किच्छा इस समय सिर्फ नगर पालिका चुनाव नहीं लड़ रहा है। किच्छा अपने भविष्य का फैसला करने की तैयारी में है।
एक तरफ चुनाव है। दूसरी तरफ शहर के विस्तार, सड़क चौड़ीकरण, रेलवे भूमि, सरकारी जमीन, नहरों, पार्कों, नालियों और वर्षों से बसे परिवारों के अधिकार का सवाल है।
और इन सबके बीच एक शब्द किच्छा की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा पैदा कर रहा है—
बुलडोजर।
क्या चुनाव के बाद किच्छा में अतिक्रमण के खिलाफ बड़ा अभियान चलेगा?
क्या सड़क और रेलवे परियोजनाओं के नाम पर दुकानों और मकानों की पैमाइश होगी?
क्या सरकारी भूमि पर बने निर्माणों की जांच होगी?
क्या कॉलोनियों के भीतर पार्क और रास्तों पर हुए निर्माण भी कार्रवाई की जद में आएंगे?
क्या दशकों से बसे परिवारों को अपने दस्तावेज लेकर प्रशासन के सामने खड़ा होना पड़ेगा?
इन सवालों का आधिकारिक उत्तर अभी जनता के सामने किसी व्यापक कार्रवाई के रूप में मौजूद नहीं है। मगर सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि उत्तराखंड सरकार ने सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने को अपनी प्रमुख नीतियों में रखा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अगस्त 2026 में कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में प्रदेश में 13 हजार एकड़ से अधिक सरकारी भूमि अतिक्रमण मुक्त कराई गई है।
तो फिर किच्छा पूछ रहा है—
अगला नंबर किसका है?
2023 की कार्रवाई किच्छा भूला नहीं है
मई 2023 में किच्छा में अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हुई थी। प्रकाशित रिपोर्टों में करीब 200 अवैध कब्जों और निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई का उल्लेख हुआ था।
उस कार्रवाई ने शहर को हिला दिया था।
दुकानदारों ने अपनी दुकानें टूटते देखीं।
परिवारों ने अपने आशियाने जाते देखे।
छोटे कारोबारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट आया।
प्रशासन के पास अपने तर्क थे—सड़क, सरकारी भूमि और सार्वजनिक क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करना।
लेकिन प्रभावित परिवारों के पास भी अपने सवाल थे—
हमारा पुनर्वास कहां है?
हमारी रोजी-रोटी का क्या होगा?
दशकों पुराने निर्माण की जिम्मेदारी किसकी है?
यही सवाल आज फिर लौट रहा है।
2025 में 87 अतिक्रमण चिन्हित होने की रिपोर्ट
किच्छा में नवंबर 2025 में प्रशासन द्वारा 87 अतिक्रमण चिन्हित किए जाने और कार्रवाई किए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी।
यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है।
इसका अर्थ यह है कि किच्छा में अतिक्रमण का प्रश्न 2023 की कार्रवाई के साथ खत्म नहीं हुआ।
अतिक्रमण का सर्वे, चिन्हांकन और कार्रवाई की प्रक्रिया अलग-अलग समय पर आगे बढ़ सकती है।
यही कारण है कि नगर पालिका चुनाव के बीच किच्छा की जनता को अपने भविष्य का सवाल पूछना चाहिए।
चुनाव की मशीनरी तैयार, जनता के सवाल बाकी
जिला प्रशासन किच्छा नगर पालिका चुनाव की तैयारी कर रहा है।
56 मतदान केंद्र।
87 पोलिंग पार्टियां।
348 मतदान कार्मिक।
किच्छा में मतगणना के लिए 20 टेबल।
15 सितंबर को मतदान कार्मिकों का प्रशिक्षण।
16 सितंबर को मतगणना कार्मिकों का प्रशिक्षण।
यानी प्रशासन चुनावी प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह सक्रिय है।
अब सवाल जनता की तरफ से है—
चुनाव के बाद प्रशासन की प्राथमिकता क्या होगी?
क्या सड़कें?
क्या सफाई?
क्या नालियां?
क्या पार्क?
क्या रेलवे फाटक?
या फिर अतिक्रमण?
अगर अतिक्रमण हटाना सरकार की नीति है तो किच्छा के मतदाताओं को चुनाव से पहले यह जानने का अधिकार है कि उनके क्षेत्र में सरकार की योजना क्या है।
भाजपा से पहला सवाल—किच्छा का पूरा नक्शा सार्वजनिक क्यों नहीं?
अगर सड़क चौड़ीकरण प्रस्तावित है तो नक्शा सामने आना चाहिए।
अगर रेलवे भूमि का सीमांकन होना है तो सीमांकन की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
अगर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण है तो खसरा नंबर सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
अगर पार्क की जमीन पर कब्जा है तो नगर पालिका को रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए।
अगर नहर की जमीन पर निर्माण है तो सिंचाई विभाग को सीमा स्पष्ट करनी चाहिए।
अगर सड़क के दोनों ओर अतिक्रमण चिन्हित है तो प्रभावित दुकानों और मकानों की सूची सार्वजनिक होनी चाहिए।
सरकार के पास रिकॉर्ड है तो जनता से क्यों छिपे?
यही लोकतंत्र का सवाल है।
दूसरा सवाल—क्या कानून सबके लिए समान चलेगा?
किच्छा का सबसे बड़ा डर बुलडोजर से ज्यादा असमान कार्रवाई का है।
गरीब की छोटी दुकान सड़क से दो फीट बाहर है तो कार्रवाई।
मजदूर का टीनशेड सरकारी भूमि पर है तो कार्रवाई।
छोटे दुकानदार का चबूतरा नाली के ऊपर है तो कार्रवाई।
लेकिन बड़ा निर्माण किस तरह जांचा जाएगा?
प्रभावशाली व्यक्ति की संपत्ति की पैमाइश कौन करेगा?
बड़े कारोबारी के निर्माण का रिकॉर्ड कौन देखेगा?
जनता का सवाल बिल्कुल साफ है—
क्या बुलडोजर गरीब और रसूखदार के बीच फर्क करेगा?
सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।
तीसरा सवाल—दशकों से बसे परिवार अतिक्रमणकारी हैं या नागरिक?
यह सवाल किच्छा के लिए सबसे संवेदनशील है।
ऐसे परिवार हैं जो दशकों से यहां रह रहे हैं।
उनके बच्चे यहीं पैदा हुए।
उन्होंने इसी शहर में शिक्षा पाई।
इसी शहर में रोजगार किया।
इसी शहर में दुकान खोली।
इसी शहर में मकान बनाया।
मगर जमीन का मालिकाना हक आज भी स्पष्ट नहीं है।
तो सरकार से सवाल है—
अगर कोई परिवार 30, 40 या 50 वर्षों से किसी जगह रह रहा है तो क्या उसके दस्तावेजों की जांच करके नियमितीकरण की संभावना देखी जाएगी?
क्या पात्र परिवारों को मालिकाना हक दिया जाएगा?
क्या पुनर्वास की नीति बनेगी?
क्या उन्हें अचानक बेघर होने से पहले वैकल्पिक व्यवस्था मिलेगी?
यह सवाल राजनीति से ज्यादा मानवीय है।
चौथा सवाल—क्या स्मार्ट किच्छा बुलडोजर से बनेगा?
भाजपा किच्छा को विकसित करने की बात करती है।
शहर आधुनिक बने।
सड़क चौड़ी हो।
रेलवे व्यवस्था बेहतर हो।
यातायात सुधरे।
बाजार व्यवस्थित हो।
पार्क सुरक्षित रहें।
सरकारी भूमि मुक्त हो।
कौन इसका विरोध करेगा?
मगर विकास का दूसरा चेहरा भी होता है।
अगर सड़क चौड़ी हुई तो किसकी दुकान जाएगी?
अगर रेलवे की सीमा बदली तो किसका मकान प्रभावित होगा?
अगर पार्क की जमीन खाली हुई तो वहां रहने वाले परिवार कहां जाएंगे?
अगर नहर की जमीन खाली हुई तो आसपास बसे लोगों का क्या होगा?
अगर नाली के ऊपर बने निर्माण टूटे तो दुकानदार की रोजी-रोटी कैसे चलेगी?
इसलिए सवाल विकास के खिलाफ होना नहीं है।
सवाल है—
विकास में जनता की भागीदारी कहां है?
रुद्रपुर किच्छा के सामने आईना है
रुद्रपुर ने भी अतिक्रमण और सरकारी भूमि को लेकर बड़े अभियान देखे हैं।
नजूल भूमि को लेकर विवाद हुए।
अवैध निर्माणों पर कार्रवाई हुई।
सड़क और सार्वजनिक भूमि को लेकर अभियान चले।
कई परिवारों और कारोबारियों को प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
ऐसे मामलों में जनता के भीतर एक भावना पैदा होती है कि चुनाव के समय नेता भरोसा दिलाते हैं और बाद में प्रशासन अपनी कार्रवाई करता है।
किच्छा के मतदाता इसलिए रुद्रपुर से सबक ले सकते हैं।
आज रुद्रपुर है।
कल किच्छा हो सकता है।
परसों कोई और शहर।
इसलिए सवाल आज ही पूछा जाना चाहिए।
धामी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक टेस्ट
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के अभियान को सरकार की उपलब्धियों में गिनाया है। अगस्त 2026 में उन्होंने 13 हजार एकड़ से अधिक सरकारी भूमि मुक्त कराने की बात कही।
यह सरकार के लिए उपलब्धि हो सकती है।
मगर जनता के लिए इसके साथ दूसरा सवाल भी है—
इन कार्रवाइयों से प्रभावित परिवारों के लिए सरकार ने क्या किया?
सरकारी भूमि बचाना जरूरी है।
मगर नागरिकों का भविष्य भी जरूरी है।
यही वह संतुलन है जहां भाजपा सरकार की असली परीक्षा होगी।
किच्छा के बंगाली, पंजाबी, पहाड़ी और देसी समाज का सवाल
किच्छा की पहचान विविध समाज से बनी है।
बंगाली परिवारों ने खेती और व्यापार को मजबूत किया।
पंजाबी समाज ने कृषि और कारोबार में बड़ा योगदान दिया।
पूर्वांचल तथा अन्य क्षेत्रों से आए लोगों ने मजदूरी, उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र को मजबूत किया।
पहाड़ से आए लोगों ने भी किच्छा को अपना कर्मक्षेत्र बनाया।
इसलिए किसी भी समुदाय को “बाहर का” कहकर उसके अधिकारों पर सवाल खड़ा करना किच्छा की सामाजिक संरचना को कमजोर करेगा।
अतिक्रमण का फैसला अगर होना है तो केवल एक आधार होना चाहिए—
कानूनी रिकॉर्ड।
न जाति।
न भाषा।
न क्षेत्र।
न राजनीतिक संबंध।
न आर्थिक प्रभाव।
2027 में यही मुद्दा भाजपा के सामने खड़ा होगा
नगर पालिका चुनाव खत्म होगा।
कुछ समय बाद 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीति तेज होगी।
तब भाजपा से किच्छा की जनता पूछ सकती है—
पांच साल में आपने शहर के लिए क्या किया?
लेकिन इसके साथ दूसरा सवाल होगा—
हमारे घर और दुकान कितने सुरक्षित हैं?
अगर सरकार सड़क चौड़ी करती है तो जनता पूछेगी—मुआवजा?
अगर रेलवे विस्तार होता है तो जनता पूछेगी—पुनर्वास?
अगर सरकारी भूमि खाली कराई जाती है तो जनता पूछेगी—वर्षों से बसे परिवारों का क्या?
अगर पार्क खाली कराया जाता है तो जनता पूछेगी—वैकल्पिक स्थान?
अगर नहर के किनारे कार्रवाई होती है तो जनता पूछेगी—किस आधार पर?
यानी 2027 का चुनाव केवल विकास बनाम विकास का चुनाव नहीं होगा।
यह विकास बनाम सुरक्षा और अधिकार का चुनाव भी बन सकता है।
जनता से हमारा सवाल—डरिए मत, जागिए
यह संपादकीय लोगों को डराने के लिए नहीं है।
यह लोगों को जगाने के लिए है।
अगर आपका मकान सरकारी जमीन पर है तो दस्तावेज जांचिए।
अगर आपकी दुकान सड़क की सीमा में आती है तो रिकॉर्ड देखिए।
अगर आपकी जमीन पार्क या नहर की भूमि से जुड़ी है तो सीमांकन समझिए।
अगर आपके पास पुराना पट्टा है तो उसे सुरक्षित रखिए।
अगर आपके पास रजिस्ट्री है तो उसकी वैधानिक स्थिति जांचिए।
अगर कोई नोटिस आता है तो उसे गंभीरता से लीजिए।
जरूरत पड़े तो कानूनी सलाह लीजिए।
अफवाहों पर भरोसा मत कीजिए। रिकॉर्ड पर भरोसा कीजिए।
और भाजपा से हमारा सीधा सवाल
भाजपा अगर किच्छा में वोट मांगने आए तो जनता उससे यह दस सवाल पूछे—
एक: चुनाव के बाद अतिक्रमण की नीति क्या होगी?
दो: कितने निर्माण चिन्हित हैं?
तीन: रेलवे भूमि का सीमांकन कब सार्वजनिक होगा?
चार: सड़क चौड़ीकरण में कितने लोग प्रभावित होंगे?
पांच: प्रभावित दुकानदारों के लिए पुनर्वास क्या है?
छह: दशकों से बसे परिवारों के मालिकाना हक पर नीति क्या है?
सात: पार्क और नहर की जमीन पर कार्रवाई का आधार क्या है?
आठ: क्या बड़े और छोटे निर्माण पर समान कार्रवाई होगी?
नौ: क्या हर प्रभावित परिवार को व्यक्तिगत सुनवाई मिलेगी?
दस: क्या सरकार चुनाव के बाद की संभावित कार्रवाई का पूरा रोडमैप जनता के सामने रखेगी?
अगर भाजपा इन सवालों के जवाब देती है तो जनता के सामने स्थिति स्पष्ट होगी।
अगर जवाब टाल दिया जाता है तो जनता के पास अपना निष्कर्ष निकालने का अधिकार है।
यह किसी पार्टी के पक्ष में वोट की अपील नहीं
हम यह नहीं कह रहे कि भाजपा को वोट मत दीजिए।
हम यह भी नहीं कह रहे कि कांग्रेस को वोट दीजिए।
हम यह भी नहीं कह रहे कि किसी तीसरे दल को वोट दीजिए।
वोट आपका है। फैसला आपका है।
मगर वोट देने से पहले अपने प्रत्याशी से सवाल जरूर पूछिए।
क्योंकि चुनाव के दिन नेता आपके दरवाजे पर आएगा।
लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद अगर प्रशासन का नोटिस आया तो सवाल आपके दरवाजे पर होगा।
किच्छा का फैसला अब जनता के हाथ में है
किच्छा को ऐसा शहर बनना चाहिए जहां विकास हो।
लेकिन ऐसा विकास जिसमें नागरिक भी सुरक्षित हों।
जहां सड़क चौड़ी हो मगर परिवारों की जिंदगी भी व्यवस्थित हो।
जहां सरकारी भूमि सुरक्षित हो मगर दशकों से बसे पात्र परिवारों को न्याय मिले।
जहां अतिक्रमण हटे मगर कार्रवाई समान हो।
जहां पार्क मुक्त हों मगर गरीब परिवारों के लिए विकल्प हों।
जहां रेलवे का विकास हो मगर प्रभावित लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था हो।
यही स्मार्ट किच्छा है।
सिर्फ बुलडोजर चला देना स्मार्ट सिटी बनाना नहीं है।
स्मार्ट सिटी वह है जहां प्रशासन स्मार्ट हो, नीति पारदर्शी हो और नागरिक सुरक्षित हों।
अंतिम सवाल
किच्छा के मतदाता आज सिर्फ नगर पालिका अध्यक्ष या सभासद चुनने जा रहे हैं।
वे आने वाले वर्षों की दिशा भी तय कर रहे हैं।
इसलिए मतदान से पहले एक सवाल जरूर पूछिए—
“अगर कल बुलडोजर मेरे दरवाजे पर आया तो मेरी सरकार, मेरा विधायक, मेरा नगर पालिका प्रतिनिधि और मेरा प्रशासन मेरे साथ क्या करेगा?”
यही सवाल 2027 तक किच्छा की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बन सकता है।
क्योंकि सड़कें बनेंगी।
शहर बढ़ेगा।
रेलवे बदलेगा।
बाजार बदलेगा।
कॉलोनियां बढ़ेंगी।
मगर इस विकास के बीच यह तय होना बाकी है कि—
किच्छा में विकास का बुलडोजर चलेगा या जनता की भागीदारी से विकास का रास्ता बनेगा?
और याद रखिए—
सरकारी जमीन बचाना सरकार की जिम्मेदारी है।
नागरिकों के अधिकार बचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
कानून लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है।
कानून सब पर समान लागू करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
किच्छा की जनता को डर से वोट देने की जरूरत नहीं।
जागरूक होकर वोट देने की जरूरत है।
अपने कागज देखिए।
अपने उम्मीदवार देखिए।
उनकी नीति देखिए।
उनके पिछले काम देखिए।
और फिर फैसला कीजिए—
किच्छा को कैसा भविष्य चाहिए?
बुलडोजर का डर या अधिकारों के साथ विकास?
फैसला आपका है।
किच्छा में बुलडोजर बनाम वोटनगर पालिका चुनाव के बाद क्या बदलेगा शहर का नक्शा? 2027 से पहले भाजपा से जनता के दस सवालसंपादकीय | अवतार सिंह बिष्टहिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
