मोदी-धामी की भाजपा पर सवाल: हिंदू हितों की ठेकेदार या मुस्लिम हितों की पैरोकार? हिंदुत्व के दावों और जमीनी हकीकत में कितना अंतर


राम मंदिर से लेकर बुलडोजर कार्रवाई तक—हिंदुओं के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा से सवाल: आम हिंदू को रोजगार, कारोबार और सुरक्षा कितनी मिली, और सरकारी योजनाओं का लाभ सभी समुदायों तक कैसे पहुंचा?
भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक हिंदुत्व, हिंदू गौरव और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाती रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन नारों के साथ आम हिंदू की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का भी समाधान हुआ?
यदि किसी सरकार की नीतियों से हिंदू दुकानदार, किसान, मजदूर और बेरोजगार युवा परेशान हैं, तो उसे जवाबदेही से बचने के लिए धार्मिक भावनाओं का सहारा नहीं लेना चाहिए। रुद्रपुर और किच्छा में दुकानों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर उठे सवालों का भी निष्पक्ष जवाब जरूरी है। कार्रवाई का आधार, प्रभावित परिवारों की संख्या और कानूनी प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मुस्लिम परिवारों सहित सभी पात्र नागरिकों को मिलना संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप है। लेकिन यदि किसी समुदाय को विशेष लाभ दिए जाने का दावा किया जाता है, तो उसे प्रमाणित आंकड़ों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
भाजपा पर हिंदू हितों की उपेक्षा और मुस्लिम हितों के प्रति अधिक उदार होने का राजनीतिक आरोप लगाया जा सकता है, लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए नीतियों, बजट, लाभार्थियों और उनके वास्तविक परिणामों की निष्पक्ष तुलना जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी आम हिंदू को रोजगार, अच्छी शिक्षा, सस्ता इलाज, सुरक्षित कारोबार और भ्रष्टाचार से मुक्ति देने में कितनी सफल रही? राम मंदिर और दूसरे बड़े राजनीतिक फैसलों के साथ इन बुनियादी सवालों का जवाब भी जनता को मिलना चाहिए।
लोकतंत्र में किसी पार्टी की पहचान उसके नारों से नहीं, उसके कामकाज और जनता पर पड़ने वाले प्रभाव से परखी जाती है।