यह अध्ययन वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने किया। जिसे हाल में ‘प्रोग्रेस इन फिजिकल जियोग्राफी: अर्थ एंड एनवायरमेंट’ में अंतिम प्रकाशन से पूर्व स्वतंत्र समीक्षा के लिए सार्वजनिक किया गया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
अध्ययन के अनुसार देहरादून घाटी में एमबीटी टौंस और सौंग नदी घाटियों के बीच करीब 35 किलोमीटर तक फैला है। इसके साथ बनी भू-आकृतियां एमबीटी और उसकी सहायक फॉल्ट लाइन के सक्रिय प्रभाव का संकेत देती हैं।
चट्टानों में दबाव के निशान
एमबीटी के तत्काल नीचे स्थित ऊपरी शिवालिक चट्टानों के समूह में मौजूद कांग्लोमरेट (गोल कंकड़ों से टूटकर बनी चट्टान) अत्यधिक विकृत और शीयर (टूटफूट) वाली पाई गई हैं। इन चट्टानों का झुकाव अधिक तीव्र और लगभग खड़ी स्थिति तक है।
एमबीटी के ऊपर की ओर तीन समानांतर भ्रंश-चिह्न (फॉल्ट मार्क) भी मिले। जो करीब 1.5 किलोमीटर तक फैले हैं। इनकी पहचान रैखिक रूप से व्यवस्थित पुराने धंसे जल-अवसादों और अत्यधिक विकृत चट्टानों के रूप में की गई।
नदियों में भी दर्ज किया भूगर्भीय बदलाव
शोधकर्ताओं ने एमबीटी के साथ-साथ संतौरगढ़ थ्रस्ट, संतौरगढ़ एंटीक्लाइन और नागसिद्ध एंटीक्लाइन से नियंत्रित जलनिकासी का अध्ययन किया। यहां पुराने नदी मार्ग (पैलियोचैनल), गहराई तक कटे वर्तमान चैनल और रेडियल ड्रेनेज (चारों ओर फैलने वाली नदी) मिले। इसके साथ ही कुछ विंड गैप (जल मार्ग का बचा भाग) 1.5 किलोमीटर से भी अधिक चौड़े हैं।
विज्ञानियों के अनुसार इन भू-आकृतियों और जलनिकासी का पैटर्न बताता है कि नदी तंत्र ने क्षेत्र में चल रही भूगर्भीय गतिविधि के अनुरूप स्वयं को बदला और समायोजित किया। यानी नदी घाटियों का मौजूदा स्वरूप केवल जलवायु और कटाव का परिणाम नहीं है, बल्कि भूगर्भीय हलचल ने भी इनके विकास की दिशा तय की।
भूस्खलन की दर बढ़ा सकती है हलचल
विज्ञानियों ने ऐतिहासिक फॉल्ट लाइन की हालिया सक्रियता को भूआकृति में ढालों के उत्थान, तीव्र कटाव और ऊंची ढालों की अस्थिरता बढ़ाने के कारणों के रूप में भी देखा है। बीते कुछ वर्षों से जिस तरह टौंस और सौंग घाटी क्षेत्रों में भूस्खलन की दर बढ़ी है, उसे हालिया अध्ययन पुष्ट करता प्रतीत होता है।
