रुद्रपुर।रुद्रपुर को स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद में शहर का पीला पंजा एक बार फिर चर्चा में है। दरिया नगर की 51 दुकानों पर बुलडोजर चलने के बाद पूरे शहर में एक ही सवाल तैर रहा है—“आज इनकी बारी थी, कल किसकी बारी है?”
दरिया नगर को लेकर स्थानीय राजनीति में एक दिलचस्प चर्चा हमेशा रही है। कहा जाता है कि यह इलाका लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मजबूत वोट बैंक माना जाता रहा है। चुनाव के दिनों में यहां दूसरे प्रत्याशियों के लिए रास्ता बनाना भी आसान काम नहीं माना जाता। मगर विकास के बुलडोजर को वोट बैंक की राजनीति शायद दिखाई नहीं देती। उसे केवल नक्शा दिखाई देता है, सड़क की चौड़ाई दिखाई देती है और अतिक्रमण की लाइन दिखाई देती है।
यही वजह है कि जिस इलाके में राजनीतिक तौर पर भाजपा का मजबूत प्रभाव माना जाता है, वहां दुकानदारों की दुकानें जब बुलडोजर के निशाने पर आईं तो राजनीति और प्रशासन दोनों पर सवाल खड़े होने लगे।
वोट आपका, बुलडोजर हमारा!
दरिया नगर के दुकानदारों का दर्द कैमरों के सामने छलक पड़ा। दुकानें टूटती रहीं, लोग रोते रहे, कोई हाथ जोड़ता रहा, कोई अपनी रोजी-रोटी का हवाला देता रहा और कैमरे अपना काम करते रहे।
सोशल मीडिया के दौर में यह दृश्य भी किसी लाइव शो से कम नहीं था।
एक तरफ दुकान का शटर गिर रहा था, दूसरी तरफ मोबाइल कैमरा चालू था।
एक तरफ दुकानदार पूछ रहा था—“अब परिवार कैसे चलेगा?”
दूसरी तरफ कैमरा मानो कह रहा था—“भाई साहब, थोड़ा इधर होकर रोइए, फ्रेम अच्छा आएगा।”
और फिर खबर बनी, वीडियो चला, सोशल मीडिया पर बहस हुई और टीआरपी ने भी शायद मन ही मन कहा—“आज का कंटेंट बढ़िया है।”
स्मार्ट सिटी का सपना या स्मार्ट बुलडोजर?
रुद्रपुर को स्मार्ट सिटी बनाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। शहर में सड़कें चौड़ी हों, यातायात व्यवस्थित हो, अतिक्रमण हटे और भविष्य के लिए बेहतर शहरी ढांचा तैयार हो—इससे किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।
सवाल केवल इतना है कि विकास का बुलडोजर सबके लिए एक ही गति से चलता है या रास्ते में कहीं-कहीं ब्रेक भी लग जाता है?
दरिया नगर के दुकानदारों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि जिन लोगों की दुकानें टूटीं, उनमें भाजपा समर्थक और कार्यकर्ता भी शामिल रहे हैं। यदि ऐसा है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि सत्ता के साथ खड़े रहने वाले दुकानदारों को भी विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है तो फिर बाकी शहर अपनी बारी के लिए तैयार रहे।
यानी संदेश साफ है—
“पार्टी कोई भी हो, नक्शा सामने आया तो बुलडोजर भाई साहब को सब बराबर दिखाई देते हैं।”
महापौर और अधिकारियों पर भी सवाल
बुलडोजर कार्रवाई के बाद नगर निगम और महापौर विकास शर्मा की भूमिका को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। दुकानदारों की पीड़ा सामने आने के बाद यह चर्चा तेज हुई कि आखिर विकास की प्रक्रिया में प्रभावित लोगों के पुनर्वास, वैकल्पिक व्यवस्था और उनकी आजीविका का कितना ध्यान रखा गया?
कार्तिक कुमार समेत स्थानीय स्तर पर जुड़े लोगों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं जारी हैं। जनता के बीच सवाल है कि शहर को स्मार्ट बनाने की जिम्मेदारी केवल सड़क चौड़ी करने तक सीमित है या प्रभावित परिवारों के भविष्य की चिंता भी स्मार्ट सिटी योजना का हिस्सा है?
अब ट्रांजिट कैंप और खेड़ा की धड़कन तेज!
दरिया नगर के बाद अब निगाहें ट्रांजिट कैंप और खेड़ा कॉलोनी की ओर टिक गई हैं।
शाम टॉकीज के सामने से लेकर आसपास के इलाकों में प्रस्तावित सड़क की चौड़ाई 100 फीट बताए जाने की चर्चा है, जबकि मौके पर सड़क करीब 30 फीट के आसपास होने की बात सामने आती रही है।
अब सवाल यह है कि अगर 100 फीट सड़क का सपना जमीन पर उतरा तो बीच में खड़ी दुकानों और निर्माणों का क्या होगा?
यही कारण है कि कई दुकानदार आज से ही अपनी दुकान के बाहर फीता लेकर सड़क नापने की तैयारी में लग सकते हैं।
सुबह दुकान खोलते समय पहला सवाल होगा—
“भाई, बुलडोजर वाली गाड़ी किधर से आती है?”
दूसरा सवाल—
“हमारी दुकान नक्शे में कितने फीट अंदर है?”
और तीसरा सवाल शायद सबसे महत्वपूर्ण होगा—
“अगला नंबर किसका है?”
‘अगला नंबर तुम्हारा’ बन गया शहर का नया जुमला
रुद्रपुर में इन दिनों विकास की चर्चा के साथ एक नया व्यंग्यात्मक वाक्य जन्म ले चुका है—
“अगला नंबर तुम्हारा!”
आज दरिया नगर है तो कल ट्रांजिट कैंप हो सकता है। आज 51 दुकानें हैं तो कल कोई दूसरा बाजार हो सकता है। आज किसी और की दुकान के सामने पीला पंजा खड़ा है तो कल वही मशीन आपके शटर के सामने भी खड़ी दिखाई दे सकती है।
बाजारों में अब ग्राहक से ज्यादा चर्चा नक्शे की होने लगी है।
चाय की दुकान पर चाय कम और सड़क की चौड़ाई ज्यादा नापी जा रही है।
पान की दुकान पर चर्चा यह नहीं कि विधानसभा चुनाव में कौन जीतेगा।
चर्चा यह है—
“सड़क कितने फीट की होगी?”
और जवाब आता है—
“100 फीट।”
फिर अगला सवाल—
“हमारी दुकान?”
जवाब—
“पहले चाय पी लो, बाकी बाद में पता चल जाएगा।”
काशीपुर बाईपास पर अलग गणित?
इसी बीच काशीपुर बाईपास क्षेत्र को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चर्चाएं उठ रही हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि वहां सड़क और निर्माण से जुड़े मामलों में प्रभावशाली तथा आर्थिक रूप से मजबूत दुकानदारों के कारण कार्रवाई की गति अलग दिखाई देती है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। मगर सवाल जनता का है और सवाल सीधा है—
अगर अतिक्रमण है तो कार्रवाई का पैमाना एक जैसा क्यों न हो?
सड़क गरीब की दुकान के सामने से गुजरती है तो 100 फीट हो जाती है और पूंजीपति के सामने पहुंचते-पहुंचते क्या सड़क की लंबाई कम हो जाती है?
बुलडोजर भी आखिर मशीन है, उसे मालिक की आर्थिक हैसियत पढ़नी नहीं आती। इसलिए प्रशासन को ही यह साबित करना होगा कि कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव नहीं है।
बुलडोजर की राजनीति से बड़ा सवाल—नियम सबके लिए समान हैं या नहीं?
रुद्रपुर को बेहतर शहर बनाना है तो अतिक्रमण हटाना, सड़क चौड़ी करना और यातायात सुधारना जरूरी है। मगर विकास की असली परीक्षा बुलडोजर चलाने में नहीं, समान नियम लागू करने में है।
अगर दरिया नगर की 51 दुकानें सड़क के लिए हटाई गई हैं तो प्रशासन को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कार्रवाई किस योजना, किस नक्शे और किस कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई।
कितनी जमीन सड़क में जाएगी?
कितने निर्माण प्रभावित होंगे?
किस-किस क्षेत्र में कार्रवाई प्रस्तावित है?
प्रभावित दुकानदारों के पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था का क्या प्रावधान है?
इन सवालों के जवाब जनता के सामने आएंगे तो बुलडोजर की कार्रवाई विकास के रूप में दिखाई देगी। जवाब छिपे रहे तो वही कार्रवाई राजनीतिक चश्मे से देखी जाएगी।
अब शहर की निगाहें अगली कार्रवाई पर
दरिया नगर के दुकानदारों की दुकानें टूट गईं। उनके आंसू कैमरों में कैद हो गए। नेताओं के बयान आए। सोशल मीडिया पर बहस हुई। शहर ने तमाशा भी देखा और दर्द भी।
मगर कहानी यहीं खत्म होती दिखाई नहीं देती।
100 फीट की प्रस्तावित सड़कें शहर के कई इलाकों में मौजूद दुकानदारों के लिए चिंता का कारण बनी हुई हैं। ट्रांजिट कैंप, खेड़ा कॉलोनी और अन्य क्षेत्रों के व्यापारी अब शायद अपनी दुकानों से ज्यादा सड़क की लाइन देख रहे हैं।
इसलिए रुद्रपुर की गलियों में आजकल एक नया मजाक चल पड़ा है—
“दुकान पर ताला लगाने से पहले नक्शा देख लेना, कहीं अगली सुबह बुलडोजर तुम्हारे दरवाजे पर स्वागत करने न पहुंच जाए।”
और आखिर में सवाल वही—
दरिया नगर की 51 दुकानें गईं… अब किसकी बारी?
अगला नंबर तुम्हारा! रुद्रपुर में बुलडोजर चला तो दरिया नगर रोया, अब ट्रांजिट कैंप-खेड़ा की बारी?51 दुकानों पर चला पीला पंजा, कैमरे चमके, आंसू निकले और टीआरपी भी मुस्कुराई; 100 फीट की सड़क के नक्शे ने कई बाजारों की नींद उड़ाई
