उत्तराखंड/भाजपा ने उत्तराखंड से राज्यसभा सीट के लिए दिनेश आर्य को उम्मीदवार बनाकर एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में सबको चौंका दिया है। प्रदेश संगठन की ओर से जिन नामों का पैनल केंद्रीय नेतृत्व को भेजा गया था, उसमें पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, राज्यसभा हेतु कई वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं के नाम चर्चा में थे। इसके बावजूद पार्टी ने अपेक्षाकृत सेकेंड लाइन से आने वाले नेता दिनेश आर्य पर भरोसा जताया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
इस फैसले को भाजपा की नई राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है। दलित समाज से आने वाले, लंबे समय से संगठन में सक्रिय और नैनीताल क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन बनाने वाले दिनेश आर्य को राष्ट्रीय राजनीति में अवसर देना सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू इससे कहीं अधिक गंभीर है।
सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति में अब किसी नेता की योग्यता, संगठन के प्रति उसकी वर्षों की निष्ठा, जनाधार और राजनीतिक संघर्ष से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी जातीय पहचान और चुनावी उपयोगिता हो गई है?
यह सवाल केवल भाजपा से नहीं, बल्कि देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी से पूछा जाना चाहिए।
दिनेश आर्य का राजनीतिक सफर संघर्षपूर्ण रहा है। वह अनुसूचित जाति समाज से आते हैं और लंबे समय से भाजपा संगठन में सक्रिय रहे हैं। 2013 से दिसंबर 2016 तक नैनीताल जिला अध्यक्ष रहे। बाद में भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी मिली। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में नैनीताल सीट से उनकी दावेदारी मजबूत मानी जाती रही, लेकिन दोनों अवसरों पर टिकट किसी दूसरे चेहरे को मिला।
यहीं से राजनीतिक व्यवस्था का वह चेहरा सामने आता है, जिस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
एक कार्यकर्ता वर्षों तक संगठन के लिए काम करता है। बूथ से लेकर जिला संगठन तक जिम्मेदारियां निभाता है। चुनावों में पार्टी के लिए जमीन तैयार करता है। टिकट की बारी आती है तो किसी दूसरे नेता को प्राथमिकता मिल जाती है। फिर वही कार्यकर्ता अगले चुनाव में पार्टी के साथ खड़ा रहता है। उसके बाद भी जब कोई बड़ा अवसर आता है तो निर्णय उसकी व्यक्तिगत योग्यता से अधिक सामाजिक समीकरणों के आधार पर होता दिखाई देता है।
क्या यही भारतीय राजनीति की नई सामान्य व्यवस्था बन चुकी है?
दिनेश आर्य के मामले में यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा ने एक ऐसे नेता को सम्मान दिया है, जिसने टिकट न मिलने के बावजूद संगठन का साथ नहीं छोड़ा। यह संदेश निश्चित रूप से उन हजारों कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं और किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
लेकिन दूसरी तरफ उन वरिष्ठ नेताओं का क्या, जिनका राजनीतिक अनुभव दशकों का है और जिनके नाम राज्यसभा के लिए चर्चा में थे?
क्या उन्हें केवल इसलिए नजरअंदाज किया गया क्योंकि पार्टी को इस समय किसी विशेष सामाजिक समीकरण को साधना अधिक जरूरी लगा?
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक दलों की कथित ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और योग्यता आधारित राजनीति के बीच अंतर दिखाई देता है।
जातीय प्रतिनिधित्व लोकतंत्र की आवश्यकता हो सकता है। वंचित और पिछड़े वर्गों को सत्ता के शीर्ष संस्थानों में प्रतिनिधित्व मिलना भी जरूरी है। लेकिन यदि हर राजनीतिक नियुक्ति और टिकट का आधार जातीय गणित ही बन जाए तो फिर राजनीतिक योग्यता का मूल्यांकन किस आधार पर होगा?
उत्तराखंड की राजनीति में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है।
पृथक राज्य बनने के बाद राज्यसभा में उत्तराखंड कोटे की सीटों पर क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन लगातार चर्चा का विषय रहा है। कुमाऊं और गढ़वाल के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय नेताओं बनाम बाहरी चेहरों की बहस और जातीय समीकरणों ने राज्यसभा से लेकर विधानसभा टिकट तक राजनीति को प्रभावित किया है।
अब दिनेश आर्य का नाम इस बहस को एक नया आयाम देता है।
भाजपा के लिए यह निर्णय कई संदेश देता है—दलित समाज को प्रतिनिधित्व, कुमाऊं को राजनीतिक महत्व, संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का संकेत और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ उनकी राजनीतिक निकटता को भी इस चयन के संदर्भ में देखा जा रहा है। सरकार में राज्य स्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने के बाद अब राज्यसभा की दावेदारी तक पहुंचना उनके राजनीतिक कद में निश्चित रूप से बड़ा विस्तार है।
लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हार गया।
सवाल यह होना चाहिए कि राजनीतिक दलों के भीतर अवसरों का वितरण किस आधार पर होता है?
क्या वर्षों की मेहनत के बाद भी कार्यकर्ता को केवल चुनावी समय पर जातीय समीकरण के हिसाब से याद किया जाएगा?
क्या किसी नेता की राजनीतिक क्षमता का मूल्यांकन उसके संघर्ष, जनसंपर्क, संगठनात्मक योगदान और वैचारिक प्रतिबद्धता से होगा या उसकी जाति और चुनावी उपयोगिता से?
और यदि जातीय प्रतिनिधित्व जरूरी है तो क्या राजनीतिक दलों के भीतर सभी वर्गों के प्रतिभाशाली नेताओं के लिए स्पष्ट और पारदर्शी अवसर की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
दिनेश आर्य का राज्यसभा जाना इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह एक ऐसे कार्यकर्ता के राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचने की कहानी है, जिसने लंबे समय तक संगठन में काम किया और टिकट की दौड़ में पीछे रहने के बाद भी पार्टी नहीं छोड़ी।
इसे भाजपा का कार्यकर्ताओं को सम्मान देने वाला फैसला भी कहा जा सकता है।
लेकिन इसी फैसले के साथ एक असहज सवाल भी खड़ा होता है—यदि राजनीतिक दल वास्तव में योग्यता और संगठनात्मक योगदान को प्राथमिकता देते हैं तो फिर टिकट और पदों के लिए बार-बार जातीय, क्षेत्रीय और चुनावी समीकरण क्यों खोजे जाते हैं?
यह सवाल केवल भाजपा के लिए नहीं है। कांग्रेस सहित प्रत्येक राजनीतिक दल को इसका जवाब देना चाहिए।
राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व आवश्यक है, लेकिन प्रतिनिधित्व का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि योग्यता गौण हो जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती तभी बची रहेगी जब जातीय पहचान दरवाजा खोलने का एक कारण हो सकती है, लेकिन उस दरवाजे के भीतर प्रवेश का अंतिम आधार योग्यता, संघर्ष, ईमानदारी, संगठनात्मक योगदान और जनता का विश्वास हो।
दिनेश आर्य को राज्यसभा के लिए अवसर मिला है। उन्हें इस नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं।
मगर उन तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं के सवाल भी अपनी जगह कायम हैं, जो वर्षों से पार्टी के लिए काम करते रहे और अवसर की प्रतीक्षा करते रहे।
क्योंकि लोकतंत्र में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि किसे पद मिला; यह भी देखना जरूरी है कि किसे और क्यों नहीं मिला।
— अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी।
