शुद्धिकरण विवाद पर कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन, रैली की भीड़ पर उठे सवालशुद्धिकरण विवाद पर कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन, रैली की भीड़ पर उठे सवालतराई से जुटी भीड़ के सहारे देहरादून में प्रदर्शन, पहाड़ में मुद्दे के असर पर संशय

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देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर कांग्रेस ने सोमवार को देहरादून में शक्ति प्रदर्शन किया। परेड ग्राउंड से मुख्यमंत्री आवास की ओर निकले कांग्रेस के मार्च में प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने वाले मार्गों पर बैरिकेडिंग कर भारी पुलिस बल तैनात किया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


कांग्रेस इस पूरे मामले को दलित सम्मान से जोड़ते हुए भाजपा पर हमलावर है। पार्टी का आरोप है कि खरगे की सभा के बाद सार्वजनिक स्थल पर कथित तौर पर ‘शुद्धिकरण’ किया गया। कांग्रेस ने इसे सामाजिक अपमान बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। इसी मुद्दे पर पार्टी के एससी-एसटी सांसदों की सोमवार को दिल्ली स्थित इंदिरा भवन में बैठक भी बुलाई गई है, जिसमें आगे की राजनीतिक और कानूनी रणनीति पर चर्चा प्रस्तावित है।
हालांकि देहरादून में हुए कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक हलकों में कई सवाल भी उठ रहे हैं। प्रदर्शन में ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों से कार्यकर्ताओं की बड़ी मौजूदगी दिखाई दी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस का यह प्रदर्शन वास्तव में पूरे उत्तराखंड का आक्रोश था या मुख्य रूप से तराई-कुमाऊं क्षेत्र से जुटाई गई भीड़ के सहारे शक्ति प्रदर्शन किया गया।
रैली में पहाड़ की भागीदारी पर सवाल
कांग्रेस के इस आंदोलन में कई बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी चर्चा में रही, लेकिन पहाड़ी जिलों से अपेक्षित भागीदारी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ की जनता के लिए रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और आपदा जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में ‘शुद्धिकरण’ विवाद को केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाने की कांग्रेस की रणनीति का पहाड़ी क्षेत्रों में कितना असर पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी।
कांग्रेस इस मुद्दे को सामाजिक सम्मान और दलित अधिकारों से जोड़कर प्रदेशव्यापी आंदोलन का रूप देने की कोशिश कर रही है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि ऐसे मामलों पर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर जवाब दिया जाना जरूरी है।
एससी-एसटी सांसदों की बैठक में बनेगा रोडमैप
कांग्रेस ने इस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। सोमवार दोपहर दिल्ली के इंदिरा भवन में पार्टी के एससी-एसटी सांसदों की बैठक प्रस्तावित है। कांग्रेस सांसद मल्लू रवि के मुताबिक करीब 25 से 30 सांसद बैठक में शामिल हो सकते हैं। कुमारी शैलजा, सुखदेव भगत और चरणजीत सिंह चन्नी के बैठक में शामिल नहीं होने की जानकारी सामने आई है।
बैठक में हल्द्वानी प्रकरण पर आगे की रणनीति तैयार किए जाने की बात कही गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मामला केवल खरगे तक सीमित नहीं है, इसे दलित समाज के सम्मान से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
अजय राय ने भी उठाया कार्रवाई का मुद्दा
उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कथित शुद्धिकरण की घटना को पूरे दलित समाज के अपमान से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है और मामले को मजबूती से उठाया जाएगा।
दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस विवाद को उत्तराखंड के व्यापक जनसरोकारों से जोड़ने की है। केवल राजनीतिक आरोपों और प्रदर्शन के सहारे चुनावी माहौल तैयार करना आसान नहीं होगा।
विकास के मुद्दों से कितना दूर जाएगी कांग्रेस की राजनीति?
उत्तराखंड में चुनावी माहौल बनने के साथ राजनीतिक दलों के बीच मुद्दों की लड़ाई तेज हो रही है। कांग्रेस के लिए सवाल यह है कि क्या वह शुद्धिकरण विवाद को लंबे समय तक राजनीतिक मुद्दा बनाए रख पाएगी या फिर जनता के मूल सवाल एक बार फिर केंद्र में आ जाएंगे।
प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़क, आपदा और किसानों की समस्याएं लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। तराई क्षेत्रों में भी जलभराव, कृषि भूमि, उद्योग और शहरी विकास जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।
ऐसे में देहरादून का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन जरूर रहा, लेकिन इसे पूरे उत्तराखंड की जनभावना का पैमाना मानना अभी जल्दबाजी होगी। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में इस मुद्दे की स्वीकार्यता और प्रभाव आने वाले दिनों में ही स्पष्ट होगा।
अब सवाल यह है कि कांग्रेस की यह रणनीति 2027 के चुनावी मैदान में कितनी कारगर साबित होती है। शुद्धिकरण विवाद से पैदा हुआ राजनीतिक तापमान बढ़ता है या प्रदेश की जनता विकास और रोजगार जैसे सवालों को ही प्राथमिकता देती है, इसका फैसला आने वाला राजनीतिक समय करेगा।
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