ऐपण: उत्तराखंड की मिट्टी से उगती संस्कृति का उज्ज्वल दीप –ऐपण डिज़ाइन: परंपरा का जीवित स्वरूप! श्रीमती हेमा बिनवाल की साधना

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उत्तराखंड,नगर निगम रुद्रपुर के स्वदेशी स्वच्छता समाज सेवा मेले में जब हमारी दृष्टि एक साधारण सी दिखने वाली किन्तु असाधारण आत्मविश्वास से भरी महिला पर पड़ी, तो मन ठिठक गया।
वह थीं – एकता स्वयं सहायता समूह, किच्छा की प्रतिनिधि, श्रीमती हेमा बिनवाल
साधारण पहनावे में, चेहरे पर पहाड़ की निसर्ग मुस्कान लिए, हाथों में सजे हुए ऐपण के अद्भुत नमूने।
उस पल ऐसा लगा जैसे नगर निगम के उस कोलाहल में कोई पहाड़ की शांत घाटी उतर आई हो।

+916398612821 हेमा बिनवाल

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

ऐपण: सिर्फ रंग नहीं, संस्कृति का संकल्प?उत्तराखंड की संस्कृति की बात हो और ऐपण का नाम न आए, यह असंभव है।
चावल के आटे और लाल भूमि (गेरू) पर बने ये आकृतियाँ केवल सजावट नहीं होतीं, यह हमारी परंपरा की जीवित सांसें हैं।
घर के आँगन में, देवस्थान में, त्योहारों पर, बेटी की विदाई में, नवजात के स्वागत में – हर संस्कार में ऐपण का हाथ रहा है।
हेमा बिनवाल जब अपनी कलाकृतियों को प्रदर्शित करती हैं, तो लगता है जैसे गढ़वाल-कुमाऊँ की सदियों पुरानी आत्मा आधुनिक बाजार में आकर भी अपना तेज खोए बिना खड़ी हो।

हेमा बिनवाल: साधारण नारी, असाधारण रचनाकार?किच्छा की निवासी हेमा बिनवाल, किसी महंगे आर्ट स्कूल की उपज नहीं हैं।
वह तो पहाड़ की मिट्टी और परंपरा की सिखावन लेकर आगे बढ़ीं।
जहाँ लोग आज पश्चिमी डिजाइनों के पीछे भाग रहे हैं, वहाँ उन्होंने ठान लिया कि—
मैं अपनी संस्कृति को ही अपना आधार बनाऊंगी।”

+916398612821 हेमा बिनवाल

हेमा बिनवाल के ऐपण डिज़ाइन: परंपरा का जीवित स्वरूप!जब भी आप हेमा बिनवाल के स्टॉल पर रुकते हैं, तो केवल एक डिज़ाइन नहीं देखते, बल्कि पूरी सांस्कृतिक गाथा को महसूस करते हैं।
उनके ऐपण डिज़ाइनों में हर आकृति एक कहानी कहती है, हर रेखा एक परंपरा की गवाही देती है।यह सबसे प्राचीन और लोकप्रिय डिज़ाइन है।
लाल गेरू की भूमि पर चावल के आटे से बनाई गई यह गोल आकृति शुभता और पवित्रता का प्रतीक है।
हेमा बिनवाल ने इस डिज़ाइन को आधुनिक रूप में ढालते हुए दीवार हैंगिंग, टेबल क्लॉथ और गिफ्ट आइटम पर भी उकेरा है।
लोग इसे देखकर कहते हैं – “जैसे घर में देवताओं का आशीर्वाद उतर आया हो।
चौकी ऐपण को विशेष रूप से धार्मिक अनुष्ठानों और विवाह संस्कारों में बनाया जाता है।
हेमा बिनवाल के हाथों से बनी चौकी परंपरा और आधुनिकता का संगम है।
वह इसे लकड़ी और कपड़े पर भी उकेरकर बाजार तक पहुँचा रही हैं।
यह डिज़ाइन स्थायित्व, आस्था और पारिवारिक बंधन का प्रतीक माना जाता है।
स्वस्तिक ऐपण केवल प्रतीक नहीं, बल्कि शक्ति और समृद्धि का आशीर्वाद है।
हेमा बिनवाल ने इसे दीवार पेंटिंग से लेकर हैंडक्राफ्ट डेकोरेशन तक में साकार किया है।
दिल्ली और मुंबई के घरों में लोग उनके बनाए स्वस्तिक ऐपण को विशेष शुभता के लिए लगाते हैं।
कमल का फूल भारतीय संस्कृति में पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है।
हेमा बिनवाल जब अष्टदल कमल का ऐपण बनाती हैं, तो उसमें आठ पंखुड़ियाँ जीवन के आठ आयामों – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, शांति, शक्ति, समृद्धि और सौंदर्य – का संदेश देती हैं।
यह डिज़ाइन विशेष रूप से विवाह और पूजन के अवसर पर प्रिय है।
उत्तराखंड की संस्कृति में सूर्य और चन्द्र जीवनदायिनी शक्ति के प्रतीक हैं।
हेमा बिनवाल ने इन्हें ऐपण की रेखाओं में इस तरह गढ़ा है कि वे आधुनिक घरों की दीवारों पर भी अद्भुत दिखते हैं।
लोग कहते हैं – “जब ये डिज़ाइन घर में लगते हैं, तो वातावरण में ऊर्जा और शांति दोनों का संचार होता है।”
देवी-देवताओं के पदचिह्न का ऐपण विशेष रूप से दीपावली और पूजन में बनाया जाता है।
हेमा बिनवाल के बनाए लक्ष्मी-पदचिह्न ऐपण अब रुद्रपुर, हरिद्वार और दिल्ली के घरों में दीपावली का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
यह डिज़ाइन समृद्धि, सौभाग्य और मंगलकारी ऊर्जा का प्रतीक है।
नवरात्रि में बनाए जाने वाले नवदुर्गा ऐपण आज भी परंपरा का हिस्सा हैं।
हेमा बिनवाल ने इसे रंगीन और आधुनिक रूप देकर पोस्टर, फ्रेम और पूजा सामग्री में ढाला है।
युवाओं में यह खासा लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि यह परंपरा और आस्था दोनों को एक साथ जीवित करता है।
संस्कृति और बाज़ार का मिलन,हेमा बिनवाल की खासियत यह है कि वह केवल परंपरा को दोहराती नहींं, बल्कि उसे आधुनिक रूप देती हैं।
उनके ऐपण डिज़ाइन अब केवल पूजा और आंगन तक सीमित नहीं, बल्कि गिफ्ट आइटम, होम डेकोरेशन, ऑफिस डेकोर और फैशन एसेसरीज़ तक पहुँच चुके हैं।इससे न केवल यह कला जीवित हो रही है, बल्कि महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता भी मिल रही है।

आज उनके हाथों से निकले ऐपण डिज़ाइन दिल्ली, गुजरात, मुंबई, महाराष्ट्र से लेकर हरिद्वार और रुद्रपुर तक पहुँच रहे हैं।
लोग इन कलाकृतियों को केवल सजावट की वस्तु नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा का अंश मानकर घर ले जाते हैं।

ऐपण की रेखाओं में देवभूमि की आत्मा?जब हेमा बिनवाल अपने हाथ से ऐपण बनाती हैं, तो हर रेखा कोई कहानी कहती है।

  • कहीं सूर्य-चन्द्र का आशीर्वाद झलकता है,
  • कहीं शुभ-लाभ का प्रतीक स्वस्तिक,
  • कहीं कलश और पदचिह्न जीवन की समृद्धि का संदेश देते हैं।
(श्रीमती हेमा बिनवाल )+916398612821

उनके द्वारा तैयार की गई हर कलाकृति में यह संदेश गूंजता है कि—संस्कृति केवल किताबों में नहीं, यह हमारे आंगनों की मिट्टी में है।”

महिला सशक्तिकरण का ज्वलंत उदाहरण?हेमा बिनवाल ने एकता स्वयं सहायता समूह के माध्यम से न केवल अपने लिए पहचान बनाई, बल्कि दर्जनों महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन गईं।
उनका यह संदेश हर महिला तक जाता है कि—अगर हम अपनी जड़ों से जुड़ें, तो बाजार हमें खोजने आता है।आज जब विदेशी प्रोडक्ट्स हर कोने पर बिक रहे हैं, तब हेमा बिनवाल का ऐपण हमें याद दिलाता है कि स्वदेशी में भी सौंदर्य है, स्वदेशी में भी शक्ति है।आर्थिक आत्मनिर्भरता से सांस्कृतिक गौरव तक?दिल्ली और मुंबई के लोग उनके ऐपण उत्पादों को बड़े शौक से खरीदते हैं।
गुजरात और महाराष्ट्र के मेलों में उनकी कृतियों को देखकर लोग कहते हैं—
“ये केवल डिज़ाइन नहीं, बल्कि उत्तराखंड का स्पंदन है।”

रुद्रपुर के मेले में जब लोग उनके स्टॉल पर रुकते हैं, तो कोई केवल कला नहीं देखता, बल्कि पहाड़ की संस्कृति से जुड़ाव महसूस करता है।उनके उत्पाद अब केवल सजावट के सामान नहीं रहे, वे बन गए हैं सांस्कृतिक उपहार

ऐपण: आज की पीढ़ी के लिए सीख?आज की पीढ़ी मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में खोती जा रही है।
ऐसे समय में हेमा बिनवाल का काम हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान हमारी परंपरा से है।
वह चाहती हैं कि युवा पीढ़ी ऐपण सीखे, इसे अपनाए और आगे बढ़ाए।
उनकी कला देखकर कई छात्राएँ और गृहिणियाँ उनसे जुड़ रही हैं, ताकि वे भी सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का हिस्सा बन सकें।

संपादकीय दृष्टि?आज आवश्यकता है कि सरकार और समाज मिलकर ऐसे कलाकारों को प्रोत्साहन दें।क्योंकि जब एक महिला अपनी संस्कृति को जीवित करती है, तो वह केवल कला नहीं बचाती,
बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जड़ों की रक्षा करती है।हेमा बिनवाल जैसे कलाकार हमें यह सिखाते हैं कि—लोककला केवल भूतकाल की धरोहर नहीं, यह भविष्य की आधारशिला है।हर घर में ऐपण?आज अगर आप भी अपने घर में हेमा बिनवाल के बनाए ऐपण सजाएँगे, तो समझिए आप केवल एक उत्पाद नहीं खरीद रहे,
बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति को अपने घर आमंत्रित कर रहे हैं।आज जब हमारी संस्कृति पर बाहरी प्रभाव का दबाव है, तब हेमा बिनवाल का ऐपण हमें याद दिलाता है कि—जड़ों से जुड़कर ही शाखाएँ फलती-फूलती हैं।”किच्छा की इस साधारण सी महिला ने हमें यह विश्वास दिलाया है कि—पहाड़ की बेटियाँ जब अपनी परंपरा से जुड़ती हैं, तो पूरी दुनिया उनके कदमों में झुकती है।”


श्रीमती हेमा बिनवाल केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक दूत हैं।
उनका ऐपण सिर्फ गेरू और चावल की लकीरों में नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की लकीरों में जीवित है।
आज हर संवेदनशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि इस कला को अपनाए, सीखे और खरीदे, ताकि यह परंपरा सदियों तक जीवित रहे।

श्रीमती हेमा बिनवाल का ऐपण उत्तराखंड की आत्मा का आईना है।
उनकी रचनाएँ केवल कला नहींं, बल्कि हमारी परंपरा की जीवित गवाही हैं।
अगर आप भी उनके बनाए अल्पना, चौकी, स्वस्तिक, अष्टदल कमल, सूर्य-चन्द्र, पदचिह्न और नवदुर्गा ऐपण को अपने घर सजाएँगे, तो समझिए आप सिर्फ सजावट नहीं कर रहे,
बल्कि देवभूमि उत्तराखंड की आत्मा को अपने जीवन में उतार रहे हैं।



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