रुद्रपुर। भारतीय जनता पार्टी वर्षों से हिंदुत्व, हिंदू गौरव, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और धार्मिक आस्था को अपनी राजनीति के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत करती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पारित हुआ और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर राजनीतिक अभियान चलाया गया। इन मुद्दों को भाजपा अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियां बताती है। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन उपलब्धियों से आम हिंदू परिवार की आर्थिक स्थिति, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में भी उसी अनुपात में सुधार हुआ है?
अगर हिंदू हितों की राजनीति का दावा करने वाली पार्टी के शासन में आम परिवार बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, महंगी शिक्षा, कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं और कारोबार की अनिश्चितता से जूझ रहा है, तो इन सवालों का जवाब कौन देगा? क्या धार्मिक पहचान की राजनीतिक विजय को आम नागरिक की आर्थिक विजय मान लिया जाना चाहिए?
यह लेख भाजपा की नीतियों और उनके परिणामों पर सवाल उठाता है। किसी राजनीतिक दल के समर्थक होना या उसकी आलोचना करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन सरकार से जवाब मांगना हर नागरिक का लोकतांत्रिक कर्तव्य भी है।
राम मंदिर बना, लेकिन भाजपा की सीटें 303 से 240 क्यों रह गईं?
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय है। इसके लिए लंबे समय तक आंदोलन चला और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। भाजपा ने इसे अपने राजनीतिक नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।
इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 सीटें जीतने वाली भाजपा 2024 में 240 सीटों पर सिमट गई। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की सीटें 2019 की 62 से घटकर 2024 में 33 रह गईं। अयोध्या जिस फैजाबाद संसदीय क्षेत्र में आती है, वहां भी भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा।
क्या इन परिणामों से यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि हिंदू मतदाताओं ने राम मंदिर को नकार दिया? ऐसा कहना सही नहीं होगा, क्योंकि चुनाव में रोजगार, स्थानीय प्रत्याशी, जातीय समीकरण, किसानों की समस्याएं, संविधान, आरक्षण और अन्य मुद्दे भी प्रभाव डालते हैं। मगर यह जरूर स्पष्ट हुआ कि राम मंदिर जैसा बड़ा धार्मिक मुद्दा भी भाजपा के लिए हर जगह चुनावी जीत की गारंटी नहीं बन सका।
सवाल यही है कि क्या मतदाता अब केवल धार्मिक प्रतीकों से संतुष्ट नहीं है? क्या वह मंदिर के साथ नौकरी, अच्छी शिक्षा, इलाज, सुरक्षित कारोबार और भ्रष्टाचार से मुक्ति भी चाहता है?
आस्था का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन आस्था के नाम पर सरकार की जवाबदेही से समझौता क्यों किया जाए?
अनुच्छेद 370, सीएए और यूसीसी से आम हिंदू को क्या मिला?
मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया। भाजपा इसे राष्ट्रीय एकता और समान अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताती है। सीएए के माध्यम से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए कुछ निर्दिष्ट धार्मिक समुदायों के पात्र लोगों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करने का रास्ता खोला गया। वहीं यूसीसी को समान नागरिक कानून और लैंगिक समानता से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।
इन नीतियों के पक्ष में अपने तर्क हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि इनका आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा? क्या इससे बेरोजगार युवक को नौकरी मिली, किसान की आय बढ़ी, दुकानदार का कारोबार सुरक्षित हुआ या सरकारी अस्पतालों की स्थिति में अपेक्षित सुधार हुआ?
उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद भी उसके वास्तविक सामाजिक परिणामों का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। किसी कानून का लाभ केवल धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभाव, समानता और नागरिक अधिकारों के आधार पर आंका जाना चाहिए।
भाजपा को यह बताना चाहिए कि उसके हिंदुत्ववादी राजनीतिक एजेंडे से आम हिंदू परिवार को मिलने वाला अतिरिक्त और प्रत्यक्ष लाभ क्या है। केवल किसी कानून का पारित होना अपने आप में हर नागरिक की आर्थिक समस्या का समाधान नहीं बन जाता।
धार्मिक नारों से रोजगार नहीं मिलता, बुलडोजर से कारोबार उजड़ सकता है
धार्मिक जुलूस, नारेबाजी, मंदिर निर्माण और सांस्कृतिक आयोजनों से किसी समुदाय को भावनात्मक संतुष्टि मिल सकती है। लेकिन क्या इनसे बेरोजगार युवा को नौकरी, छोटे व्यापारी को ग्राहक और गरीब परिवार को बेहतर इलाज मिलता है?
गोरक्षा, मांस कारोबार पर प्रतिबंध, बुलडोजर कार्रवाई, मुठभेड़ों और नेताओं के विवादित बयानों को लेकर भी सरकारों की नीतियों पर सवाल उठते रहे हैं। कानून का पालन और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन कार्रवाई निष्पक्ष, प्रमाण-आधारित और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए। किसी समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराना या बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के किसी का कारोबार उजाड़ना न्याय का विकल्प नहीं हो सकता।
रुद्रपुर में लगभग 300 और किच्छा में लगभग 200 दुकानों पर बुलडोजर कार्रवाई किए जाने के दावे स्थानीय स्तर पर गंभीर चिंता पैदा करते हैं। इन संख्याओं, दुकानों की स्थिति, कार्रवाई के आदेशों और प्रभावित कारोबारियों की धार्मिक पहचान की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। यदि बड़ी संख्या में स्थानीय दुकानदार प्रभावित हुए हैं, तो प्रशासन को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि कार्रवाई किस कानूनी आधार पर हुई, कितने लोगों को नोटिस मिला, कितनों को सुनवाई का अवसर दिया गया और पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था के लिए क्या कदम उठाए गए।
यदि किसी कार्रवाई में नियमों की अनदेखी हुई है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि कार्रवाई कानून के अनुसार हुई है, तो प्रशासन को उसका पूरा आधार जनता के सामने रखना चाहिए।
आखिर गरीब और छोटे दुकानदार का अपराध क्या है कि वह अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए दर-दर भटके? क्या कानून का राज केवल कमजोर लोगों के लिए है, या सरकार और प्रशासन भी उसी कानून के प्रति जवाबदेह हैं?
किच्छा के चुनावी नतीजे भाजपा के लिए चेतावनी हैं
स्थानीय निकाय चुनावों में किसी पार्टी की हार या जीत के पीछे अनेक कारण होते हैं। इसलिए किच्छा के परिणामों को केवल बुलडोजर कार्रवाई का नतीजा बताना उचित नहीं होगा। फिर भी यदि दुकानदारों, व्यापारियों और स्थानीय परिवारों में नाराजगी है, तो भाजपा को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने वाली पार्टी को यह भी समझना होगा कि हिंदू समाज एकरूप राजनीतिक इकाई नहीं है। इसमें पहाड़ी, बंगाली, पंजाबी, व्यापारी, किसान, मजदूर, अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग, कर्मचारी और बेरोजगार युवा शामिल हैं। उनकी आर्थिक परिस्थितियां और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ी और बंगाली समाज के परिवारों की आजीविका, जमीन, दुकानों, रोजगार और पुनर्वास जैसे मुद्दे धार्मिक नारों से छोटे नहीं हो जाते।
यदि किसी वर्ग को लगता है कि चुनाव के समय उससे हिंदू एकता के नाम पर वोट मांगा गया, लेकिन संकट के समय उसके रोजगार और कारोबार की रक्षा नहीं हुई, तो उसकी नाराजगी को विपक्षी साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विकास और कानून-व्यवस्था की उसकी नीति में छोटे व्यापारियों तथा गरीब परिवारों के हितों की रक्षा के लिए क्या ठोस व्यवस्था है।
क्या हिंदू मतदाताओं में असंतोष बढ़ रहा है?
भाजपा के सभी हिंदू समर्थक निराश हैं, ऐसा दावा करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। आज भी बड़ी संख्या में मतदाता भाजपा का समर्थन करते हैं और उसकी नीतियों को राष्ट्रीय सुरक्षा, धार्मिक आस्था, नेतृत्व तथा कल्याणकारी योजनाओं के कारण उचित मानते हैं।
लेकिन यह भी सच है कि किसी पार्टी के परंपरागत समर्थक हमेशा के लिए उसके साथ बंधे नहीं रहते। जब महंगाई बढ़ती है, रोजगार के अवसर सीमित होते हैं, कारोबार पर संकट आता है या स्थानीय जनप्रतिनिधि समस्याओं का समाधान नहीं करते, तो मतदाता अपनी राजनीतिक पसंद पर पुनर्विचार कर सकता है।
हिंदू हितों की बात करने वाली भाजपा से सवाल पूछना हिंदू विरोध नहीं है। बल्कि अपने समाज के आर्थिक और सामाजिक हितों के लिए सरकार से जवाब मांगना लोकतंत्र का हिस्सा है।
क्या किसी बेरोजगार हिंदू युवा को केवल इसलिए संतुष्ट हो जाना चाहिए कि देश में मंदिर बन गया? क्या किसी छोटे दुकानदार को अपनी दुकान उजड़ने पर इसलिए चुप रहना चाहिए कि सरकार हिंदुत्व की बात करती है? क्या किसी गरीब परिवार के लिए महंगा इलाज और बच्चों की फीस धार्मिक नारों से चुकाई जा सकती है?
इन सवालों का जवाब किसी धर्म विशेष के खिलाफ अभियान चलाकर नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों के वास्तविक परिणामों के आधार पर देना होगा।
आठ करोड़ युवाओं का सवाल और बेरोजगारी की चुनौती
देश में ऐसे युवाओं की संख्या को लेकर चिंता जताई जाती रही है, जो शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं। हालांकि आठ करोड़ से अधिक युवाओं के बेरोजगार होने या नौकरी की उम्मीद छोड़ देने के दावे को उसकी मूल रिपोर्ट, आयु-सीमा और परिभाषा के साथ देखना जरूरी है। काम न करने वाले सभी युवा बेरोजगार नहीं होते और अलग-अलग सर्वेक्षणों के आंकड़ों की सीधे तुलना भी नहीं की जा सकती।
एनएसएसओ के 2017-18 के आंकड़ों में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत बताई गई थी, जो उस समय उपलब्ध आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की परिभाषा के अनुसार 45 वर्षों के उच्च स्तर के रूप में चर्चा में आई। बाद के पीएलएफएस सर्वेक्षणों में बेरोजगारी दर में गिरावट के संकेत मिले हैं। लेकिन कुल बेरोजगारी दर कम होने का अर्थ यह नहीं है कि शिक्षित युवाओं, महिलाओं और नई नौकरी तलाशने वालों की समस्याएं समाप्त हो गई हैं।
सरकार को नियमित, सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार के अवसरों के आंकड़े सामने रखने चाहिए। कितने युवाओं को स्थायी नौकरी मिली, कितनों को संविदा पर रखा गया, कितने पद खाली हैं और कितने भर्ती परिणाम वर्षों से लंबित हैं—इन सवालों का जवाब जरूरी है।
आखिर युवाओं को केवल विश्वगुरु बनने के सपने नहीं, अपने भविष्य की निश्चितता भी चाहिए।
महंगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर जवाबदेही क्यों नहीं?
देश की जीडीपी बढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन अर्थव्यवस्था के आकार और आम नागरिक की आर्थिक स्थिति में अंतर हो सकता है। यदि परिवार की आय की तुलना में शिक्षा, इलाज, मकान, खाद्य पदार्थ और परिवहन का खर्च तेजी से बढ़ता है, तो आर्थिक विकास का लाभ हर परिवार तक समान रूप से नहीं पहुंचता।
सरकारी स्कूलों में फर्नीचर की कमी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव, सरकारी कार्यालयों में रिश्वतखोरी की शिकायतें, ठेकों में कमीशन के आरोप, खराब सड़कें और पुलों की गुणवत्ता से जुड़े सवाल जनता की वास्तविक समस्याएं हैं।
नोटबंदी, जीएसटी के क्रियान्वयन, कोविड लॉकडाउन और महामारी के दौरान हुई परेशानियों का असर छोटे कारोबारियों, प्रवासी मजदूरों और गरीब परिवारों पर किस हद तक पड़ा, इसका निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। इसी तरह एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से पुराने वाहनों को संभावित नुकसान, रुपये के विनिमय मूल्य में गिरावट और शेयर बाजार में निवेशकों के नुकसान जैसे मुद्दों पर भी प्रमाण-आधारित चर्चा जरूरी है। रुपये की कीमत गिरने से सभी नागरिकों को एक जैसा नुकसान नहीं होता और शेयर बाजार में नुकसान निवेश के प्रकार पर निर्भर करता है।
देश की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग—मानव विकास, भ्रष्टाचार की धारणा, लैंगिक समानता, पर्यावरण, शांति, लोकतंत्र और कानून के शासन—में भारत की स्थिति पर भी गंभीर बहस होनी चाहिए। इन सूचकांकों की पद्धति और संबंधित वर्ष को ध्यान में रखना जरूरी है। भारत ने नवाचार, डिजिटल सेवाओं, सैन्य क्षमता और कुछ विकास लक्ष्यों में प्रगति भी की है। इसलिए न तो हर उपलब्धि को नकारा जा सकता है, न हर कमजोरी को छिपाया जाना चाहिए।
सरकार का मूल्यांकन चुनिंदा उपलब्धियों से नहीं, पूरे कामकाज से होना चाहिए।
क्या कल्याणकारी योजनाओं का लाभ केवल हिंदुओं को मिलना चाहिए?
प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, पीएम किसान, हर घर जल, मुफ्त अनाज वितरण और सामाजिक पेंशन जैसी योजनाओं का उद्देश्य पात्र लाभार्थियों तक सहायता पहुंचाना है। इन योजनाओं का लाभ विभिन्न धार्मिक समुदायों के पात्र नागरिकों को मिल सकता है।
यदि कोई मुस्लिम परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पात्रता पूरी करके घर प्राप्त करता है, तो इसे हिंदुओं की हार या मुसलमानों की विशेष जीत बताना उचित नहीं है। उसी तरह किसी हिंदू परिवार को योजना का लाभ मिलने पर उसे किसी अन्य समुदाय के खिलाफ राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
असल सवाल यह है कि क्या पात्र हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य नागरिकों को बिना भेदभाव लाभ मिल रहा है? क्या लाभार्थियों की सूची पारदर्शी है? क्या गरीब परिवारों को पात्र होने के बावजूद योजनाओं से बाहर रखा जा रहा है? क्या सरकारी सहायता वास्तव में जरूरतमंद तक पहुंच रही है?
यदि सरकार किसी समुदाय के हिसाब से योजनाओं के लाभ का दावा करती है, तो उसे विश्वसनीय आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। समुदायवार आंकड़े उपलब्ध न होने पर किसी एक समुदाय को अधिक लाभ मिलने या दूसरे को नुकसान होने का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
गरीब हिंदू की मदद जरूरी है, लेकिन गरीब मुस्लिम का अधिकार छीनकर नहीं। असली कसौटी यह है कि गरीब को न्याय मिले और भ्रष्टाचार तथा पक्षपात पर रोक लगे।
गोदी मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका पर भी सवाल
राजनीतिक प्रचार के दौर में सोशल मीडिया, टेलीविजन बहसों और डिजिटल अभियानों का प्रभाव लगातार बढ़ा है। कई बार धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे इतनी प्रमुखता से प्रस्तुत किए जाते हैं कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन और भ्रष्टाचार के सवाल पीछे छूट जाते हैं।
लेकिन सभी मीडिया संस्थानों को एक ही श्रेणी में रखना भी सही नहीं होगा। पत्रकारिता का दायित्व है कि वह सरकार की उपलब्धियों के साथ उसकी विफलताओं की भी पड़ताल करे, आरोपों की पुष्टि करे और जनता को तथ्य उपलब्ध कराए।
मतदाता को भी यह समझना होगा कि किसी वीडियो, भाषण या वायरल संदेश का सच होना केवल उसके बार-बार प्रसारित होने से साबित नहीं होता। सरकारी दावों, विपक्ष के आरोपों और सोशल मीडिया पर प्रसारित आंकड़ों—सभी की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
यदि कोई प्रचार नागरिक को अपनी वास्तविक आर्थिक समस्याओं की अनदेखी करने के लिए प्रेरित करता है, तो उसे सवाल पूछने चाहिए। धर्म और राष्ट्र के प्रति सम्मान का अर्थ यह नहीं कि सरकार से जवाब मांगना बंद कर दिया जाए।
एसआईआर और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष की ओर से आरोप लगाए जाते रहे हैं कि प्रक्रिया के माध्यम से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा सकते हैं या राजनीतिक लाभ के लिए मतदाता सूची प्रभावित हो सकती है। भाजपा और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर लगाए गए ऐसे आरोपों को प्रमाण के आधार पर जांचना चाहिए। आरोप लगना अपने आप में हेराफेरी साबित नहीं करता।
मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी है, लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना लोकतांत्रिक अधिकारों का गंभीर प्रश्न है। चुनाव आयोग को नाम जोड़ने, हटाने, आपत्तियों के निस्तारण और अपील की प्रक्रिया पारदर्शी रखनी चाहिए।
उत्तराखंड के रुद्रपुर समेत विभिन्न स्थानों पर मतदाता सूची को लेकर उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि फर्जी आपत्तियां दर्ज हुई हैं या वास्तविक मतदाताओं को परेशान किया गया है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो।
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का रास्ता मतपत्र से खुलना चाहिए, लेकिन उस मतपत्र तक पहुंचने का अधिकार प्रत्येक पात्र मतदाता को सुरक्षित मिलना भी उतना ही जरूरी है।
क्या भाजपा को हिंदू विरोधी पार्टी कहा जाए?
भाजपा को हिंदुओं के हितों के खिलाफ काम करने वाली पार्टी घोषित करना एक तीखा राजनीतिक निष्कर्ष है, जिसे सिद्ध करने के लिए प्रत्येक नीति और घटना का तथ्यात्मक मूल्यांकन जरूरी है। भाजपा अपने पक्ष में राम मंदिर, अनुच्छेद 370, राष्ट्रीय सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं जैसी उपलब्धियां गिनाती है। दूसरी ओर उसके आलोचक बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं की स्वतंत्रता, छोटे कारोबारियों की परेशानियों और सरकारी जवाबदेही के सवाल उठाते हैं।
फिर भी एक बुनियादी प्रश्न से बचा नहीं जा सकता: यदि कोई पार्टी हिंदू हितों की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिनिधि होने का दावा करती है, तो उसे हिंदू समाज के गरीब, बेरोजगार, किसान, मजदूर, व्यापारी और मध्यमवर्गीय परिवारों के हितों पर ठोस परिणाम दिखाने होंगे।
हिंदू हितों की राजनीति का मतलब केवल धार्मिक प्रतीकों का प्रचार नहीं हो सकता। इसमें रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, सम्मानजनक जीवन, संपत्ति की सुरक्षा और भ्रष्टाचार से मुक्ति भी शामिल हैं।
यही कसौटी उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर भी लागू होती है। रुद्रपुर और किच्छा में दुकानों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर उठे सवालों का जवाब स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार को देना चाहिए। प्रभावित परिवारों की वास्तविक संख्या, कार्रवाई का कानूनी आधार और पुनर्वास की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि किसी का नुकसान नियमों के विपरीत हुआ है, तो उसे न्याय मिलना चाहिए।
निष्कर्ष: हिंदू मतदाता को भावनाओं के साथ अपने हितों का हिसाब भी मांगना होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक, भाजपा के नेतृत्व को यह समझना होगा कि धार्मिक आस्था का सम्मान और आर्थिक विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। लेकिन धर्म के नाम पर राजनीतिक समर्थन मांगने वाली सरकार को रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और नागरिक अधिकारों पर भी उतनी ही गंभीरता से जवाब देना होगा।
राम मंदिर का निर्माण हुआ, यह एक ऐतिहासिक घटना है। अनुच्छेद 370 हटाया गया, यह एक बड़ा संवैधानिक बदलाव है। सीएए और यूसीसी पर सरकार का अपना पक्ष है। लेकिन इन उपलब्धियों से आम नागरिक की सभी समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं।
अगर किसी हिंदू परिवार का बेटा नौकरी के लिए भटक रहा है, बेटी की पढ़ाई महंगी है, इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है और दुकान पर कार्रवाई से परिवार की आजीविका संकट में है, तो उसे अपनी समस्याओं पर सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
भाजपा को हिंदू विरोधी पार्टी कहने का राजनीतिक आरोप अपनी जगह है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा हिंदुओं के वास्तविक हितों की रक्षा कर रही है या हिंदू पहचान को चुनावी समर्थन जुटाने का माध्यम बना रही है?
इस सवाल का जवाब न केवल प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री धामी को देना चाहिए, बल्कि हर राजनीतिक दल को देना चाहिए जो धर्म, जाति, क्षेत्र या राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से समर्थन मांगता है।
आखिरकार लोकतंत्र में मतदाता किसी पार्टी का स्थायी बंधक नहीं होता। वह अपने अनुभव, अपने हित और सरकार के कामकाज के आधार पर निर्णय लेता है। हिंदू हो या मुस्लिम, पहाड़ी हो या बंगाली, किसान हो या व्यापारी—हर नागरिक को सम्मान, सुरक्षा, रोजगार और न्याय चाहिए।
मंदिर आस्था का केंद्र है, लेकिन सरकार की सफलता की असली परीक्षा जनता का जीवन है। यदि हिंदुत्व की राजनीति आम हिंदू की रोजी-रोटी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा नहीं कर पाती, तो भाजपा को अपने राजनीतिक दावों पर पुनर्विचार करना होगा। और यदि विपक्ष इन मुद्दों पर जनता का विश्वास जीतना चाहता है, तो उसे भी केवल आरोप नहीं, बल्कि ठोस विकल्प प्रस्तुत करने होंगे।
मोदी से धामी तक: हिंदू हितों का दावा, जमीन पर बुलडोजर और बेरोजगारी की मार! क्या भाजपा हिंदुओं के लिए नहीं, सिर्फ वोट के लिए करती है हिंदुत्व की राजनीति?राम मंदिर बना, अनुच्छेद 370 हटा, सीएए आया और यूसीसी की चर्चा तेज हुई, फिर भी आम हिंदू के रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और कारोबार के सवाल कायम। रुद्रपुर की 300 और किच्छा की 200 दुकानों पर बुलडोजर कार्रवाई के दावों ने उत्तराखंड में भाजपा की राजनीति पर खड़े किए गंभीर सवाल।अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
