उत्तराखंड नई दिल्ली/देहरादून। 9 नवंबर 2026, सोमवार का दिन धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट पर्व को लेकर विशेष धार्मिक मान्यता है। वहीं उत्तराखंड के इतिहास में भी 9 नवंबर का दिन स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। इसी दिन वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। इस अवसर पर प्रदेशभर में उत्तराखंड स्थापना दिवस मनाया जाता है।
गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की पौराणिक मान्यता
हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को देवराज इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत, प्रकृति और गौमाता के महत्व को समझाया था।
इससे नाराज होकर इंद्रदेव ने ब्रज में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर समस्त ब्रजवासियों और उनके पशुधन को वर्षा से बचाया था। सात दिनों तक भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को धारण किया। अंततः इंद्रदेव को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की महिमा स्वीकार की।
इसी पौराणिक प्रसंग की स्मृति में गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई। इस दिन घरों और मंदिरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। भगवान श्रीकृष्ण, गौमाता और प्रकृति की पूजा की जाती है।
अन्नकूट का धार्मिक महत्व
गोवर्धन पूजा के अवसर पर अन्नकूट का विशेष आयोजन होता है। इसमें विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाइयां, फल और शाकाहारी व्यंजन भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, अन्नकूट प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, अन्न के सम्मान और सामूहिक समृद्धि का प्रतीक है। कई मंदिरों में 56 भोग भी लगाए जाते हैं। श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण से परिवार में सुख, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं।
9 नवंबर को व्रत और पूजा का क्या महत्व है?
इस दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं। गौसेवा, अन्नदान और जरूरतमंदों को भोजन कराने का विशेष महत्व माना जाता है।
गोवर्धन पूजा के साथ प्रकृति संरक्षण, पशुधन की सुरक्षा और कृषि आधारित जीवनशैली का संदेश भी जुड़ा हुआ है।
तिथि संबंधी जानकारी: वर्ष 2026 में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा 9 नवंबर को दोपहर लगभग 12:31 बजे शुरू होकर 10 नवंबर को दोपहर 2 बजे तक रहेगी। कुछ पंचांगों में गोवर्धन पूजा 9 नवंबर को और उत्तर भारत के सूर्योदय आधारित पंचांगों में 10 नवंबर को बताई गई है। इसलिए स्थानीय पंचांग और मंदिर की परंपरा के अनुसार पूजा की तारीख तय करना उचित होगा।
उत्तराखंड स्थापना दिवस: 9 नवंबर का ऐतिहासिक महत्व
उत्तराखंड के लिए 9 नवंबर केवल एक तारीख नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष, जनआंदोलन, बलिदान और पहाड़ी समाज की पहचान का प्रतीक है।
9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों को अलग करके उत्तरांचल नाम से नए राज्य का गठन किया गया था। उस समय यह भारत का 27वां राज्य बना। बाद में 1 जनवरी 2007 को राज्य का नाम उत्तरांचल से बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया।
अलग राज्य की मांग के पीछे पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियां, विकास की चुनौतियां, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और स्थानीय संसाधनों पर क्षेत्रवासियों के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे थे।
राज्य आंदोलन के दौरान अनेक लोगों ने संघर्ष किया और कई आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा सहित विभिन्न घटनाएं उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में आज भी याद की जाती हैं।
उत्तराखंड की पौराणिक पहचान: केदारखंड और मानसखंड
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। इसकी पहचान केवल हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों, ऋषि-मुनियों की तपस्थली और पौराणिक तीर्थों से भी जुड़ी हुई है।
पौराणिक परंपराओं में वर्तमान गढ़वाल क्षेत्र को केदारखंड और कुमाऊं क्षेत्र को मानसखंड के नाम से जाना जाता है।
केदारखंड: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, केदारखंड भगवान शिव की तपोभूमि और आराधना का क्षेत्र है। यहां स्थित केदारनाथ धाम भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। पंचकेदार की परंपरा भी इसी क्षेत्र की धार्मिक पहचान है।
मानसखंड: कुमाऊं क्षेत्र की पौराणिक पहचान मानसखंड से जुड़ी है। यहां जागेश्वर धाम, बागेश्वर, पूर्णागिरि और अन्य प्राचीन धार्मिक स्थल आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। जागेश्वर धाम में भगवान शिव के प्राचीन मंदिरों का समूह विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
गंगा और यमुना के उद्गम से जुड़ी देवभूमि
उत्तराखंड को गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों के उद्गम क्षेत्र के रूप में भी विशेष पहचान प्राप्त है। गंगोत्री क्षेत्र से भागीरथी नदी और यमुनोत्री से यमुना नदी का उद्गम होता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। भगवान शिव ने गंगा की प्रचंड धारा को अपनी जटाओं में धारण कर पृथ्वी पर प्रवाहित किया।
यही कारण है कि गंगोत्री और यमुनोत्री सहित उत्तराखंड के चारधाम भारतीय धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखते हैं।
राज्य स्थापना दिवस पर आत्ममंथन भी जरूरी
उत्तराखंड स्थापना दिवस पर जहां प्रदेशवासी अपनी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक पहचान और आंदोलनकारियों के बलिदान को याद करते हैं, वहीं राज्य की 26 वर्षों की विकास यात्रा का मूल्यांकन भी आवश्यक है।
पलायन, बेरोजगारी, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा, सड़क, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं जैसे सवाल आज भी चर्चा के केंद्र में हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सपना केवल अलग राज्य बनाने तक सीमित नहीं था। इसका उद्देश्य पहाड़ के गांवों का विकास, युवाओं को रोजगार, महिलाओं को सम्मान, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार और क्षेत्रीय असमानता को दूर करना भी था।
9 नवंबर 2026 को गोवर्धन पूजा और उत्तराखंड स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकृति संरक्षण, गौसेवा, अन्न के सम्मान और जनकल्याण के संकल्प को एक साथ जोड़कर देखने का अवसर है।
उत्तराखंड की पहचान उसकी देवभूमि की परंपरा, हिमालय की संस्कृति, नदियों, जंगलों, लोकभाषाओं और राज्य आंदोलनकारियों के संघर्ष में बसती है। यही विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना स्थापना दिवस का वास्तविक संदेश है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
9 नवंबर 2026: गोवर्धन पूजा, अन्नकूट और उत्तराखंड स्थापना दिवस का विशेष संयोग, जानिए पौराणिक मान्यता और धार्मिक महत्व

