उत्तराखंड। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के सहयोगी चंदन सिंह जीना से जुड़े कथित नकदी और आभूषण बरामदगी प्रकरण को लेकर उत्तराखंड की सियासत गर्म हो गई है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कार्रवाई के समय पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कई साल पुराने मामले में चुनाव के समय कार्रवाई किए जाने का उद्देश्य राजनीतिक रूप से देखा जा रहा है। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी पक्ष-विपक्ष के समर्थकों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
गोदियाल के तर्क को कांग्रेस की राजनीतिक लाइन के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष के समर्थक इसे अलग नजरिए से देख रहे हैं। उनका कहना है कि किसी मामले में कार्रवाई देर से हुई है तो इससे कथित अनियमितता की जांच का औचित्य समाप्त नहीं हो जाता।
सवाल सीधा है—गलती दस साल पुरानी हो या सौ साल पुरानी, यदि जांच के योग्य तथ्य सामने आते हैं तो जांच और न्याय की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।
चुनाव के समय कार्रवाई पर सवाल, मगर कार्रवाई पर सवाल क्यों?
कांग्रेस की ओर से कार्रवाई के समय को लेकर सवाल उठाया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि चुनाव से पहले इस तरह की कार्रवाई राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित कर सकती है।
मगर सत्ता पक्ष के समर्थकों का सवाल है कि यदि किसी मामले की जांच किसी एजेंसी के स्तर पर चल रही है और उसमें आगे कार्रवाई की स्थिति बनती है तो केवल चुनावी समय होने के कारण जांच रोक दी जाए?
क्या कानून का कैलेंडर चुनावी कैलेंडर देखकर चलेगा?
यही सवाल अब बीजेपी समर्थक राजनीतिक वर्ग सोशल मीडिया पर उठा रहा है।
चुनाव आज है, कल है या पांच साल बाद—कानून की प्रक्रिया का अपना समय होता है।
यदि जांच में कुछ गलत नहीं मिलता, तो संबंधित व्यक्ति को राहत मिलनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
दस साल क्या, सौ साल बाद भी जांच हो तो?
सत्ता पक्ष के समर्थन में उठ रही सबसे जोरदार दलील यही है कि किसी कथित अपराध की उम्र उसके परीक्षण की जरूरत खत्म नहीं करती।
दस साल बाद जांच हो या सौ साल बाद—यदि प्रमाण उपलब्ध हैं और कानून जांच की अनुमति देता है तो सत्य सामने आना चाहिए।
उत्तराखंड के युवाओं के संदर्भ में यह सवाल और गंभीर हो जाता है।
भर्ती परीक्षा में बैठने वाला अभ्यर्थी अपनी उम्र, मेहनत और भविष्य के साथ परीक्षा देता है। यदि कभी किसी भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता हुई है तो उसका प्रभाव केवल उस समय के अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहता।
उसका असर आने वाली पीढ़ियों के भरोसे पर भी पड़ता है।
इसलिए जांच को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय इसे संस्थागत पारदर्शिता के सवाल के रूप में देखना जरूरी है।
हरीश रावत ने खुद कहा—गलती हुई तो माफी मांगूंगा
इस पूरे विवाद में हरीश रावत का अपना बयान भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा है कि यदि उनके कार्यकाल में नियुक्तियों या परीक्षा प्रक्रिया के दौरान कोई चूक हुई और उससे युवाओं के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, तो वह उत्तराखंड की जनता से माफी मांगने को तैयार हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके खिलाफ कोई प्रमाण है तो उसे सीबीआई, ईडी या पुलिस के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए और गलती सिद्ध होने पर कानून के अनुसार दंड स्वीकार किया जाएगा।
अब सत्ता पक्ष का सवाल है—
जब खुद पूर्व मुख्यमंत्री जांच और प्रमाण के आधार पर निर्णय की बात कर रहे हैं तो जांच एजेंसी की कार्रवाई पर केवल समय को लेकर सवाल क्यों?
यही राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
प्रभावशाली सत्ता से दूर होने के बाद कार्रवाई आसान?
राजनीतिक गलियारों में एक और तर्क तेजी से चर्चा में है।
किसी व्यक्ति के सत्ता में रहने के दौरान उसका राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव व्यापक रहता है। मुख्यमंत्री, मंत्री या सत्ता के शीर्ष पदों पर रहने वाले नेताओं के आसपास पूरा सरकारी तंत्र सक्रिय रहता है। ऐसे समय में किसी पुराने मामले में कार्रवाई करना राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अधिक संवेदनशील हो सकता है।
समय बीतने के साथ जब वही राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ता है, तब जांच एजेंसियों के लिए कार्रवाई अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
इसी तर्क को हरीश रावत प्रकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
आज कांग्रेस विपक्ष में है और बीजेपी सत्ता में। ऐसे में बीजेपी के पास स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बढ़त है और वह भ्रष्टाचार तथा भर्ती अनियमितताओं के मुद्दे को कांग्रेस के खिलाफ चुनावी नैरेटिव के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।
बीजेपी ने मुद्दा सटक लिया!
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में मुद्दों का अपना जीवन होता है।
कांग्रेस यदि कार्रवाई के समय पर सवाल उठाती है तो बीजेपी उसी कार्रवाई को भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम बताकर जनता के सामने रख सकती है।
यानी जिस मुद्दे को कांग्रेस राजनीतिक कार्रवाई बताने की कोशिश कर रही है, बीजेपी उसे भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।
राजनीति में नैरेटिव की यही लड़ाई होती है।
एक पक्ष पूछता है—चुनाव से ठीक पहले कार्रवाई क्यों?
दूसरा पक्ष पूछता है—चुनाव है तो क्या जांच रुक जानी चाहिए?
अब फैसला जनता के बीच होना है।
विधायक और नेता—आज इधर, कल उधर?
उत्तराखंड की राजनीति पर एक तीखा सवाल यह भी है कि दल बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, सत्ता बदलती है, मगर कई राजनीतिक चेहरे अलग-अलग समय में अलग-अलग खेमों में दिखाई देते हैं।
आज जो विधायक कांग्रेस में है, वह कल बीजेपी में दिखाई दे सकता है और आज बीजेपी में मौजूद कोई नेता भविष्य में कांग्रेस के साथ नजर आ सकता है।
ऐसे राजनीतिक परिवेश में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्थायी नैतिक रुख कौन अपनाएगा?
यही कारण है कि जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, मगर जब सत्ता बदलती है तो भूमिकाएं भी बदल जाती हैं।
जनता के लिए असली मुद्दा दल नहीं, व्यवस्था की सफाई है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
हरीश रावत प्रकरण सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी दो स्पष्ट धाराएं दिखाई दे रही हैं।
एक पक्ष कार्रवाई के समय को लेकर सवाल उठा रहा है और इसे चुनावी राजनीति से जोड़ रहा है।
दूसरा पक्ष कह रहा है कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच जरूरी है और कार्रवाई को केवल इसलिए गलत नहीं कहा जा सकता कि वह चुनाव के आसपास हुई।
तीसरी आवाज वह है जो दोनों राजनीतिक दलों से सवाल पूछ रही है—
अगर भ्रष्टाचार गलत है तो सत्ता में रहते हुए भी गलत और विपक्ष में रहते हुए भी गलत क्यों नहीं माना जाता?
यही सवाल उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा आईना बन सकता है।
भर्ती घोटाले का सवाल किसी पार्टी की जागीर नहीं
सरकारी नौकरी की परीक्षा में बैठने वाला युवा बीजेपी, कांग्रेस या किसी अन्य दल का कार्यकर्ता बनकर परीक्षा देने नहीं जाता।
वह अपनी योग्यता के आधार पर नौकरी पाने जाता है।
उसके माता-पिता अपनी जमा पूंजी खर्च करते हैं। युवा वर्षों तैयारी करता है। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है।
यदि किसी भी सरकार के समय कोई गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच होनी चाहिए।
दोषी चाहे किसी दल का हो, कानून की कसौटी समान होनी चाहिए।
यही सत्ता पक्ष के समर्थन में उठ रही सबसे मजबूत दलील है।
हरीश रावत का राजनीतिक फैसला भी चर्चा में
ED कार्रवाई की खबरों के बीच हरीश रावत ने कांग्रेस संगठन में अपने दो महत्वपूर्ण दायित्वों से हटने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष को किसी व्यक्तिगत विवाद के कारण कमजोर नहीं होने देना चाहते।
यह फैसला रावत की राजनीतिक संवेदनशीलता का संकेत माना जा रहा है।
मगर अब कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह जांच के समय पर सवाल उठाने के साथ-साथ भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी स्पष्ट रुख रखे।
सत्ता पक्ष के लिए राजनीतिक अवसर
बीजेपी के लिए यह मामला चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है।
भर्ती परीक्षाओं से जुड़े पुराने विवाद उत्तराखंड के युवाओं के बीच संवेदनशील विषय हैं। यदि सत्ता पक्ष यह संदेश स्थापित करने में सफल रहता है कि पुराने मामलों की जांच राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर की जा रही है, तो इसका चुनावी लाभ उसे मिल सकता है।
हालांकि अंतिम राजनीतिक प्रभाव जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो बीजेपी के भ्रष्टाचार विरोधी नैरेटिव को मजबूती मिलेगी।
यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते तो कांग्रेस इसे राजनीतिक कार्रवाई के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रख सकती है।
अंतिम सवाल—देर से मिला न्याय भी न्याय है?
हरीश रावत प्रकरण ने उत्तराखंड में एक बुनियादी बहस छेड़ दी है।
क्या किसी मामले में देर से हुई कार्रवाई अपने आप में गलत कार्रवाई मानी जाएगी?
या फिर—
यदि जांच के लिए पर्याप्त आधार है तो समय बीत जाने के बाद भी कानून को अपना काम करने दिया जाना चाहिए?
सत्ता पक्ष के समर्थन में खड़ा तर्क स्पष्ट है—
गलती दस साल पुरानी हो या सौ साल पुरानी, यदि कानून के दायरे में आती है तो जांच होनी चाहिए।
चुनाव के समय कार्रवाई हुई, यह राजनीतिक सवाल हो सकता है। मगर कार्रवाई हुई, इसलिए जांच रुक जाए—यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य तर्क कितना मजबूत है, इसका फैसला जनता और कानून की प्रक्रिया करेगी।
उत्तराखंड की मूल अवधारणा आखिरकार यही मांग करती है कि युवा की मेहनत सुरक्षित हो, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और दोषी व्यक्ति की पहचान राजनीतिक दल देखकर तय न हो।
देर से सही—यदि किसी मामले की निष्पक्ष जांच शुरू हुई है तो सच सामने आना चाहिए।
और अगर किसी पर लगाए गए आरोप गलत हैं, तो जांच के बाद वह सच भी उतनी ही मजबूती से जनता के सामने आना चाहिए।
