चमोली। नंदा देवी राजजात केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक-स्मृतियों, देवी परंपराओं, क्षेत्रीय इतिहास और सामाजिक रिश्तों को अपने भीतर समेटे एक जीवंत आध्यात्मिक विरासत है। पजल पोथी-33 की पजल संख्या 1288 से 1293 तक में नंदा राजजात के अलग-अलग पड़ावों, प्रतीकों और लोकमान्यताओं को पहेलीनुमा शैली में सामने रखा गया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
इन पजलों में कुरुड़, नौटी, लाता, अल्मोड़ा, कांसुवा, दशोली, बधाण, ईड़ा-बधाणी और बाण जैसे स्थानों का उल्लेख मिलता है। साथ ही नंदा देवी के धर्मभाई माने जाने वाले लाटू देवता, चौसिंगा खाडू, देव छंतोली और नंदा की डोली को यात्रा की आध्यात्मिक पहचान से जोड़ा गया है।
नंदा की डोली और छंतोली का रहस्य
पजल 1288 में बांस, रिंगाल और भोजपत्र से बनने वाली छंतोली को नंदा राजजात की महत्वपूर्ण धार्मिक पहचान बताया गया है। इसमें नंदा की डोली, भिंटोली और मायके से दी जाने वाली विदाई की परंपरा का भाव भी दिखाई देता है। पहेली के चार विकल्पों में बंस्तोळी, छंतोली, डोली और भिंटोली रखे गए हैं, जिनके माध्यम से पाठक को उत्तर तक पहुंचने का संकेत दिया गया है।
यहां नंदा को मायके से कैलास स्थित ससुराल की ओर विदा होने वाली धियाणी के रूप में देखा गया है। दिन की नंदाजात और रात की चंदाजात जैसी लोक अभिव्यक्तियां इस यात्रा को धार्मिक भाव के साथ लोककाव्य का रूप देती हैं।
धर्मभाई लाटू और नंदा राजजात
पजल 1289 में नंदा और उसके धर्मभाई लाटू देवता के संबंध को केंद्र में रखा गया है। बाण स्थित लाटू देवता के थान को नंदा की कैलास यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पजल में कुरुड़, नौटी, कांसुवा, लाता और अल्मोड़ा से निकलने वाली नंदा यात्राओं के अलग-अलग मार्गों का उल्लेख करते हुए उनके आगे चलकर एक-दूसरे से जुड़ने की लोकपरंपरा सामने आती है।
पजल का एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि चौसिंगा खाडू नंदा की यात्रा में विशेष धार्मिक प्रतीक है। चार सींगों वाला यह खाडू नंदा के देवरथ के रूप में लोकमान्यता से जुड़ा बताया गया है।
लाल और सफेद निसाण की परंपरा
पजल 1290 में नंदा राजजात के झंडाबरदार यानी निसाण की परंपरा को विशेष स्थान दिया गया है। इसमें लाल और सफेद निसाण की यात्रा-दिशा के साथ बदलती भूमिका का वर्णन मिलता है। लोकमान्यता के अनुसार कैलास की ओर जाते समय एक निसाण आगे और दूसरा पीछे रहता है, जबकि वापसी में उनकी स्थिति बदल जाती है।
इस प्रतीक के माध्यम से यात्रा में केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि अनुशासन, दिशा और देव-परंपरा की निरंतरता का भाव भी जुड़ा दिखाई देता है।
नंदाजात की ‘नटखट’ नंदा कौन?
पजल 1291 में कुरुड़ और नौटी की नंदा के बीच लोककथा आधारित संवाद और क्षेत्रीय परंपराओं का वर्णन है। इसमें लाता और अल्मोड़ा की नंदा का भी उल्लेख आता है। चीणा और कौंणी जैसे पारंपरिक अनाज के संदर्भ के जरिए पहेली उत्तराखंड की पुरानी कृषि-संस्कृति को भी धार्मिक कथा से जोड़ती है।
पजल में चांदपुर गढ़ी, राजा अजयपाल और नंदा देवी की आराधना से जुड़ी लोकमान्यताओं का उल्लेख करते हुए यह कथा सामने आती है कि नंदा की कृपा पाने के लिए राजपरिवार ने नंदा राजजात की परंपरा निभाने का संकल्प लिया।
ईड़ा-बधाणी और सेवा की लोकपरंपरा
पजल 1293 का केंद्र ईड़ा-बधाणी है। इसमें जमन सिंह जदोड़ा और नंदा देवी से जुड़ी लोककथा का वर्णन मिलता है। मान्यता के अनुसार शिव-पार्वती के जोगी-जोगन रूप में ईड़ा-बधाणी पहुंचने और वहां आतिथ्य स्वीकार करने की कथा इस क्षेत्र को नंदा यात्रा की सेवा-परंपरा से जोड़ती है।
इसी लोककथा में नंदा की गोद में लिए गए मेमने के चौसिंगा खाडू बनने की कथा आती है। यही कारण है कि पजल में चौसिंगा खाडू को नंदा के देवरथ के रूप में विशेष महत्व दिया गया है।
नंदा राजजात सिर्फ यात्रा नहीं, लोक इतिहास है
इन पजलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें धार्मिक आस्था के साथ लोकभाषा, लोककथा, कृषि, क्षेत्रीय भूगोल, पारिवारिक रिश्ते और देव परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं। नंदा को कहीं बेटी, कहीं बहन, कहीं धियाणी और कहीं देवी के रूप में संबोधित किया गया है।
नंदा राजजात की यह परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में मायके और ससुराल, भाई-बहन तथा देवी-देवताओं के रिश्तों की सांस्कृतिक कल्पना को भी अभिव्यक्त करती है। कुरुड़ से लेकर नौटी, कांसुवा, ईड़ा-बधाणी, लाता और अल्मोड़ा तक फैली कथाएं इस धार्मिक यात्रा को एक व्यापक लोक-सांस्कृतिक परंपरा का रूप देती हैं।
पजलकार जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ की इन पहेलियों में छिपा संदेश यही है कि नंदा राजजात को केवल एक यात्रा के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पीढ़ियों से चली आ रही आध्यात्मिक और लोक-सांस्कृतिक स्मृति के रूप में पढ़ा जाए।
स्रोत/आधार: जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ की पजल पोथी-33, पजल संख्या 1288–1293 और उपलब्ध शब्दार्थ/भावार्थ।
