किच्छा विधानसभा : भाजपा के लिए तीसरा तुरुप का इक्का संतुलित विकल्प — कमलेंद्र सेमवाल(संपादकीय लेख — अवतार सिंह बिष्ट, रुद्रपुर) उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

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किच्छा विधानसभा की सियासत इस समय अपने सबसे रोचक मोड़ पर है। भाजपा में जहां टिकट को लेकर भीतरघात, महत्वाकांक्षा और आपसी टकराव का माहौल है, वहीं कांग्रेस ने अपनी चाल अभी तक गुप्त रखी है। पर इस बार चर्चा केवल दो नामों — राजेश शुक्ला और सुरेश गंगवार — की नहीं, बल्कि एक तीसरे चेहरे कमलेंद्र सेमवाल की भी है, जो धीरे-धीरे भाजपा की सियासी बिसात पर सबसे मजबूत “तीसरे विकल्प” के रूप में उभर रहे हैं।कमलेंद्र सेमवाल बन सकते हैं भाजपा के “तीसरे तुरुप के इक्का”


भाजपा में टकराव की तपिश : शुक्ला बनाम गंगवार

किच्छा विधानसभा की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प दौर में है। भाजपा के भीतर जहां पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और वरिष्ठ नेता सुरेश गंगवार के बीच अंतर्कलह खुलकर सामने आ चुकी है, वहीं अब एक नया नाम तेज़ी से उभर रहा है — कमलेंद्र सेमवाल। संगठन में उनकी पहचान एक शांत, रणनीतिक और जमीनी नेता के रूप में है, जो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी और भरोसेमंद माने जाते हैं।

दरअसल भाजपा के लिए किच्छा सीट इस बार केवल जीत की नहीं, संगठनिक एकता की परीक्षा भी है। शुक्ला के अनुभव और गंगवार की आर्थिक-सामाजिक पकड़ के बीच पार्टी का संतुलन डगमगाया हुआ है। ऐसे में हाईकमान को ऐसा चेहरा चाहिए जो अनुशासन, युवाशक्ति और जनता से सीधा संवाद—तीनों गुणों का मेल हो। यही कारण है कि अब राजनीतिक गलियारों में सेमवाल का नाम “तीसरे तुरुप के इक्के” के रूप में उभर रहा है।

किच्छा की जनता अब जातीय समीकरणों और मनोरंजनपरक राजनीति से ऊब चुकी है। लोग ऐसे नेता की तलाश में हैं जो विकास, युवाओं की रोजगार नीति और स्थानीय समस्याओं पर ठोस काम करे। सेमवाल का सधा हुआ व्यवहार और संगठन में जमीनी पकड़ इस जनभावना के अनुरूप है।

यदि भाजपा हाईकमान ने गुटबाज़ी से ऊपर उठकर संतुलित और कर्मठ नेतृत्व को तरजीह दी, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में कमलेंद्र सेमवाल न केवल किच्छा बल्कि पूरे उधम सिंह नगर में भाजपा की नई राजनीतिक पहचान बन सकते हैं।
यानी, जब दो खेमे भिड़ते हैं — तब तीसरा ही ताली बजाता है… और किच्छा में वह तीसरा शायद अब स्पष्ट दिखने लगा है।

— हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स विशेष पड़ताल

उत्तराखंड की राजनीति में किच्छा विधानसभा हमेशा से सुर्खियों में रही है। यह वही सीट है जिसने कभी पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को भारी मतों से पराजित कर भाजपा को गौरव दिलाया था। लेकिन समय बदल चुका है — अब इस सीट पर कई पुराने दिग्गजों के साथ-साथ नए समीकरण और रणनीतिक चेहरे उभर कर सामने आ रहे हैं। भाजपा के भीतर टिकट की होड़ शुरू हो चुकी है, वहीं कांग्रेस अभी भी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोल पाई है।

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स विशेष पड़ताल

भाजपा में मंथन : शुक्ला, गंगवार और सेमवाल के बीच तिकड़ी मुकाबला

सबसे पहले बात करते हैं भाजपा के पुराने और प्रभावशाली चेहरे पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की। शुक्ला ने अपने कार्यकाल में किच्छा और रुद्रपुर क्षेत्र के विकास में कई उल्लेखनीय काम किए — एम्स जैसी स्वास्थ्य सुविधा का विस्तार, बालिका कॉलेज की स्थापना, हाईटेक रोडवेज बस अड्डे की परिकल्पना और कई अस्पतालों के उन्नयन जैसे कदम उन्हें एक विकासशील नेता की छवि देते हैं।
लेकिन पार्टी के भीतर स्थिति अब उतनी सहज नहीं रही। सूत्रों के अनुसार, ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में विपिन जल्होत्रा को भाजपा का आधिकारिक प्रत्याशी बनाया गया था, किंतु राजनीतिक चालों के चलते शुक्ला ने भाजपा समर्थित एक दूसरी महिला प्रत्याशी —रीना गौतम जो अनुसूचित जाति से थीं — को विजयी बना दिया। कहा जाता है कि इस चुनाव में दोनों ओर से “जबरदस्त खेल” हुआ और परिणामस्वरूप पार्टी के भीतर असंतोष और विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई।

भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में ऐसी घटनाएं अनुशासनहीनता की श्रेणी में आती हैं। यही कारण है कि इस बार राजेश शुक्ला की टिकट दावेदारी पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। पार्टी के वरिष्ठ सूत्र मानते हैं कि हाईकमान किसी भी ऐसी स्थिति को पसंद नहीं करेगा जिसमें संगठन की एकजुटता पर प्रभाव पड़े।

सुरेश गंगवार : संगठनप्रिय लेकिन धनबल और जनबल दोनों में मजबूत

अब दूसरा नाम है पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सुरेश गंगवार का। गंगवार परिवार किच्छा क्षेत्र की राजनीति में राज्य गठन से लेकर अब तक एक प्रभावशाली शक्ति रहा है। 2000 से लेकर 2024 तक लगभग लगातार उनके परिवार का कोई न कोई सदस्य जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान रहा।
सुरेश गंगवार ने शीर्ष नेतृत्व के निर्देशों का पालन करते हुए 2024 में स्वयं दावेदारी नहीं की और अजय मौर्य को अवसर दिया, जो वर्तमान अध्यक्ष बने। इससे गंगवार का एक अनुशासित और संगठननिष्ठ चेहरा सामने आया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ उनकी कई मुलाकातें हो चुकी हैं और संगठन में उनका प्रभाव आज भी मजबूत है। धनबल और सामाजिक पकड़ के कारण उन्हें टिकट की दौड़ में प्रबल दावेदार माना जा रहा है।

राजनीति में उनका आचरण अपेक्षाकृत निर्विवाद माना जाता है। वे जमीनी नेता हैं और किसान व व्यापारी वर्ग में गहरी पकड़ रखते हैं। यही कारण है कि पार्टी में उनका नाम शीर्ष नेतृत्व तक गंभीरता से पहुंच चुका है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

कमलेंद्र सेमवाल : संगठन के ‘किंग मेकर’ या भावी प्रत्याशी?

तीसरा और संभवतः सबसे चर्चित नाम है कमलेंद्र सेमवाल का। कमलेंद्र सेमवाल बाल्यावस्था से ही संघ की विचारधारा से जुड़े रहे हैं। वे पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं और सत्ता गलियारों में उनकी गहरी आत्मीयता है। इस बार जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खटीमा से चुनाव लड़ा था, तब कमलेंद्र सेमवाल वहां के विधानसभा प्रभारी थे। बाद में धामी सरकार ने उन्हें किच्छा मंडी समिति का अध्यक्ष भी नियुक्त किया।

राज्य आंदोलन के दौर में भी सेमवाल सक्रिय रहे और उन्होंने पूरे उत्तराखंड का भ्रमण कर आंदोलन को गति दी। उनकी पहचान एक कर्मठ, युवा और रणनीतिक नेता की है।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि किच्छा में यदि भाजपा में शुक्ला और गंगवार के बीच अंतर्विरोध चरम पर पहुंचा, तो पार्टी तीसरे विकल्प के रूप में कमलेंद्र सेमवाल को आगे कर सकती है।

सेमवाल का सबसे बड़ा बल उनका सामाजिक नेटवर्क है। वे न केवल किच्छा बल्कि पूरे उधम सिंह नगर और गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्र में भी पहचाने जाते हैं। हर वर्ग, हर परिवार और युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है।
राजेश शुक्ला को भाजपा में लाने में भी सेमवाल की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही कारण है कि यदि टिकट वितरण के समय भाजपा हाईकमान ने “तीसरा संतुलित विकल्प” चुना, तो कमलेंद्र सेमवाल की संभावना सबसे अधिक होगी।

शुक्ला बनाम गंगवार : अंतर्विरोध से खुल सकता है तीसरे का रास्ता

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा में शुक्ला और गंगवार दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में ताकतवर हैं, लेकिन दोनों के बीच मनमुटाव पुराना है। संगठन में कोई भी ऐसी स्थिति नहीं चाहता जहां गुटबाजी से पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचे। ऐसे में, अगर पार्टी अनुशासन और संतुलन को प्राथमिकता देगी तो सेमवाल का नाम स्वाभाविक रूप से उभरेगा।
भाजपा का इतिहास भी यही बताता है कि जब दो दिग्गजों में टकराव होता है, तो पार्टी तीसरे विकल्प को आगे करती है — ताकि संतुलन बना रहे और संगठनिक एकता बरकरार रहे।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सेमवाल के आत्मीय संबंध इस संभावना को और बल देते हैं। सेमवाल “मुख्यमंत्री के सबसे करीबी” माने जाते हैं, और टिकट वितरण के समय उनके नाम को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

कांग्रेस में रहस्य : क्या तिलक राज बेहड़ फिर मैदान में उतरेंगे?

अब बात कांग्रेस की करें तो स्थिति फिलहाल रहस्यपूर्ण है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तिलक राज बेहड़, जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में किच्छा से सम्मान जनक जीत दर्ज की थी, अब किंग मेकर की भूमिका में हैं। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि वे स्वयं चुनाव लड़ेंगे या किसी अपने समर्थक को मैदान में उतारेंगे।
कांग्रेस संगठन फिलहाल “प्रतीक्षा मुद्रा” में है — स्थानीय समीकरण और भाजपा में संभावित अंतर्विरोध का अध्ययन किया जा रहा है। हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने पहले भी यह रहस्य उजागर किया था कि कांग्रेस टिकट वितरण में इस बार क्षेत्रीय संतुलन और जातीय समीकरण को प्राथमिकता दे सकती है।

अगर भाजपा में शुक्ला-गंगवार विवाद बढ़ता है, तो कांग्रेस उस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश करेगी। तिलक राज बेहड़ जैसे अनुभवी नेता जानते हैं कि कब और कहां मोर्चा खोलना है। इसलिए किच्छा की राजनीति में उनका रहस्य और भूमिका दोनों ही निर्णायक बने रहेंगे।

टिकट का समीकरण और जनता की भूमिका

किच्छा विधानसभा की राजनीति को समझना आसान नहीं है। यह सीट केवल राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव और आपसी रिश्तों का भी केंद्र रही है।
भाजपा में राजेश शुक्ला का विकासवादी चेहरा, सुरेश गंगवार की संगठननिष्ठा और कमलेंद्र सेमवाल की जनसंपर्क क्षमता — तीनों ही अपने-अपने तरीके से पार्टी के लिए उपयोगी हैं।
लेकिन अंततः निर्णय हाईकमान का होगा, और जैसा कि भाजपा का इतिहास बताता है — पार्टी अनुशासन और जीत दोनों को साथ लेकर चलना चाहती है।

ऐसे में, यदि इस बार टिकट वितरण में कोई “सरप्राइज” आता है, तो वह कमलेंद्र सेमवाल के नाम के रूप में सामने आ सकता है।
कांग्रेस की ओर से तिलक राज बेहड़ यदि फिर मैदान में उतरते हैं या किसी युवा चेहरे को सामने लाते हैं, तो मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है।

किच्छा की धरती ने हमेशा उत्तराखंड की राजनीति को दिशा दी है — इस बार भी 2027 का यह चुनाव प्रदेश की सियासी फिज़ा तय करेगा।
राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है, मोहरे अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं — अब देखना यह है कि इस बार “राजनीतिक लॉटरी” किसके नाम निकलती है।


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