार होता है, वहीं दूसरी तरफ एक मुख्य शराब की दुकान को आधार बनाकर दो से तीन ‘उप-दुकानें’ (सैल) खोलने की छूट दे दी जाती है।
- असुरक्षित क्षेत्र: नियमों के मुताबिक स्कूल, कॉलेज, धार्मिक स्थल और अस्पतालों से शराब की दुकानें एक निश्चित दूरी पर होनी चाहिए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि घनी आवासीय कॉलोनियों, गलियों, मोहल्लों और शिक्षण संस्थानों के ठीक पास शराब के ठेके धड़ल्ले से चल रहे हैं।
- दोगला मापदंड: जब राज्य की नीतियां ही शराब की पहुंच को हर गली-कूचे तक आसान बना रही हों, तो युवाओं को इससे दूर रहने की नसीहत देना सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। राजस्व (Revenue) कमाने की भूख ने भावी पीढ़ी के भविष्य को दांव पर लगा दिया है।
पहाड़ों में बेखौफ तस्करी: पुलिस और प्रशासन की नाकामी
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिति और भी भयावह हो चुकी है। जिन पहाड़ों की पहचान शांत और शुद्ध वातावरण से थी, आज वहां राशन की दुकानों, सब्जी के ठेलों, डेरियों और यहां तक कि कपड़ों की दुकानों में भी अवैध शराब और स्मैक जैसे घातक नशे आसानी से उपलब्ध हैं।
- निगरानी का अभाव: यह सब स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग की नाक के नीचे हो रहा है। खुफिया तंत्र और स्थानीय गश्त की इस विफलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
- मिलीभगत का संदेह: बिना प्रशासनिक ढील या कथित मिलीभगत के, रोजमर्रा के सामान की दुकानों से नशे का यह अवैध कारोबार इतने बड़े पैमाने पर नहीं चल सकता। पुलिस अपराधियों को पकड़ने का दावा तो करती है, लेकिन इस जमीनी संजाल (Network) को तोड़ने में पूरी तरह नाकाम रही है।
राजनीतिक संरक्षण और तस्करों का मनोबल
किसी भी अभियान की साख तब पूरी तरह गिर जाती है, जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आने लगें। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां सत्तारूढ़ दल (बीजेपी) से जुड़े स्थानीय नेताओं या पदाधिकारियों के नाम सीधे तौर पर नशे की तस्करी और अवैध शराब के कारोबार में सामने आए हैं।
- संरक्षण का खेल: जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग ही इन अपराधियों के मददगार बन जाएं, तो कानून का खौफ खत्म हो जाता है। राजनीतिक रसूख के कारण पुलिस भी अक्सर हाथ डालने से कतराती है।
- नैतिक जिम्मेदारी: यदि सरकार वाकई नशा मुक्ति को लेकर गंभीर है, तो उसे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपनी ही पार्टी के भीतर बैठे ऐसे काली भेड़ों पर सबसे सख्त कार्रवाई करनी होगी, अन्यथा यह अभियान केवल एक छलावा बनकर रह जाएगा।
खोखली परिकल्पना या गंभीर संकल्प?
भाषणों से नशा मुक्त उत्तराखंड नहीं बन सकता। जब तक शराब की दुकानों के अंधाधुंध विस्तार को नहीं रोका जाता, रिहायशी इलाकों और स्कूलों के पास से ठेके नहीं हटाए जाते, और राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त तस्करों को जेल नहीं भेजा जाता, तब तक ‘नशा मुक्त उत्तराखंड’ की परिकल्पना एक क्रूर मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है। सरकार को अपनी इस दोहरी चाल को बंद कर कथनी और करनी के अंतर को मिटाना होगा, वरना देवभूमि का युवा इस खोखली व्यवस्था की भेंट चढ़ता रहेगा।
