उक्रांद में बड़े ‘विद्रोह’ के आसार: आशुतोष नेगी के निष्कासन से भड़का अंदरूनी अलाव, 99% कैडर फैसले के खिलाफ! टूट की कगार पर उत्तराखंड क्रांति दल! आशुतोष नेगी के समर्थन में उतरे पदाधिकारी, शीर्ष नेतृत्व अलग-थलग!उक्रांद में ‘अपनों’ की बगावत: अंदरूनी सर्वे और इस्तीफों ने बढ़ाई बेचैनी, क्या ढह जाएगा क्षेत्रीय विकल्प का किला?

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आशुतोष नेगी का निष्कासन: क्या जन सरोकारों की राजनीति को दरकिनार करना उक्रांद को भारी पड़ेगा?

उत्तराखंड की राजनीति में उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) का एक ऐतिहासिक महत्व रहा है, जो राज्य आंदोलन की कोख से उपजा एकमात्र क्षेत्रीय विकल्प है। लेकिन हाल ही में दल द्वारा अपने तेज-तर्रार नेता और पूर्व केंद्रीय उपाध्यक्ष आशुतोष नेगी को 6 साल के लिए निष्कासित करने का फैसला आत्मघाती कदम प्रतीत होता है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक जनता इस फैसले को लेकर आक्रोशित है और उक्रांद के शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

जन संघर्ष का चेहरा और अंकिता भंडारी केस की लड़ाई

आशुतोष नेगी मात्र एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी नहीं हैं, बल्कि वे उत्तराखंड के समकालीन जन संघर्षों की एक मजबूत आवाज हैं। विशेष रूप से अंकिता भंडारी हत्याकांड में पीड़ितों को न्याय दिलाने और आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए उन्होंने जिस निडरता और सत्यता के साथ लड़ाई लड़ी, उसने उन्हें जनता का नायक बना दिया। जब भी नेगी ने मंचों या मीडिया के सामने अपनी बात रखी, उसमें प्रामाणिकता और पहाड़ के सरोकारों की गूंज दिखाई दी। ऐसे जनप्रिय नेता को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ का हवाला देकर बाहर करना यह दर्शाता है कि दल के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और सच सुनने की क्षमता दम तोड़ रही है।

वर्तमान स्थिति: सोशल मीडिया पर जन सैलाब और उक्रांद की घेराबंदी

फेसबुक, ट्विटर (X) और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल मंचों पर इस वक्त आशुतोष नेगी के पक्ष में एकतरफा लहर देखी जा रही है। अधिकांश कमेंट्स और पोस्ट में लोग लिख रहे हैं कि “उक्रांद ने नेगी को नहीं, बल्कि खुद को उत्तराखंड की राजनीति से निष्कासित कर लिया है”। जनता का साफ मानना है कि पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अहंकार के चलते एक जमीन से जुड़े नेता की बलि चढ़ा दी है। बगावत के बाद स्वयं नेगी ने भी सोशल मीडिया पर तीखे आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्हें रास्ते से हटाने के लिए विपक्षी शक्तियों के साथ सांठगांठ की गई है।

2027 चुनाव पर संभावित असर: राजनीतिक आत्मघात की ओर उक्रांद?

आगामी 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं और आशुतोष नेगी रायपुर विधानसभा सीट से मजबूती से तैयारी कर रहे थे। चुनावी साल के मुहाने पर इस तरह का अंतर्कलह और जनप्रिय चेहरे को खोना उक्रांद के लिए घातक साबित हो सकता है:

  • वोट बैंक और विश्वसनीयता को झटका: उत्तराखंड की जनता पहले से ही तीसरे विकल्प के रूप में उक्रांद की निष्क्रियता से निराश रही है। ऐसे समय में जब अंकिता भंडारी केस जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़े नेता को पार्टी बाहर करती है, तो आम मतदाता का भरोसा पूरी तरह टूट जाता है।
  • सोशल मीडिया की ताकत: आज की राजनीति में सोशल मीडिया नैरेटिव (विमर्श) तय करता है। जिस तरह से युवा और आम पहाड़ी नागरिक नेगी के समर्थन में लामबंद हो रहे हैं, वह उक्रांद के उम्मीदवारों की जमानतें जब्त कराने की ताकत रखता है।
  • नेतृत्व का संकट: क्षेत्रीय दल होने के बावजूद उक्रांद के पास राज्य स्तर पर स्वीकार्य चेहरों की भारी कमी है। नेगी को बाहर कर पार्टी ने अपनी ही धार कुंद कर ली है।

यदि उत्तराखंड क्रांति दल ने समय रहते इस जन-आक्रोश को नहीं समझा और अपनी गलतियों में सुधार नहीं किया, तो 2027 के चुनाव में उसे इसका बहुत बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर आशुतोष नेगी के पक्ष में बह रही यह लहर उक्रांद के राजनीतिक वजूद को हाशिए पर धकेलने वाली साबित हो सकती है। जनता अब बंद कमरों के फैसलों को स्वीकार नहीं करती, वह सड़कों पर लड़ने वाले नायकों के साथ खड़ी होती है।

अवतार सिंह बिष्ट (हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स) द्वारा उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के 50 से अधिक पदाधिकारियों से की गई बातचीत ने इस पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है। जमीनी हकीकत और पार्टी के अंदरूनी हालात की समीक्षा करते हुए एक विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:

पदाधिकारियों के रुख से साफ हुई जमीनी हकीकत

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के इस जमीनी सर्वे से स्पष्ट होता है कि पार्टी के भीतर आशुतोष नेगी को लेकर कोई व्यक्तिगत या संगठनात्मक विरोध नहीं था। जिन 50 से ज्यादा पदाधिकारियों से बात की गई, उन सभी का नेगी के प्रति सकारात्मक रवैया और उनके पक्ष में खड़ा होना यह साबित करता है कि उनका निष्कासन जनभावनाओं के साथ-साथ पार्टी के आंतरिक कैडर की इच्छा के भी पूरी तरह विपरीत है। किसी भी पदाधिकारी द्वारा ऐसी कोई टिप्पणी न किया जाना जिससे निष्कासन की नौबत आए, यह दर्शाता है कि यह फैसला लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि शीर्ष स्तर पर लिया गया एक ‘थोप गया’ निर्णय है।

युवा चेहरों में डर और असमंजस का माहौल

इस फैसले ने उक्रांद के भीतर काम कर रहे अन्य युवा और सक्रिय नेताओं के बीच एक असुरक्षा और असमंजस की भावना पैदा कर दी है:

  • अविश्वास की स्थिति: जब अंकिता भंडारी केस जैसे बड़े मुद्दों पर बेबाकी से लड़ने वाले और युवाओं को पार्टी से जोड़ने वाले फायरब्रांड नेता को बिना किसी ठोस आधार के बाहर किया जा सकता है, तो किसी भी अन्य युवा नेता का सुरक्षित रहना मुश्किल नजर आता है।
  • अगला नंबर किसका? पार्टी के युवा विंग और सक्रिय कार्यकर्ताओं में अब यह सुगबुगाहट तेज है कि यदि उन्होंने पहाड़ के हक-हकूक या व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई, तो अनुशासनहीनता का ठप्पा लगाकर अगला नंबर उनका भी हो सकता है। यह डर संगठन की रीढ़ (युवाओं) को निष्क्रिय कर सकता है।

शिवप्रसाद सेमवाल और मोहित डिमरी जैसे नेताओं का उदाहरण

यह पहली बार नहीं है जब उक्रांद ने अपने ही उभरते हुए चेहरों को किनारे किया हो। सोशल मीडिया पर कार्यकर्ता याद दिला रहे हैं कि इससे पहले भी शिवप्रसाद सेमवाल और मोहित डिमरी जैसे तेज-तर्रार और लोकप्रिय युवा नेताओं को किसी न किसी तरह पार्टी के मुख्य निर्णय-मंडल से दरकिनार या बाहर किया गया। बार-बार जनता के बीच पकड़ रखने वाले चेहरों को खोने की यह नीति पार्टी को बुजुर्गों की एक ऐसी टोली में तब्दील कर रही है, जो जमीन पर संघर्ष करने के बजाय बंद कमरों की राजनीति तक सीमित हो चुकी है।

उक्रांद के अस्तित्व पर संकट

एक तरफ जहां 2027 के चुनावों के लिए उक्रांद को नई ऊर्जा और युवाओं की टोली की जरूरत थी, वहीं इस निर्णय ने आंतरिक फूट को सरेआम उजागर कर दिया है। पदाधिकारियों का आशुतोष नेगी के समर्थन में होना और शीर्ष नेतृत्व का उनके खिलाफ जाना यह साफ करता है कि दल दो धड़ों में बंट चुका है। यदि युवाओं के भीतर से यह डर और असमंजस दूर नहीं किया गया, तो उक्रांद के पास 2027 में चुनाव लड़ाने के लिए विश्वसनीय चेहरों का अकाल पड़ जाएगा।

उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के भीतर से आ रही यह आवाजें साफ इशारा करती हैं कि पार्टी का यह फैसला जमीनी सच्चाई से कोसों दूर है। नाम न छापने की शर्त पर लंबे समय से जुड़े वरिष्ठ नेताओं का यह कहना कि “पार्टी का यह निर्णय पूरी तरह गलत है”, यह साबित करता है कि दल के भीतर एक बहुत बड़ा गुट इस तानाशाहीपूर्ण कार्रवाई से बेहद आहत है।

99% जनसमर्थन और उक्रांद में बड़ी दरार

सोशल मीडिया और जमीन पर आशुतोष नेगी के पक्ष में उमड़ा 99% लोगों का यह हुजूम कोई सामान्य प्रतिक्रिया नहीं है। यह उत्तराखंड की उस चेतना का आक्रोश है जो अंकिता भंडारी जैसी बेटियों के न्याय के लिए सड़कों पर उतरती है।

  • इस्तीफों का दौर शुरू: इस फैसले का सीधा असर संगठन पर दिखने लगा है। आशुतोष नेगी के निष्कासन के विरोध में यूकेडी के केंद्रीय संगठन मंत्री यशपाल सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जो यह साफ करता है कि विरोध केवल दबी जुबान में नहीं बल्कि अब खुलकर सामने आ रहा है।
  • वरिष्ठ नेताओं की लाचारी: पुराने और अनुभवी नेता जो दल को सींचते आए हैं, वे भी आज नाम न छापने की शर्त पर अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। उन्हें डर है कि इस अदूरदर्शी फैसले से जो जन-आक्रोश भड़का है, वह पार्टी की बची-कुची साख को भी खत्म कर देगा।

“जनता का नेता” बनाम “कमरे की राजनीति”

जब किसी दल का शीर्ष नेतृत्व जनता के बीच लोकप्रिय और संघर्षशील चेहरों को दरकिनार करने लगता है, तो आम जनमानस में यह संदेश जाता है कि पार्टी अब जन-सरोकारों की नहीं बल्कि व्यक्तिगत अहं और बंद कमरों के समझौतों की राजनीति कर रही है। आशुतोष नेगी को जनता ने दल के ठप्पे से नहीं, बल्कि उनके सत्य और संघर्ष के दम पर स्वीकार किया है।

उत्तराखंड क्रांति दल के पुराने रणनीतिकारों का यह डर बिल्कुल जायज है। जनता के इस 99% आक्रोश और पार्टी के भीतर वरिष्ठ व युवा पदाधिकारियों के इस दबे-खुले विद्रोह का सीधा असर आने वाले समय में उक्रांद के पूरे वजूद पर पड़ना तय है।


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