किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट—क्या चुनाव के बाद शहर की जमीन का हिसाब होगा?
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट
चुनाव खत्म होते ही किसके दरवाजे पहुंचेगा विकास का बुलडोजर?
संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट—क्या चुनाव के बाद शहर की जमीन का हिसाब होगा?
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट
चुनाव खत्म होते ही किसके दरवाजे पहुंचेगा विकास का बुलडोजर?
संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट—क्या चुनाव के बाद शहर की जमीन का हिसाब होगा?
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट
चुनाव खत्म होते ही किसके दरवाजे पहुंचेगा विकास का बुलडोजर?
संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट—क्या चुनाव के बाद शहर की जमीन का हिसाब होगा?
किच्छा में 2027 से पहले बुलडोजर बनाम वोट
चुनाव खत्म होते ही किसके दरवाजे पहुंचेगा विकास का बुलडोजर?
संपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
किच्छा आज सिर्फ नगर पालिका चुनाव के मुहाने पर खड़ा शहर नहीं है। किच्छा इस समय अपने भविष्य के सबसे बड़े सवाल के सामने खड़ा है।
विकास बनाम विस्थापन।
स्मार्ट शहर बनाम बुलडोजर।
सरकारी जमीन की सुरक्षा बनाम दशकों से बसे परिवारों के अधिकार।
और सबसे बड़ा सवाल—चुनाव के बाद किच्छा की तस्वीर कौन तय करेगा?
11 सितंबर 2026 को जिला प्रशासन ने किच्छा और सिरौलीकला नगर पालिका चुनाव के लिए मतदान तथा मतगणना से जुड़े कार्मिकों का रेंडमाइजेशन पूरा किया। किच्छा में 56 बूथ, सिरौलीकला में 13 बूथ, दोनों निकायों के लिए रिजर्व सहित 87 पोलिंग पार्टियां और 348 मतदान कार्मिक लगाए गए हैं। किच्छा में मतगणना के लिए 20 टेबल तथा सिरौलीकला में चार टेबल निर्धारित की गई हैं। मतदान कार्मिकों का प्रशिक्षण 15 सितंबर और मतगणना कार्मिकों का प्रशिक्षण 16 सितंबर को प्रस्तावित है।
अर्थात चुनाव की प्रशासनिक तैयारी अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है।
मगर किच्छा की जनता को चुनावी नारों से आगे जाकर एक सवाल पूछना चाहिए—
नगर पालिका चुनाव के बाद क्या होगा?
और उससे भी बड़ा सवाल—
2027 विधानसभा चुनाव के बाद क्या होगा?
2023 की जेसीबी आज भी किच्छा की स्मृति में है
मई 2023 में किच्छा में अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हुई थी। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार सड़क किनारे बने करीब 200 मकान-दुकानों पर कार्रवाई की गई थी।
कई निर्माण दशकों पुराने बताए गए थे।
कई दुकानों से परिवारों की रोजी-रोटी चल रही थी।
कई लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी उसी कारोबार में लगा दी थी।
प्रशासन की नजर में वह अतिक्रमण था।
व्यापारी की नजर में वह उसकी दुकान थी।
परिवार की नजर में वह घर था।
यही वह जगह है जहां कानून और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन की जरूरत पड़ती है।
सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटना चाहिए—यह कानून का विषय है।
मगर वर्षों से बसे परिवारों का भविष्य क्या होगा—यह सरकार की जिम्मेदारी का विषय भी है।
अब किच्छा के सामने दूसरा दौर?
किच्छा में रेलवे भूमि, सड़क चौड़ीकरण, रेलवे फाटक, नालियों, पार्कों, सरकारी भूमि, सिंचाई नहरों और सार्वजनिक रास्तों से जुड़े अतिक्रमण की चर्चाएं लंबे समय से हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नगर पालिका चुनाव के बाद प्रशासन इन मामलों का व्यापक सर्वे कर सकता है?
अगर सर्वे हुआ तो कितने निर्माण उसकी जद में आएंगे?
अगर सड़क चौड़ीकरण हुआ तो कितनी दुकानें प्रभावित होंगी?
अगर रेलवे विस्तार हुआ तो कितने मकानों पर सवाल खड़ा होगा?
अगर नहर की भूमि चिन्हित हुई तो आसपास बसे परिवारों का क्या होगा?
अगर कॉलोनियों के पार्कों की जमीन की पैमाइश हुई तो वहां बने निर्माणों का क्या होगा?
अगर नाली और सार्वजनिक रास्तों पर निर्माण चिन्हित हुए तो क्या कार्रवाई होगी?
इन सवालों का जवाब चुनाव से पहले जनता को मिलना चाहिए।
क्योंकि जनता को मतदान से पहले सिर्फ यह जानने का अधिकार नहीं है कि कौन जीतेगा।
जनता को यह जानने का भी अधिकार है कि जीतने के बाद क्या होगा।
भाजपा की बुलडोजर नीति पर सवाल
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री ने राज्य में करीब 13 हजार एकड़ भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराने की बात कही थी।
सरकार का पक्ष है कि सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है और उसे कब्जे से मुक्त कराना जरूरी है।
इस तर्क को कानून के स्तर पर समझा जा सकता है।
लेकिन राजनीति का सवाल अलग है।
क्या अतिक्रमण हटाने का अभियान समान रूप से चलेगा?
क्या छोटे दुकानदार और बड़े कारोबारी के लिए एक जैसा पैमाना होगा?
क्या गरीब की झोपड़ी और प्रभावशाली व्यक्ति के बड़े निर्माण पर कानून की गति समान होगी?
क्या पहले दस्तावेजों की जांच होगी?
क्या व्यक्तिगत सुनवाई होगी?
क्या पुनर्वास होगा?
क्या वर्षों से बसे परिवारों को कोई वैकल्पिक व्यवस्था मिलेगी?
यही सवाल भाजपा को किच्छा की जनता के सामने रखना चाहिए।
स्मार्ट किच्छा का सपना या बुलडोजर का शहर?
मुख्यमंत्री धामी और भाजपा नेतृत्व उत्तराखंड के शहरों को आधुनिक, व्यवस्थित और बेहतर बनाने की बात करते हैं।
किच्छा भी विकास चाहता है।
सड़क चौड़ी हो।
रेलवे फाटक की समस्या खत्म हो।
यातायात सुधरे।
नालियां व्यवस्थित हों।
पार्क सुरक्षित हों।
बाजार सुंदर बने।
सरकारी जमीन सुरक्षित रहे।
नए उद्योग आएं।
रोजगार बढ़े।
इनमें से किसी बात पर जनता को आपत्ति क्यों होगी?
मगर सवाल यह है—
विकास की पहली शर्त नागरिक को उजाड़ना क्यों बने?
अगर सड़क चौड़ी करनी है तो पहले नक्शा दिखाइए।
अगर रेलवे भूमि खाली करानी है तो सीमांकन कराइए।
अगर पार्क की जमीन पर कब्जा है तो रिकॉर्ड सामने रखिए।
अगर नहर की जमीन पर निर्माण है तो खसरा नंबर सार्वजनिक कीजिए।
अगर मकान सरकारी जमीन पर है तो परिवार को दस्तावेज दिखाइए।
और अगर किसी परिवार के पास दशकों पुराने कागजात हैं तो उसकी सुनवाई कीजिए।
बुलडोजर से पहले रिकॉर्ड जनता के सामने होना चाहिए।
किच्छा के मूल निवासियों का सबसे बड़ा सवाल
किच्छा में ऐसे परिवार हैं जिनकी पीढ़ियां यहीं गुजर गईं।
उनके बच्चे इसी मिट्टी में बड़े हुए।
उन्होंने इसी शहर में कारोबार किया।
इसी शहर में घर बनाए।
इसी शहर में जीवन बिताया।
मगर जमीन के मालिकाना हक का सवाल आज भी कई परिवारों के सामने है।
यह केवल जमीन का मामला नहीं है।
यह सम्मान का सवाल है।
यह सुरक्षा का सवाल है।
यह भविष्य का सवाल है।
अगर किसी परिवार को दशकों तक सरकारी व्यवस्था ने वहां रहने दिया, बिजली-पानी की व्यवस्था हुई, स्थानीय निकायों ने सेवाएं दीं और परिवार वहां जीवन बनाता रहा, तो एक दिन अचानक उसे सिर्फ अतिक्रमणकारी बताकर उसके भविष्य का फैसला कर देना समाधान का पूरा रास्ता नहीं हो सकता।
सरकार को ऐसी जमीनों के लिए स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
कौन पात्र है?
कौन अपात्र है?
किसे मालिकाना हक मिल सकता है?
किसे नियमितीकरण मिल सकता है?
किसे पुनर्वास मिलेगा?
जनता को इन सवालों के जवाब चाहिए।
बंगाली, पंजाबी और देसी समाज का सवाल भी किच्छा का सवाल है
किच्छा की ताकत उसकी विविधता है।
बंगाली समाज ने तराई की कृषि और सामाजिक जीवन में योगदान दिया।
पंजाबी समाज ने व्यापार, खेती और उद्योगों में योगदान दिया।
पूर्वांचल और दूसरे क्षेत्रों से आए परिवारों ने श्रम, व्यापार और सेवा क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाई।
पहाड़ से आए लोगों ने भी किच्छा को अपना कर्मक्षेत्र बनाया।
इसलिए किच्छा किसी एक समाज का शहर नहीं है।
यह सभी मेहनतकश नागरिकों का शहर है।
इसलिए अतिक्रमण की कार्रवाई का आधार भी एक होना चाहिए—
दस्तावेज और कानून।
किसी की भाषा नहीं।
किसी की जाति नहीं।
किसी का क्षेत्र नहीं।
किसी की राजनीतिक पहचान नहीं।
क्या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग कानून होगा?
यही वह सवाल है जहां भाजपा सरकार को सबसे ज्यादा पारदर्शिता दिखानी होगी।
सरकार कहती है कि सरकारी जमीन पर कब्जा हटेगा।
जनता कहती है—बिल्कुल हटाइए।
मगर साथ में यह भी पूछती है—
पहले बड़े कब्जे हटेंगे या छोटे दुकानदारों की बारी आएगी?
रुद्रपुर में नजूल भूमि और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई का मुद्दा लगातार सामने आया है। एक मामले में विवादित नजूल भूमि पर निर्माण रोकने का आदेश हाईकोर्ट ने भी दिया था; मामले में सरकारी रिकॉर्ड और भूमि के स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।
यही कारण है कि किच्छा की जनता रुद्रपुर के अनुभव से सवाल पूछ रही है।
रुद्रपुर की तरफ देखिए, किच्छा को चेतावनी मिल जाएगी
रुद्रपुर के लोगों ने भी विकास के नाम पर बड़े बदलाव देखे हैं।
सड़कें बदलीं।
शहर का विस्तार हुआ।
अतिक्रमण हटे।
नजूल भूमि के मामले सामने आए।
निर्माणों पर कार्रवाई हुई।
कई परिवार प्रभावित हुए।
कई कारोबारों पर असर पड़ा।
और आज भी जमीन के अधिकार और सरकारी भूमि को लेकर विवाद खत्म नहीं हुए हैं।
रुद्रपुर की एक जमीन के मामले में हाईकोर्ट तक मामला पहुंचा।
तो किच्छा के मतदाता क्यों न पूछें—
क्या हमें भी चुनाव से पहले पूरी जानकारी दी जाएगी?
चुनावी सवाल सिर्फ सड़क और नाली का नहीं होना चाहिए
किच्छा के उम्मीदवारों से इस बार केवल यह मत पूछिए कि सड़क कब बनेगी।
यह भी पूछिए—
1. अतिक्रमण पर आपकी नीति क्या है?
2. पुराने बसे परिवारों के लिए आपकी नीति क्या है?
3. रेलवे भूमि का सीमांकन कब सार्वजनिक होगा?
4. सड़क चौड़ीकरण से कितने लोग प्रभावित होंगे?
5. प्रभावित दुकानदारों के पुनर्वास की योजना क्या है?
6. पार्क की जमीन पर कब्जों का क्या होगा?
7. नालियों और सार्वजनिक रास्तों पर निर्माण का क्या होगा?
8. सिंचाई विभाग की जमीन पर बने निर्माणों की स्थिति क्या है?
9. क्या कार्रवाई से पहले सुनवाई होगी?
10. क्या बड़े और छोटे निर्माणों पर समान कानून लागू होगा?
अगर प्रत्याशी इन सवालों का जवाब देने से बचता है तो मतदाता को भी सोचने का अधिकार है।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा बन सकता है बुलडोजर
नगर पालिका चुनाव खत्म होगा।
इसके बाद विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू होगी।
2027 में किच्छा की जनता फिर मतदान करेगी।
उस समय सवाल सिर्फ विधायक कौन बनेगा, इतना भर नहीं होगा।
सवाल यह भी होगा—
किच्छा का भविष्य किस मॉडल से बनेगा?
एक मॉडल कहेगा—
सड़क चौड़ी करो।
सरकारी जमीन खाली करो।
अतिक्रमण हटाओ।
शहर व्यवस्थित करो।
दूसरा मॉडल पूछेगा—
ठीक है, लेकिन जिन लोगों का घर टूटेगा उनका क्या?
जिसकी दुकान जाएगी उसका क्या?
जिस परिवार के पास मालिकाना हक का दस्तावेज नहीं है मगर तीन पीढ़ियां वहीं रह रही हैं उसका क्या?
यही बहस 2027 की राजनीति में किच्छा को प्रभावित कर सकती है।
भाजपा के लिए असली परीक्षा
भाजपा के सामने आज सबसे बड़ा अवसर भी है और चुनौती भी।
अगर सरकार सचमुच किच्छा को स्मार्ट और आधुनिक शहर बनाना चाहती है तो उसे सबसे पहले अतिक्रमण नीति का श्वेतपत्र जारी करना चाहिए।
कितनी सरकारी भूमि?
कहां अतिक्रमण?
कितने परिवार?
कितनी दुकानें?
कितने निर्माण?
कितनी कार्रवाई?
कितना पुनर्वास?
कितना मुआवजा?
कितनी वैकल्पिक व्यवस्था?
सब सार्वजनिक होना चाहिए।
तभी जनता विश्वास करेगी कि बुलडोजर कानून के लिए है, किसी वर्ग के लिए नहीं।
यह कांग्रेस को वोट देने की अपील नहीं
एक बात स्पष्ट होनी चाहिए।
यह संपादकीय कांग्रेस के पक्ष में वोट मांगने के लिए नहीं है।
भाजपा को वोट देना है या कांग्रेस को, निर्दलीय को वोट देना है या किसी दूसरे दल को—यह फैसला किच्छा की जनता करेगी।
मगर मतदान करते समय एक बात जरूर पूछिए—
क्या मेरा प्रतिनिधि चुनाव के बाद मेरे साथ खड़ा रहेगा?
क्या वह अतिक्रमण प्रभावित परिवारों की आवाज बनेगा?
क्या वह प्रशासन से रिकॉर्ड मांगेगा?
क्या वह पुनर्वास की मांग करेगा?
क्या वह बड़े और छोटे निर्माण पर समान कार्रवाई की मांग करेगा?
अगर जवाब हां है तो उसका समर्थन कीजिए।
अगर जवाब सिर्फ चुनावी भाषण है तो फैसला आपका है।
बुलडोजर का डर लोकतंत्र का मुद्दा क्यों है?
बुलडोजर का डर केवल मकान टूटने का डर नहीं है।
यह रोजगार का डर है।
यह बच्चों की पढ़ाई का डर है।
यह परिवार के भविष्य का डर है।
यह बैंक के कर्ज का डर है।
यह दुकान की रोजी-रोटी का डर है।
यह सामाजिक सम्मान का डर है।
और सबसे बड़ा डर है—
कल सुबह प्रशासन का नोटिस किसके दरवाजे पर होगा?
यही डर लोकतंत्र में सवाल पैदा करता है।
सरकार को इस डर को समाप्त करना चाहिए।
कैसे?
पारदर्शिता से।
रिकॉर्ड सार्वजनिक करके।
सर्वे कराकर।
सुनवाई करके।
पुनर्वास की नीति बनाकर।
और कानून सब पर समान लागू करके।
किच्छा को डर नहीं, स्पष्ट नीति चाहिए
किच्छा के लोगों को अफवाहों से बचना चाहिए।
किसी के कहने भर से यह मान लेना कि चुनाव के बाद 80 प्रतिशत घर टूटेंगे—तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।
ऐसी किसी व्यापक कार्रवाई की आधिकारिक घोषणा सामने आए तो उसकी पुष्टि जरूरी होगी।
मगर दूसरी तरफ सरकार भी यह कहकर बच नहीं सकती कि जनता सवाल पूछना बंद कर दे।
जहां अतिक्रमण है वहां रिकॉर्ड सार्वजनिक कीजिए।
जहां विकास परियोजना है वहां नक्शा सार्वजनिक कीजिए।
जहां रेलवे विस्तार है वहां सीमांकन सार्वजनिक कीजिए।
जहां सड़क चौड़ीकरण है वहां प्रभावित परिवारों की सूची सार्वजनिक कीजिए।
और जहां दशकों पुराने बसे परिवार हैं वहां उनके अधिकारों पर नीति सार्वजनिक कीजिए।
अंतिम सवाल: किच्छा किसका होगा?
किच्छा आने वाले वर्षों में तेजी से बदलने वाला शहर है।
सड़कें बढ़ेंगी।
रेलवे व्यवस्था बदलेगी।
आबादी बढ़ेगी।
बाजार फैलेंगे।
नई कॉलोनियां आएंगी।
उद्योग आएंगे।
शहर आधुनिक होगा।
मगर इस विकास में एक बात तय करनी होगी—
किच्छा विकास का शहर बनेगा या विस्थापन का?
क्या यहां रहने वाला गरीब भी स्मार्ट किच्छा का हिस्सा होगा?
क्या छोटा दुकानदार भी इस विकास में जगह पाएगा?
क्या दशकों से बसे परिवार को मालिकाना हक मिलेगा?
क्या बंगाली, पंजाबी, पहाड़ी, देसी—हर समाज को बराबर नागरिक अधिकार मिलेंगे?
क्या कानून प्रभावशाली और कमजोर के बीच समान दूरी रखेगा?
यही असली परीक्षा है।
किच्छा के मतदाताओं के नाम अंतिम संदेश
मतदान कीजिए।
जिसे उचित समझें उसे वोट दीजिए।
मगर सवाल पूछकर वोट दीजिए।
अपने दस्तावेज देखकर वोट दीजिए।
अपने बच्चों का भविष्य सोचकर वोट दीजिए।
अपने घर की सुरक्षा सोचकर वोट दीजिए।
अपने कारोबार की सुरक्षा सोचकर वोट दीजिए।
और उम्मीदवार से यह जरूर पूछिए—
“चुनाव जीतने के बाद अगर बुलडोजर मेरे दरवाजे पर आया तो आप मेरे साथ खड़े होंगे या प्रशासन के साथ?”
यही सवाल इस चुनाव की असली परीक्षा हो सकता है।
किच्छा को विकास चाहिए।
किच्छा को स्मार्ट शहर चाहिए।
किच्छा को चौड़ी सड़क चाहिए।
किच्छा को साफ नालियां चाहिए।
किच्छा को सुरक्षित बाजार चाहिए।
मगर किच्छा को न्यायपूर्ण विकास भी चाहिए।
सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाइए।
मगर कानून के साथ।
समानता के साथ।
सुनवाई के साथ।
पुनर्वास की संवेदना के साथ।
क्योंकि—
बुलडोजर सड़क चौड़ी कर सकता है, मगर जनता का भरोसा बुलडोजर से नहीं बनाया जा सकता।
और 2027 में किच्छा की जनता शायद यही सवाल पूछेगी—
“विकास के नाम पर हमें क्या मिला—स्मार्ट शहर या बुलडोजर का डर?”
अवतार सिंह बिष्ट
संपादकीय — हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
