रुद्रपुर की सियासत में बारूद कौन भर रहा है? मौलवी के कथित भड़काऊ बयान से लेकर नेताओं पर सोशल मीडिया के हमले तक—अब जनता को तय करना होगा कि वह विकास चुनेगी या विवादहिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | संपादकीय

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रुद्रपुर की सियासत में बारूद कौन भर रहा है? मौलवी के कथित भड़काऊ बयान से लेकर नेताओं पर सोशल मीडिया के हमले तक—अब जनता को तय करना होगा कि वह विकास चुनेगी या विवाद
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | संपादकीय
रुद्रपुर में 26 अगस्त को निकले जुलूस-ए-मोहम्मदी के दौरान इंदिरा चौक स्थित त्रिशूल चौक पर दिए गए कथित भड़काऊ भाषण ने एक बार फिर उत्तराखंड के तराई क्षेत्र की राजनीति को संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर पुलिस ने रामपुर क्षेत्र के मुफ्ती मुजीब के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है और उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। पुलिस जुलूस की अनुमति, भाषण के पूरे संदर्भ और वायरल वीडियो की परिस्थितियों की जांच कर रही है।
यहां सबसे बड़ा सवाल केवल इतना नहीं है कि मंच से क्या कहा गया। बड़ा सवाल यह है कि रुद्रपुर जैसे औद्योगिक और तेजी से विकसित होते शहर को आखिर किस दिशा में ले जाया जा रहा है?
क्या शहर की राजनीति रोजगार, सड़क, जलभराव, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार, नगर नियोजन और उद्योगों की समस्याओं पर केंद्रित होगी या आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हिंदू-मुस्लिम बयानबाजी को राजनीतिक हथियार बनाया जाएगा?
यह सवाल आज रुद्रपुर के प्रत्येक नागरिक को खुद से पूछना चाहिए।
मौलवी मुजीब ने क्या कहा, विवाद क्यों बढ़ा?
वायरल वीडियो को लेकर सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, जुलूस के दौरान मंच से मदरसों और ईदगाह से जुड़ी भूमि का मुद्दा उठाया गया। रिपोर्टों में मुफ्ती मुजीब के हवाले से कहा गया कि यदि मदरसों को बंद किया गया तो मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया गंभीर हो सकती है। कुछ रिपोर्टों में मुख्यमंत्री और सरकार को चेतावनी देने जैसे शब्दों का भी उल्लेख है। इन बयानों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से होनी है।
यही वह बिंदु है जहां बात स्पष्ट होनी चाहिए।
किसी भी धार्मिक मंच से सरकार की किसी नीति का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार के दायरे में हो सकता है। किसी संस्था के पक्ष या विपक्ष में तर्क देना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। मगर धमकी, भय या सामुदायिक प्रतिक्रिया की भाषा कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर विषय बन जाती है।
उत्तराखंड में सरकार हो, विपक्ष हो, धार्मिक संगठन हो, सामाजिक संगठन हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति—सभी के लिए एक ही कानून होना चाहिए।
मुफ्ती मुजीब के कथित बयान का समर्थन करने वालों को भी यह समझना होगा कि किसी समुदाय के नाम पर प्रतिक्रिया की धमकी देना उस समुदाय के हित में काम करने वाला तरीका नहीं है। इससे उस समुदाय के सामान्य, शांतिप्रिय और कानून में विश्वास रखने वाले नागरिक भी अनावश्यक विवाद में घसीटे जाते हैं।
मदरसा वैध है तो उसके दस्तावेज सामने रखिए। जमीन वैध है तो उसके कागजात सामने रखिए। कार्रवाई गलत है तो न्यायालय का दरवाजा खुला है। प्रशासनिक निर्णय पर आपत्ति है तो संवैधानिक तरीके से विरोध कीजिए।
मगर किसी भी सरकार को धमकी देकर नीति बदलवाने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था की भाषा नहीं हो सकती।
मुख्यमंत्री धामी का संदेश भी स्पष्ट है
विवाद सामने आने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में कानून का राज है और धमकी देने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि अतिक्रमण के खिलाफ अभियान जारी रहेगा और किसी को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं होगी।
मुख्यमंत्री की यह बात मूल सिद्धांत के रूप में सही है—कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
मगर इस सिद्धांत की असली परीक्षा तब होगी जब कार्रवाई हर प्रकार के अवैध कब्जे पर समान रूप से होगी। अगर सरकारी भूमि पर किसी भूमाफिया का कब्जा है, कार्रवाई हो। किसी धार्मिक संस्था का अवैध निर्माण है, कार्रवाई हो। किसी प्रभावशाली व्यक्ति की जमीन पर अतिक्रमण है, कार्रवाई हो। किसी गरीब का अवैध कब्जा है, उसके लिए भी कानून के अनुसार प्रक्रिया हो।
बुलडोजर की राजनीति से अधिक जरूरी है कानून की समान राजनीति।
उत्तराखंड किसी की निजी जागीर नहीं है। देवभूमि की भूमि जनता की संपत्ति है और सरकारी जमीन का संरक्षण सरकार की जिम्मेदारी है।
शिव अरोड़ा पर सवाल उठाने वालों से भी सवाल
रुद्रपुर के विधायक शिव अरोड़ा ने कथित बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने सरकार और कानून-व्यवस्था के पक्ष में कड़ा संदेश दिया। उपलब्ध रिपोर्टों में उनके बयान में अवैध मदरसों और कार्रवाई को लेकर सख्त शब्दों का उल्लेख है।
अब सोशल मीडिया पर एक वर्ग विधायक शिव अरोड़ा को घेर रहा है।
सवाल है—क्यों?
अगर विधायक ने किसी कथित भड़काऊ बयान पर प्रतिक्रिया दी है तो उनकी भाषा और तथ्य की राजनीतिक समीक्षा हो सकती है। उनके बयान से असहमति भी व्यक्त की जा सकती है। लोकतंत्र में आलोचना का पूरा अधिकार है।
मगर आलोचना और व्यक्तिगत अभियान में अंतर होता है।
यदि किसी मौलवी के कथित बयान पर सवाल उठाना सांप्रदायिकता है, तो फिर किसी भी धार्मिक नेता के विवादित बयान पर सवाल उठाने की परंपरा समाप्त करनी होगी।
और यदि किसी नेता की हर प्रतिक्रिया को राजनीतिक चश्मे से देखकर हमला करना है तो फिर निष्पक्षता शब्द केवल भाषणों में रह जाएगा।
महापौर विकास शर्मा को घेरने वालों के लिए भी आईना
महापौर विकास शर्मा ने सरकारी जमीन को लेकर स्पष्ट रुख रखा है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने कहा कि आठ एकड़ तो दूर, सरकारी भूमि का एक इंच हिस्सा भी किसी दबाव में छोड़ा नहीं जाएगा।
इस बयान को लेकर भी सोशल मीडिया में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
महापौर से असहमति रखिए, उनके काम का मूल्यांकन कीजिए, नगर निगम की व्यवस्थाओं पर सवाल पूछिए, सफाई, जलभराव, सड़क और विकास कार्यों की समीक्षा कीजिए। मगर किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की हर बात को धर्म के चश्मे से देखना रुद्रपुर की जनता के हित में नहीं है।
और यहां एक बात महापौर से भी कही जानी चाहिए।
सरकारी जमीन की रक्षा का संकल्प केवल बयान तक सीमित रहने वाला विषय नहीं होना चाहिए। जनता चाहती है कि नगर निगम और प्रशासन शहर की प्रत्येक सरकारी भूमि का रिकॉर्ड सार्वजनिक करे। कहां कितना अतिक्रमण है, किसके कब्जे में है, किसके खिलाफ कार्रवाई हुई, किस मामले में न्यायालय में विवाद है—इन सबका पारदर्शी विवरण सामने आना चाहिए।
तभी जनता को भरोसा होगा कि कार्रवाई व्यक्ति देखकर या संस्था देखकर नहीं, कानून देखकर हो रही है।
मौलवी के समर्थन में खड़े लोगों से सीधा सवाल
जो लोग मुफ्ती मुजीब के कथित बयान का समर्थन कर रहे हैं, उनसे भी सवाल है।
क्या किसी धार्मिक मंच से सरकार को सामुदायिक प्रतिक्रिया की चेतावनी देना उचित है?
क्या मदरसे की वैधता का प्रश्न उठाने के लिए धार्मिक भावना के साथ राजनीतिक दबाव बनाना जरूरी है?
क्या किसी सरकारी जमीन का विवाद धार्मिक पहचान का विषय बनना चाहिए?
अगर किसी मदरसे के पास वैध दस्तावेज हैं, तो सामने रखिए। अगर कार्रवाई गलत है, तो न्यायालय में चुनौती दीजिए। अगर प्रशासन ने नियमों का उल्लंघन किया है तो दस्तावेजों के साथ जनता के बीच आइए।
मगर ‘हमारे साथ ऐसा हुआ तो हमारा समाज ऐसा करेगा’ जैसी भाषा समाज को समाधान की ओर नहीं ले जाती।
यह तरीका मुस्लिम समाज के हित में भी नहीं है।
उत्तराखंड में लाखों मुस्लिम नागरिक रहते हैं। वे व्यापार करते हैं, नौकरी करते हैं, उद्योग चलाते हैं, सेना और पुलिस में सेवा करते हैं, शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं और राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। किसी एक व्यक्ति के कथित बयान को पूरे समुदाय का चेहरा बनाना भी उतना ही गलत है जितना किसी नेता की तीखी प्रतिक्रिया को पूरे हिंदू समाज की आवाज समझ लेना।
मीडिया की निष्पक्षता पर भी सवाल जरूरी है
इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका भी जांच के घेरे में है।
आज मीडिया का एक हिस्सा खुद को निष्पक्ष बताता है, मगर उसके समाचार और बहस देखने पर उसकी राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाना कठिन नहीं रहता। कोई खुलकर कांग्रेस समर्थक दिखाई देता है, कोई भाजपा समर्थक। कोई हिंदू मुद्दों को लेकर लगातार आक्रामक रहता है, कोई अल्पसंख्यक मुद्दों को लेकर।
समस्या विचार रखने में नहीं है।
पत्रकार के पास विचार हो सकते हैं। संपादकीय नीति हो सकती है। राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है।
मगर समाचार और विचार के बीच की सीमा बची रहनी चाहिए।
यदि आग बुझाने के बजाय आग को फैलाने में किसी मंच की दिलचस्पी है, तो उसे निष्पक्षता का प्रमाणपत्र स्वयं को देने से पहले जनता के सामने अपने काम का हिसाब रखना चाहिए।
मीडिया का काम समाज में तनाव की ऊंचाई नापना भर नहीं है। मीडिया का काम यह भी पूछना है कि तनाव पैदा क्यों हुआ, जमीन का रिकॉर्ड क्या कहता है, पुलिस ने क्या कार्रवाई की, किस कानून के तहत कार्रवाई हुई, किसकी बात प्रमाणित है और किसकी बात केवल सोशल मीडिया के वीडियो पर आधारित है।
मीडिया को ट्रेंड के पीछे नहीं, सत्य के पीछे चलना चाहिए।
रुद्रपुर की जनता को 2027 से पहले सावधान होना होगा
वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव करीब है।
तराई की राजनीति में धार्मिक और सामुदायिक मुद्दों की गर्मी बढ़ना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक दलों के लिए लाभ का विषय बन सकता है। सोशल मीडिया पर लोग वीडियो देखते हैं, टिप्पणी करते हैं, एक-दूसरे पर कटाक्ष करते हैं और कुछ ही घंटों में मामला शहर की वास्तविक समस्याओं से हटकर हिंदू-मुस्लिम बहस बन जाता है।
फिर नेता बयान देते हैं।
फिर बयान के जवाब में दूसरा बयान आता है।
फिर सोशल मीडिया पर समर्थक और विरोधी आमने-सामने आते हैं।
और इसी बीच रुद्रपुर की सड़क, नाली, अस्पताल, जलभराव, बेरोजगारी, प्रदूषण, यातायात, पार्किंग और औद्योगिक विकास की चर्चा गायब हो जाती है।
यही सबसे बड़ा खतरा है।
क्योंकि राजनीति को धर्म के विवाद में उलझाने से सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक का होता है।
उत्तराखंड कोई धर्मशाला नहीं
यह बात कठोर है, मगर कहना जरूरी है—उत्तराखंड किसी की धर्मशाला नहीं है।
यहां आने वाला प्रत्येक व्यक्ति कानून का सम्मान करे, मेहनत करे, व्यापार करे, रोजगार पाए, समाज में योगदान दे—इसका स्वागत है।
मगर जमीन पर कब्जा, सरकारी संपत्ति पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी और कानून को चुनौती देने की प्रवृत्ति किसी भी पहचान के नाम पर स्वीकार नहीं की जा सकती।
उत्तराखंड में हजारों एकड़ सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की चर्चाएं लंबे समय से होती रही हैं। सरकार की ओर से बड़े पैमाने पर भूमि अतिक्रमण मुक्त कराने का दावा भी किया गया है। मुख्यमंत्री ने हालिया बयान में 13 हजार एकड़ भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने की बात कही है।
अब जनता की मांग इससे आगे की है।
सभी कब्जों की सूची सार्वजनिक हो।
भूमाफिया का कब्जा हो—हटाया जाए।
किसी धार्मिक संस्था का अवैध कब्जा हो—हटाया जाए।
किसी राजनीतिक प्रभावशाली व्यक्ति का कब्जा हो—हटाया जाए।
किसी उद्योगपति या व्यापारी का कब्जा हो—हटाया जाए।
किसी सामान्य नागरिक का अवैध कब्जा हो—कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
कार्रवाई का आधार धर्म, जाति, पार्टी या प्रभाव नहीं, जमीन का रिकॉर्ड और कानून होना चाहिए।
बुलडोजर चले, मगर कानून की सीमा में
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का समर्थन तभी मजबूत होगा जब वह पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया के तहत हो।
सरकारी भूमि की पैमाइश हो।
राजस्व रिकॉर्ड की जांच हो।
नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया हो।
न्यायालय में लंबित मामलों का सम्मान हो।
और अंतिम कार्रवाई के बाद पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
ऐसी व्यवस्था से किसी को यह कहने का अवसर कम मिलेगा कि कार्रवाई किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाकर हुई।
उत्तराखंड को अतिक्रमण मुक्त करने की जरूरत है, मगर उससे भी ज्यादा जरूरत भेदभाव मुक्त प्रशासन की है।
हिंदू-मुस्लिम विवाद से किसका फायदा?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।
जब रुद्रपुर में हिंदू-मुस्लिम विवाद बढ़ता है तो किसका फायदा होता है?
क्या इससे बेरोजगार युवक को नौकरी मिलती है?
क्या अस्पताल की व्यवस्था सुधरती है?
क्या जलभराव खत्म होता है?
क्या उद्योगों में स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है?
क्या व्यापार बढ़ता है?
क्या नगर निगम की आय बढ़ती है?
क्या स्कूल बेहतर होते हैं?
जवाब साफ है।
जनता के रोजमर्रा के जीवन की कोई समस्या इससे हल नहीं होती।
फिर भी सोशल मीडिया पर हजारों लोग ऐसे विवादों में घंटों लगा देते हैं।
यही राजनीतिक रणनीति की सबसे बड़ी सफलता है—जनता वास्तविक मुद्दे भूल जाए और भावनात्मक मुद्दों पर लड़ती रहे।
रुद्रपुर को विवाद की राजधानी बनने से बचाना होगा
रुद्रपुर उत्तराखंड का महत्वपूर्ण औद्योगिक शहर है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से लोग रोजगार और कारोबार के लिए आए हैं। शहर की पहचान उद्योग, व्यापार, शिक्षा और रोजगार से होनी चाहिए।
रुद्रपुर की पहचान किसी एक धार्मिक विवाद से तय नहीं होनी चाहिए।
यहां हिंदू भी हैं, मुस्लिम भी हैं, सिख भी हैं, ईसाई भी हैं और अनेक सामाजिक समुदायों के लोग रहते हैं। शहर की अर्थव्यवस्था सबकी मेहनत से चलती है।
इसलिए जो व्यक्ति माहौल बिगाड़ता है, चाहे उसका धार्मिक चोला कुछ भी हो, उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
और जो व्यक्ति सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाता है, फर्जी वीडियो चलाता है, सांप्रदायिक तनाव बढ़ाता है, उसके खिलाफ भी कानून लागू होना चाहिए।
मेरी स्पष्ट चेतावनी
मैं मुफ्ती मुजीब के कथित बयान का समर्थन नहीं करता।
मैं किसी नेता की हर बात का समर्थन भी नहीं करता।
मैं विधायक शिव अरोड़ा से भी यही अपेक्षा करता हूं कि उनकी भाषा कानून और संविधान की सीमा में रहे।
मैं महापौर विकास शर्मा से भी यही अपेक्षा करता हूं कि सरकारी भूमि के संरक्षण का उनका संकल्प हर अतिक्रमण पर समान रूप से दिखाई दे।
मैं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी अपेक्षा करता हूं कि अतिक्रमण विरोधी अभियान की पारदर्शी सूची जनता के सामने रखी जाए।
और मैं उन लोगों को भी सावधान करना चाहता हूं जो किसी कथित भड़काऊ बयान के बचाव में खड़े होकर पूरे समुदाय की भावनाओं को उसके साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
साथ ही उन लोगों को भी चेतावनी है जो शिव अरोड़ा या विकास शर्मा के बयान को आधार बनाकर पूरे हिंदू समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
एक व्यक्ति का बयान पूरे समाज का बयान नहीं होता।
एक नेता की प्रतिक्रिया पूरे समाज की प्रतिक्रिया नहीं होती।
एक मीडिया संस्थान की राजनीतिक पसंद पूरे मीडिया की निष्पक्षता का प्रमाण नहीं होती।
जनता को इन तीनों बातों को समझना होगा।
2027 में मुद्दा कौन तय करेगा—राजनेता या जनता?
आने वाले चुनाव में जनता को तय करना होगा कि उसे किस प्रकार की राजनीति चाहिए।
ऐसी राजनीति जिसमें हर सप्ताह सोशल मीडिया पर कोई धार्मिक विवाद खड़ा हो?
या ऐसी राजनीति जिसमें रुद्रपुर की सड़कों पर जलभराव का समाधान हो?
ऐसी राजनीति जिसमें नेता एक-दूसरे के बयान काटें?
या ऐसी राजनीति जिसमें अस्पतालों की हालत सुधरे?
ऐसी राजनीति जिसमें हिंदू-मुस्लिम बहस से वोट मांगे जाएं?
या ऐसी राजनीति जिसमें स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले?
अब समय है कि रुद्रपुर का मतदाता सोशल मीडिया के मनोरंजन से बाहर निकले और सवाल पूछे।
मेरे शहर को क्या मिला?
कितने रोजगार आए?
कितनी सड़कें बनीं?
कितने नाले सुधरे?
अस्पताल की व्यवस्था कितनी बेहतर हुई?
नगर निगम ने कितनी सरकारी जमीन बचाई?
कितने अतिक्रमण हटे?
कितने मामलों में राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर कार्रवाई हुई?
यही असली सवाल हैं।
अंतिम बात—कानून सबके लिए एक
रुद्रपुर में मुफ्ती मुजीब के कथित भाषण की जांच हो। वीडियो का पूरा संदर्भ सामने आए। यदि कानून का उल्लंघन हुआ है तो कानूनी कार्रवाई हो। यदि किसी आरोप में तथ्य का अभाव है तो वह भी स्पष्ट किया जाए।
विधायक शिव अरोड़ा के बयान की भी राजनीतिक समीक्षा हो सकती है।
महापौर विकास शर्मा की भूमिका पर भी जनता सवाल पूछ सकती है।
मुख्यमंत्री धामी की नीतियों पर भी सवाल उठ सकते हैं।
यही लोकतंत्र है।
मगर लोकतंत्र का अर्थ किसी समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराना नहीं है।
धर्म के नाम पर धमकी स्वीकार्य नहीं।
राजनीति के नाम पर नफरत स्वीकार्य नहीं।
मीडिया के नाम पर आग भड़काना स्वीकार्य नहीं।
सोशल मीडिया के नाम पर अफवाह फैलाना स्वीकार्य नहीं।
और सरकारी भूमि पर किसी भी पहचान के नाम पर कब्जा स्वीकार्य नहीं।
उत्तराखंड की जमीन उत्तराखंड की जनता की धरोहर है।
रुद्रपुर किसी राजनीतिक प्रयोगशाला का मैदान नहीं है।
यह मेहनतकश लोगों का शहर है।
यह उद्योग और रोजगार का शहर है।
यह उन परिवारों का शहर है जो अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं।
इसलिए मेरी साफ चेतावनी है—
मजहब के नाम पर समाज को बांटने वालों से सावधान रहिए।
राजनीतिक लाभ के लिए विवाद पैदा करने वालों से सावधान रहिए।
सोशल मीडिया पर आधी-अधूरी जानकारी फैलाने वालों से सावधान रहिए।
और उन लोगों से भी सावधान रहिए जो अपने राजनीतिक चश्मे को निष्पक्षता का नाम देकर जनता के सामने रखते हैं।
उत्तराखंड में कानून का राज होना चाहिए।
अतिक्रमण पर कार्रवाई होनी चाहिए।
भूमाफिया पर कार्रवाई होनी चाहिए।
अवैध निर्माण पर कार्रवाई होनी चाहिए।
धार्मिक संस्थाओं के नाम पर अवैध कब्जे हों तो कार्रवाई होनी चाहिए।
राजनीतिक प्रभाव के नाम पर कब्जा हो तो कार्रवाई होनी चाहिए।
और शहर का माहौल बिगाड़ने वाले किसी भी व्यक्ति को उसकी पहचान देखकर राहत मिलने की व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए।
हिंदू हो या मुस्लिम, नेता हो या मौलवी, भूमाफिया हो या प्रभावशाली व्यक्ति—कानून की किताब सबके लिए एक होनी चाहिए।
यही असली धर्मनिरपेक्षता है।
यही संविधान का सम्मान है।
यही देवभूमि की गरिमा है।
और यही रुद्रपुर की जनता की मांग भी होनी चाहिए।
— अवतार सिंह बिष्ट
अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स


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