सीमांत में 5 फीट बर्फ से आफत, बदरीनाथ में सांस्कृतिक कार्यक्रम पर विवाद; सतपाल महाराज के बयान पर तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने उठाए सवाल

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पिथौरागढ़/बदरीनाथ। उत्तराखंड में मौसम ने एक बार फिर पहाड़ से लेकर सीमांत क्षेत्रों तक मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बेमौसम भारी बर्फबारी ने जनजीवन, ग्रामीणों की आवाजाही, पशुपालन तथा नकदी फसलों को प्रभावित किया है। दूसरी ओर बदरीनाथ धाम परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत-नृत्य तथा शंखनाद को लेकर चल रहा विवाद अब मंत्री सतपाल महाराज के बयान के बाद नए सिरे से चर्चा में आ गया है। एक तरफ सीमांत क्षेत्र में मौसम की मार है, दूसरी तरफ धार्मिक परंपराओं को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो गई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

सीमांत में धूप के बीच बर्फबारी बनी आफत

पिथौरागढ़ में मंगलवार को कई इलाकों में धूप खिली, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम का असर अब भी गंभीर बना हुआ है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग करीब तीन दिन बंद रहने के बाद खुल गया है। मार्ग खुलने के बाद आदि कैलास जाने वाले यात्री गुंजी के लिए रवाना हो गए हैं। मार्ग खुलने से यात्रा से जुड़े लोगों को राहत मिली है, हालांकि ऊंचाई वाले इलाकों में भारी बर्फबारी के कारण चुनौतियां बनी हुई हैं।

टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर घाट बैंड के पास सुबह मलबा आने से कुछ समय के लिए यातायात बाधित रहा। सड़क से मलबा हटाए जाने के बाद यातायात बहाल कर दिया गया। पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बारिश और भूस्खलन के कारण सड़क मार्गों पर अचानक व्यवधान का खतरा बना हुआ है।

उधर तवाघाट-लिपुलेख तथा तवाघाट-दारमा मार्ग खोल दिए गए हैं। इन मार्गों के खुलने से चीन सीमा से संपर्क भी बहाल हो गया है। हालांकि मुनस्यारी का मिलम मार्ग अभी बंद है। जिले में सीमा क्षेत्र के एक मार्ग समेत कुल 11 मोटर मार्गों के बंद होने की सूचना है। ऐसे में सीमांत गांवों के लोगों की आवाजाही प्रभावित है।

ज्योलिंगकोंग में पांच फीट तक बर्फ

आदि कैलास ज्योलिंगकोंग तथा नाबीढांग स्थित ओम पर्वत क्षेत्र में भारी बर्फबारी हुई है। ज्योलिंगकोंग में करीब पांच फीट तक बर्फ गिरने की बात सामने आई है। बर्फबारी के कारण ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थित आवास तथा अन्य संरचनाएं बर्फ से ढक गई हैं।

पशुओं के साथ ज्योलिंगकोंग पहुंचे ग्रामीणों ने वीडियो भेजकर बताया कि उनके जानवर बर्फ में फंस गए हैं। ग्रामीण अब कुटी की ओर लौट रहे हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक आगे के क्षेत्र में भारी बर्फ जम चुकी है। ऐसे में ग्रामीण अपने मवेशियों को लेकर सुरक्षित स्थानों तथा कुटी गांव की ओर लौटने की तैयारी कर रहे हैं।

कुटी के होमस्टे संचालक कुंवर सिंह कुटियाल के अनुसार कुटी गांव में करीब दो फीट तथा आदि कैलास क्षेत्र में चार से पांच फीट तक बर्फबारी हुई है। अचानक हुई इस बर्फबारी से स्थानीय ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। खास तौर पर पशुओं को सुरक्षित नीचे लाने की चुनौती सामने है।

नकदी फसलों को भी नुकसान

बेमौसम बर्फबारी का असर स्थानीय कृषि पर भी पड़ा है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आलू, मटर, गोभी तथा फापर जैसी नकदी फसलों को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है। जिन किसानों की फसलें खेतों में थीं, उनके सामने आर्थिक नुकसान की स्थिति पैदा हो गई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मौसम में अचानक आए बदलाव ने उनकी तैयार फसलों को प्रभावित किया है। प्रशासन के सामने अब प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लेकर नुकसान का आकलन करने तथा ग्रामीणों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की चुनौती है।

जिले के निचले इलाकों तथा विभिन्न तहसीलों में भी वर्षा दर्ज की गई है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी तथा निचले क्षेत्रों में बारिश के कारण तापमान में बदलाव महसूस किया जा रहा है।


बदरीनाथ में सांस्कृतिक कार्यक्रम पर विवाद, सतपाल महाराज ने तोड़ी चुप्पी

इधर बदरीनाथ धाम परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर चल रहे विवाद के बीच धर्मस्व एवं उत्तराखंड पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने अपना पक्ष सामने रखा है। मीडिया को जारी बयान में महाराज ने कहा कि कुछ असामाजिक तत्व यह अफवाह फैला रहे हैं कि श्री बदरीनाथ धाम में संगीत, नृत्य अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रतिबंधित हैं। उन्होंने इस दावे को गलत तथा तथ्यहीन बताया।

महाराज के मुताबिक बदरीनाथ धाम में संगीत के माध्यम से भगवान की स्तुति की परंपरा रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कपाट खुलने के पावन अवसर पर सेना का बैंड भी धार्मिक धुनों तथा मंगल संगीत की प्रस्तुति करता है। उनका कहना है कि पूर्व में भी बदरीनाथ धाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे हैं।

मंत्री के बयान के बाद अब विवाद का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने सतपाल महाराज के बयान पर सवाल उठाते हुए उन्हें शास्त्रों का अध्ययन करने की सलाह दी है। इससे धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर बहस और तेज हो गई है।

शंखनाद पर भी मंत्री ने दिया स्पष्टीकरण

सतपाल महाराज ने बदरीनाथ मंदिर में शंख बजाने को लेकर भी अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मंदिर के भीतर शंख नहीं बजाया जाता। इसके पीछे मान्यता का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि शंख को जानवर की हड्डी से बना माना जाता है और मंदिर के भीतर अस्थि से बनी वस्तु वर्जित मानी जाती है।

महाराज के अनुसार इसी मान्यता के कारण बदरीनाथ मंदिर के अंदर शंखनाद नहीं किया जाता। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर के बाहर शंख बजाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

इस बयान पर भी तीर्थ पुरोहित महापंचायत की ओर से आपत्ति जताई गई है। महापंचायत का कहना है कि धार्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों पर शास्त्रीय आधार को समझना आवश्यक है। यही वजह है कि अब विवाद केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शंखनाद की परंपरा को लेकर भी बहस शुरू हो गई है।

दो अलग मुद्दे, एक ही सवाल—परंपरा की व्याख्या कौन तय करेगा?

उत्तराखंड के सामने इस समय दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाई दे रही हैं। पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र में प्रकृति ने ग्रामीणों, यात्रियों तथा प्रशासन के सामने चुनौती खड़ी की है। भारी बर्फबारी के बीच ग्रामीण अपने पशुओं को लेकर सुरक्षित स्थानों की ओर लौटने को मजबूर हैं, मोटर मार्ग बंद हैं तथा किसानों की नकदी फसलें प्रभावित हुई हैं।

दूसरी ओर बदरीनाथ धाम में धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर सार्वजनिक बहस जारी है। मंत्री सतपाल महाराज ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर लगाए जा रहे प्रतिबंध संबंधी दावों को खारिज किया है, वहीं तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने उनके धार्मिक तर्कों पर सवाल उठाए हैं।

अब सवाल यह है कि बदरीनाथ धाम की धार्मिक मर्यादाओं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तथा मंदिर की परंपराओं को लेकर अंतिम और प्रमाणिक स्थिति क्या है? क्या इस संबंध में मंदिर समिति, धर्माचार्यों, तीर्थ पुरोहितों तथा शासन की ओर से एक स्पष्ट और प्रमाणिक जानकारी सार्वजनिक की जाएगी?

फिलहाल सीमांत में मौसम की चुनौती कायम है, जबकि बदरीनाथ में परंपरा को लेकर उठे सवालों ने धार्मिक जगत में नई बहस को जन्म दे दिया है।


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