छठ पूजा 2025: सूर्य आराधना का पर्व और उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों की नई सांस्कृतिक पहचान

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रुद्रपुर,उत्तराखंड की पावन धरती, जहाँ एक ओर देवभूमि का आध्यात्मिक वैभव झलकता है, वहीं दूसरी ओर यह भूमि विविध सांस्कृतिक परंपराओं के संगम की गवाह भी है। यहाँ के पहाड़ों की आस्था जितनी गहरी है, उतनी ही भावनात्मक निष्ठा तराई और मैदानी क्षेत्रों के प्रवासी समाज में भी रची-बसी है। इन्हीं परंपराओं में से एक है छठ पूजा — सूर्य उपासना का वह पावन पर्व जो अब केवल बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में अपनी सशक्त सांस्कृतिक पहचान बना चुका है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

वर्ष 2025 तक आते-आते रुद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, सितारगंज, खटीमा, दिनेशपुर और काशीपुर जैसे नगरों में छठ पर्व का उल्लास अभूतपूर्व रूप से देखने को मिल रहा है। नगर निगमों और नगर पालिकाओं ने घाटों के सौंदर्यीकरण का कार्य पूरी तत्परता से पूरा किया है। जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों और स्वयंसेवी संगठनों ने एकजुट होकर यह सुनिश्चित किया है कि श्रद्धालुओं को सूर्य को अर्घ्य देने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो।


छठ पर्व का पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व

छठ पूजा हिंदू धर्म में सूर्य देव और उनकी बहन छठी मइया की उपासना का पर्व है। इस पर्व का उल्लेख महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में भी मिलता है। कहा जाता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य की उपासना की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

छठ पर्व प्रकृति और मानव के गहरे रिश्ते की झलक प्रस्तुत करता है। यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है — क्योंकि यह सूर्य, जल, वायु और मिट्टी जैसे जीवनदायी तत्वों की शुद्धि और आभार का प्रतीक है। उपासक व्रती नहाय-खाय से प्रारंभ होकर खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य तक चार दिनों तक कठोर व्रत का पालन करते हैं। बिना नमक का भोजन, नदी-घाटों पर स्नान, और सूर्य को अर्घ्य देने की यह परंपरा आज भी पूरी पवित्रता से निभाई जाती है।


उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में छठ पूजा 2025 की चमक

2025 के छठ पर्व से पहले ही पूरे उधम सिंह नगर जिले में तैयारी का माहौल है। रुद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, सितारगंज, खटीमा, दिनेशपुर और काशीपुर के घाटों पर सफाई और सजावट का कार्य जोरों पर चल रहा है। नगर निगम रुद्रपुर, नगर पालिका किच्छा, सितारगंज, खटीमा, गदरपुर और दिनेशपुर ने घाटों के सौंदर्यीकरण का कार्य लगभग पूरा कर लिया है।

उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में यह पर्व अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक सौहार्द का प्रतीक बन चुका है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी परिवारों ने इसे उत्तराखंड की मिट्टी में समाहित कर दिया है।

रुद्रपुर के सभी घाटों में  हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन तैयारियाँ कर रहे हैं। महिलाएँ पारंपरिक साड़ी में सिर पर टोकरी लिए हुए छठ मइया के गीत गाती हैं —
“केलवा जस सोनवा पानवा जस पान, उग जा सूरज देव भइल अरघ के बान…”
इन गीतों की गूंज से रुद्रपुर की सुबहें और संध्याएँ दोनों ही दिव्यता से भर जाती हैं।


घाटों का सौंदर्यीकरण और प्रशासनिक तत्परता

वर्ष 2025 में छठ पर्व को लेकर प्रशासन पूरी तरह सक्रिय है। नगर निगम रुद्रपुर के महापौर विकास शर्मा ने स्वयं घाटों का निरीक्षण किया और दीपों व झालरों से सजावट के निर्देश दिए। उन्होंने कहा —

“छठ पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। रुद्रपुर में रहने वाला हर नागरिक इस पर्व का भागीदार है, चाहे वह किसी भी प्रदेश से हो।”

रुद्रपुर विधायक श्री शिव अरोड़ा ने छठ घाट पर सफाई व्यवस्था का जायजा लेते हुए कहा —छठ पर्व हमारी सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण है। इस अवसर पर नगर प्रशासन और जनता का समन्वय अनुकरणीय है।”

किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने किच्छा घाट पर व्रतियों से भेंट की और कहा —छठ पूजा हमारी संस्कृति में अनुशासन, तपस्या और परिवार के एकजुट होने का पर्व है। यह हमारी नई पीढ़ी को भी भारतीय परंपरा की गहराई समझने का अवसर देता है।”

वर्तमान विधायक तिलक राज बेहड़ ने किच्छा के घाटों का निरीक्षण कर कहा —यह पर्व हमें बताता है कि जब समाज एकजुट होकर किसी धार्मिक आयोजन में जुटता है, तो उसकी ऊर्जा और सकारात्मकता हर दिशा में फैलती है।”


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का संदेश

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्ष 2025 के छठ पर्व पर जनता को शुभकामनाएँ देते हुए कहा —छठ पूजा पर्यावरण संरक्षण, संयम और सूर्य आराधना का उत्सव है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है। उत्तराखंड सरकार छठ पर्व को हर क्षेत्र में सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण में मनाए जाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”मुख्यमंत्री के निर्देश पर उधम सिंह नगर प्रशासन ने नगर निगमों को 24 घंटे की सफाई व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।


सामुदायिक एकता और लोकभावना का पर्व

छठ पूजा का सबसे बड़ा संदेश है — सामूहिकता और अनुशासन। चाहे कोई हिंदू हो या किसी अन्य धर्म का अनुयायी, छठ पर्व में सबकी भागीदारी दिखती है। यह पर्व इस बात का प्रमाण है कि जब आस्था और लोकसंस्कृति साथ चलते हैं, तो सामाजिक एकता अपने आप मजबूत हो जाती है।

रुद्रपुर, किच्छा और सितारगंज में इस वर्ष विभिन्न सामाजिक संगठनों ने व्रतियों के लिए नि:शुल्क फल, प्रसाद और जल की व्यवस्था की है। प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी व्यक्तिगत स्तर पर इसमें सहयोग कर रहे हैं।


वर्ष 2025 में छठ पर्व न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक बन गया है, बल्कि यह उत्तराखंड के तराई और मैदानी इलाकों में सांस्कृतिक एकता का नया अध्याय भी लिख रहा है। जिस तरह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह पर्व जन-जन की पहचान है, उसी प्रकार अब यह देवभूमि उत्तराखंड की आत्मा में भी रच-बस गया है।

रुद्रपुर के महापौर विकास शर्मा, विधायक शिव अरोड़ा, किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला, वर्तमान विधायक तिलक राज बेहड़ और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी—सभी के प्रयासों ने इस बार के छठ पर्व को अधिक भव्य और सुव्यवस्थित बनाया है।

सच कहा जाए तो छठ पूजा 2025 अब केवल “सूर्य आराधना” नहीं, बल्कि उत्तराखंड की नव सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुकी है—जहाँ प्रकृति, श्रद्धा, अनुशासन और लोकजीवन एक साथ झिलमिलाते हैं।

जय छठ मइया! जय सूर्यदेव! ☀️



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